शिक्षा का चरमराता ढांचा

Updated at : 28 Apr 2016 11:54 PM (IST)
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शिक्षा का चरमराता ढांचा

‘चौथी औद्योगिक क्रांति’ के मुहाने पर खड़ी दुनिया में अपनी पैठ बनाने के लिए जरूरी है कि देश के उच्च शिक्षण संस्थान विश्वस्तरीय बनें और वक्त व इंडस्ट्री की जरूरतों के मुताबिक प्रोफेशनल्स तैयार करें. लेकिन, हमारे देश में उच्च, तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा का ढांचा साल-दर-साल चरमराता ही जा रहा है. पिछले एक-डेढ़ दशक […]

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‘चौथी औद्योगिक क्रांति’ के मुहाने पर खड़ी दुनिया में अपनी पैठ बनाने के लिए जरूरी है कि देश के उच्च शिक्षण संस्थान विश्वस्तरीय बनें और वक्त व इंडस्ट्री की जरूरतों के मुताबिक प्रोफेशनल्स तैयार करें. लेकिन, हमारे देश में उच्च, तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा का ढांचा साल-दर-साल चरमराता ही जा रहा है.

पिछले एक-डेढ़ दशक में यहां तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा संस्थानों की बाढ़ सी आ गयी है, लेकिन इसका सही प्रबंधन और नियमन न हो पाने के चलते लाखों छात्रों के अरबों रुपये और कैरियर के कुछ कीमती साल इस बाढ़ में यूं ही बह जा रहे हैं! अब द एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एसोचैम) का ताजा सर्वे भी कुछ ऐसा ही संकेत कर रहा है.

इस सर्वे के मुताबिक, देश में मौजूद 5500 बिजनेस स्कूलों में से आइआइएम सहित कुछ मुट्ठीभर शीर्ष संस्थानों को छोड़ दें, तो बाकी से हर साल लाखों रुपये की फीस देकर मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (एमबीए) डिग्री हासिल कर रहे लाखों विद्यार्थियों में से सिर्फ सात फीसदी ही नौकरी पाने के काबिल बन पाते हैं.

बिजनेस स्कूलों के कैंपस रिक्रूटमेंट में 2014 से अब तक 45 फीसदी तक की भारी गिरावट आयी है. बड़ी संख्या में एमबीए डिग्रीधारी विद्यार्थी 10,000 रुपये से भी कम मासिक पगार पर नौकरी ज्वाॅइन कर रहे हैं, जो अर्धबेरोजगारी की निशानी है. दूसरी ओर, देश में एमबीए पाठ्यक्रम के लिए उपलब्ध कुल सीटों की संख्या 2011-12 में 3.6 लाख से बढ़ कर 2015-16 में 5.2 लाख हो गयीं.

एसोचैम के राष्ट्रीय महासचिव डीएस रावत इस दुर्दशा का कारण ज्यादातर प्रबंधन संस्थानों में शिक्षा की निम्न गुणवत्ता और मूलभूत ढांचे की कमी बताते हैं.

इससे पहले इसी साल आयी एस्पाइरिंग माइंड्स की नेशनल एम्प्लॉयबिलिटी रिपोर्ट में बताया गया था कि देश के 80 फीसदी इंजीनियरिंग स्नातक रोजगार देने के काबिल नहीं है. यह रिपोर्ट 650 से अधिक इंजीनियरिंग कालेजों से 2015 में डिग्री हासिल करनेवाले करीब डेढ़ लाख छात्रों के अध्ययन पर आधारित थी. ऐसे आंकड़े गंभीर चिंता और चिंतन का विषय होने चाहिए, लेकिन उच्च, तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में आड़े आ रही समस्याओं के समाधान के प्रति सरकारों के लापरवाह रवैये से हालात साल-दर-साल बदतर ही होते जा रहे हैं.

हकीकत यह है कि सिर्फ कुछ आइआइटी, आइआइएम या अन्य अच्छे सरकारी कॉलेजों के भरोसे देश तरक्की नहीं कर सकता. निजी संस्थानों और विश्वविद्यालयों, जहां से ज्यादा संख्या में विद्यार्थी हर साल निकल रहे हैं, की निगरानी के लिए मौजूद तंत्र को कारगर बनाना जरूरी है.

इस समय देश में उच्च और प्रोफेशनल शिक्षा के निजी संस्थानों की संख्या साल-दर-साल भले बढ़ रही है, लेकिन शैक्षिक मानकों पर ये संस्थान विश्व की बात तो छोड़ दें, एशिया में भी कोई चमकदार स्थान नहीं बना पाते हैं. शोध और नवाचार के मामले में भी रूस और चीन जैसे ब्रिक्स देशों से हम काफी पीछे हैं.

उच्च शिक्षा किसी भी देश-समाज की प्रगति का महत्वपूर्ण आधार होती है, जिसकी नींव स्कूली शिक्षा के दौरान ही रखी जाती है. लेकिन, देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता पर आधारित ‘असर’ रिपोर्ट भी हर साल चिंताजनक आंकड़े ही मुहैया कराती है. हालत यह है कि सरकारी स्कूलों की दुर्दशा से हताश बड़ी संख्या में बच्चे अब निजी संस्थाओं में भी पढ़ रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी गुणवत्ता की निगरानी की समुचित व्यवस्था भी नहीं कर पायी है.

शिक्षा अगर सरकारी प्राथमिकता में होती, तो उसकी झलक शिक्षा-बजट में मिल जाती. सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि केंद्र सरकार प्राथमिक शिक्षा पर फिलहाल जीडीपी का 1.57 फीसदी, जबकि माध्यमिक शिक्षा पर महज 0.98 फीसदी खर्च कर रही है. उच्च और तकनीकी शिक्षा पर तो इससे भी कम (क्रमशः 0.89 फीसदी और 0.33 फीसदी) खर्च हो रहा है.

नतीजा सामने है. लाखों युवाओं के पास इंजीनियरिंग, तकनीकी या प्रबंधन डिग्री तो है, लेकिन इंडस्ट्री की जरूरत के मुताबिक हुनर न होने के कारण वे बेरोजगारों की कतार में शामिल होने के लिए मजबूर हैं. यह अच्छी बात है कि मोदी सरकार ‘स्किल इंडिया’ मुहिम के तहत करोड़ों युवाओं को हुनरमंद बनाने का इरादा जता रही है, लेकिन इस दिशा में ठोस और समयबद्ध प्रयास होने पर ही देश के विकास को गति मिल सकती है. एसोचैम का सर्वे हमें एक मौका दे रहा है.

उच्च शिक्षा की गुणवत्ता की राह में आड़े आ रही समस्याओं पर सरकारों, संस्थानों, शिक्षकों, छात्रों-अभिभावकों और राजनीतिक-सामाजिक संगठनों को मिल कर सकारात्मकता और दूरदृष्टि के साथ विचार करना चाहिए.

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