रेलवे के अच्छे दिनों की उम्मीद

Updated at : 03 May 2016 6:15 AM (IST)
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रेलवे के अच्छे दिनों की उम्मीद

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री रेल मंत्री सुरेश प्रभु द्वारा भारतीय रेल को नयी दिशा देने का योगदान सराहनीय है. अब तक रेल मंत्रियों द्वारा आवश्यकता पड़ने पर किराये में वृद्धि की जाती थी. रेल मंत्री ने इस परंपरा में परिवर्तन किया है. मंत्री ने गैर-किराया आय बढ़ाने की ओर कदम उठाये हैं. जैसे डिब्बों में, […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
रेल मंत्री सुरेश प्रभु द्वारा भारतीय रेल को नयी दिशा देने का योगदान सराहनीय है. अब तक रेल मंत्रियों द्वारा आवश्यकता पड़ने पर किराये में वृद्धि की जाती थी. रेल मंत्री ने इस परंपरा में परिवर्तन किया है. मंत्री ने गैर-किराया आय बढ़ाने की ओर कदम उठाये हैं. जैसे डिब्बों में, प्लेटफाॅर्म पर, सूचना के स्क्रीन पर एवं टिकटों पर विज्ञापन लगाये जा सकते हैं. रेलवे के पास बड़ी मात्रा में सरप्लस जमीन है, जिसका भी उपयोग किया जा सकता है.
रेल मंत्री ने बताया कि दूसरे देशों में रेलवे की गैर-किराया आमदनी 30 प्रतिशत तक है, जबकि भारत में यह मात्र पांच प्रतिशत है. रेल मंत्री ने आधुनिक तकनीकों के उपयोग से खर्च घटाने एवं कार्य कुशलता बढ़ाने पर भी जोर दिया है. जैसे खरीद को इलेक्ट्राॅनिक माध्यम से किया जायेगा. इससे माफियाओं के गंठबंधन को तोड़ा जा सकेगा. नियुक्तियां भी इलेक्ट्राॅनिक माध्यम से की जायेंगी. नियुक्तियों में व्याप्त भ्रष्टाचार कम होगा, कुशल आवेदकों की नियुक्ति होगी तथा रेल व्यवस्था की कार्यकुशलता में सुधार होगा.
प्रश्न है कि ये उपाय पर्याप्त होंगे कि नहीं. जमीनी हकीकत यह है कि रेलवे की आय में गिरावट आ रही है. आय में इस गिरावट का कारण अर्थव्यवस्था में व्याप्त चौतरफा मंदी है. लोग यात्रा कम कर रहे हैं. माल की ढुलाई में वृद्धि भी कम है. ऐसे में रेल के सुधारों के लिए आंतरिक आय से रकम प्राप्त करना कठिन होगा. केंद्र सरकार द्वारा बजट से दी जानेवाली रकम में भी वृद्धि की संभावना भी कम है. निजी पूंजी की भी सीमा है, क्याेंकि निवेशक देखते हैं कि लगायी गयी पूंजी पर लाभ कमाया जा सकेगा अथवा नहीं. रेल की कुल आय दबाव में होने के कारण रेल की योजनाओं का लाभकारी होना संदेहप्रद बना रहता है. समस्या विकट है, चूंकि रेलवे पर सातवें वेतन आयोग का भार पड़ने को है. अतः रेल मंत्री के प्रयासों के बावजूद रेल में निवेश सूखते दिख रहे हैं. विकट परिस्थिति के बावजूद गत वर्ष भारतीय रेल ने पूंजी निवेश में भारी वृद्धि की है.
गत वर्ष 37 हजार करोड़ रुपये की तुलना में इस वर्ष 94 हजार करोड़ रुपये की पूंजी खर्च की गयी है. शायद वित्त मंत्री के इशारे पर एलआइसी ने यह रकम रेल मंत्रालय को दी हो! सरकार द्वारा एलआइसी पाॅलिसी धारकों की पूंजी को घुमाया जा रहा है. रेल के लिए यह सुलभ भले ही हो, लेकिन पाॅलिसी धारकों के प्रति यह छलावा है. एलआइसी द्वारा वहां निवेश किया जा रहा है, जहां निजी निवेशक आने में कतरा रहे हैं. संभवतया यह निवेश विश्वसनीय न हो!
जापान द्वारा अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन के लिए 80 प्रतिशत लोन 0.1 प्रतिशत न्यूनतम ब्याज दर पर देने का अनुबंध हुआ है. हालांकि, शेष 20 प्रतिशत रकम को भारत में जुटाना कठिन होगा.
प्रश्न है कि जापान यह विशाल रकम क्यों देना चाहता है? ज्ञात हो कि गरीब देशों को मदद के लिए जापान द्वारा रकम कम ही उपलब्ध करायी जाती है. इससे संकेत मिलता है कि जापान द्वारा यह मदद भारत की मदद के लिए नहीं, अपितु अपने वाणिज्यिक स्वार्थों को हासिल करने के लिए किया जा रहा है. विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को दी जा रही मदद में आरोप लगते आ रहे हैं कि डोनर देश की रकम का बड़ा हिस्सा वापस हासिल कर लिया जाता है. जैसे आॅस्ट्रेलिया ने बच्चों के लिए दूध उपलब्ध कराने के लिए भारत को मदद दी, लेकिन शर्त लगा दी कि पाउडर मिल्क की खरीद ऑस्ट्रेलिया से ही की जायेगी.
कुछ समय पहले सेंट्रल विजिलेंस कमीशन की रपट में कहा गया था कि भ्रष्टाचार की सर्वाधिक शिकायतें रेल मंत्रालय के कर्मचारियों के संबंध में मिली हैं. भारतीय रेल में कर्मचारियों की कुशलता विश्व की प्रमुख रेलों की तुलना में कम है. रेल मंत्री को चाहिए कि रेल कर्मियों की कुशलता बढ़ाने और इनमें व्याप्त भ्रष्टाचार के नियंत्रण पर जोर दें. इस दिशा में कुछ कदम प्रशंसनीय हैं. जैसे करेंट रिजर्वेशन को इंटरनेट पर खोल दिया गया है.
गाड़ी का चार्ट बनने के बाद रिक्त बर्थ की बुकिंग आॅनलाइन कराई जा सकती है. चलती ट्रेन में उपलब्ध बर्थ की बुकिंग को आॅनलाइन किया जा सकता है. रेल द्वारा भारी मात्रा में माल की खरीद की जाती है. रेल मंत्री ने सभी खरीद को इलेक्ट्रॉनिक मोड से करने की घोषणा की है. इससे भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा. घटिया माल की सप्लाई होती रह सकती है. ऐसे अनेकों बिंदुओं पर ध्यान देना जरूरी है.
भारतीय रेल में भारी मात्रा में निवेश की जरूरत है. सरकारी तथा प्राइवेट स्रोतों से इसे जुटा पाना कठिन है. अत: रेल मंत्री को किराये में वृद्धि पर भी विचार करना चाहिए. विशेष कर लोकल ट्रेनों पर, जहां रेल का खर्च ज्यादा और आय कम है. आंतरिक बचत से निवेश की युक्ति निकालने के बारे में विचार करना चाहिए.
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