कैसे बढ़ेगी किसानों की आय?

Updated at : 28 Apr 2016 6:30 AM (IST)
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कैसे बढ़ेगी किसानों की आय?

अनुपम त्रिवेदी राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषक हमारे देश का अन्नदाता गंभीर संकट में है. लगातार दूसरे वर्ष पड़े सूखे ने बड़े पैमाने पर किसानों की कमर तोड़ दी है. 11 राज्यों के 302 जिलों में किसान बुरी तरह प्रभावित है. जहां सूखा नहीं पड़ा है, वहां बेमौसम बरसात और ओला वृष्टि की मार ने किसानों को भुखमरी […]

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अनुपम त्रिवेदी
राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषक
हमारे देश का अन्नदाता गंभीर संकट में है. लगातार दूसरे वर्ष पड़े सूखे ने बड़े पैमाने पर किसानों की कमर तोड़ दी है. 11 राज्यों के 302 जिलों में किसान बुरी तरह प्रभावित है. जहां सूखा नहीं पड़ा है, वहां बेमौसम बरसात और ओला वृष्टि की मार ने किसानों को भुखमरी की कगार पर धकेल दिया है. उस पर अगर कुछ पैदा भी होता है, तो उसका लाभ बिचौलिये ले जाते हैं. बढ़ती लागत, मौसम की मार, घटती आमदनी और बढ़ती महंगाई ने हमारे अन्नदाता की जिंदगी दुरूह कर दी है.
प्रधानमंत्री मोदी किसानों की दशा की सुध ले रहे लगते हैं. ‘ग्राम उदय से भारत उदय’ अभियान सरकार की नेक नियति को दर्शाता है. ‘अन्नदाता सुखी भवः’ के मंत्र के साथ कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को प्रारंभ किया गया है, जिनमें प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, फसल-बीमा योजना, मुफ्त मृदा स्वास्थ्य- कार्ड, इ-मंडी आदि शामिल हैं.
लेकिन, सबसे अधिक महत्वपूर्ण है प्रधानमंत्री की यह घोषणा की 2022 तक किसानों की आय को दोगुना कर दिया जायेगा. यदि सच में ऐसा हो जाये, तो गरीबी उन्मूलन की दिशा में यह बड़ा कदम होगा. अब प्रश्न यह है कि क्या यह संभव होगा? क्या आय का औसत आंकड़ा बढ़ने मात्र से किसान की क्रय-शक्ति बढ़ जायेगी? क्या उसकी बढ़ी हुई आय मुद्रा-स्फीति को परास्त कर पायेगी? क्या बढ़ती आय के मानक सरकारी होंगे या किसान के हाथ कुछ लगेगा भी?
इन उत्तरों को जानने से पहले आइए समझें कि हमारा किसान गरीब क्यों है. देश की सकल आय में कृषि, वानिकी और मछली-पालन का योगदान कुल 17.5 प्रतिशत है, वहीं कुल रोजगार का 49 प्रतिशत इस क्षेत्र से सृजित होता है.
इसका सीधा-सा अर्थ है कि बहुत ज्यादा लोग बहुत कम कमा रहे हैं. इसी की परिणति हमें कम प्रति व्यक्ति आय और गरीबी में दिखाई दे रही है. किसानों की इस कम आय को 2022 तक दोगुना करने के लिए आनेवाले छह वर्षों में कृषि वृद्धि दर को 12 प्रतिशत से ऊपर रखना होगा. अभी यह आंकड़ा केवल मध्य प्रदेश पार कर पाया है. सूखे की मार से जूझते हुए अन्य प्रदेश कैसे इस वृद्धि दर को पा पायेंगे, यह एक बड़ा प्रश्न है.
एक आम धारणा है कि यदि फसलों का ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ बढ़ा दिया जाये, तो किसानों की आय बढ़ जायेगी. पर नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार ऐसा हो नहीं रहा है. इसकी मूल वजह इस योजना की खामियों को बताया गया है. कई फसलों में उत्पादन लागत न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा हो जाती है, तो कभी बाजार भाव ऊपर चला जाता है.
वहीं दूसरी ओर एनएसएसओ- राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार, देश के आधे से ज्यादा किसानों को सरकार द्वारा निर्धारित ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ व्यवस्था की जानकारी ही नहीं है. और जिनको है, उनके आसपास सरकारी विक्रय-केंद्र नहीं हैं, जिस वजह से वे बिचौलियों के हाथ अपने उत्पाद औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर हैं.
एक ऐसा ही वाकया इस लेखक के संज्ञान में आया, जब दिल्ली से मात्र 150 किलोमीटर दूर अलीगढ़ जिले में लेखक ने खुलेआम बिचौलियों को गरीब किसानों से लहसुन केवल 4 रुपये प्रति किलो में खरीदते देखा- वही लहसुन जिसे हम 150 रुपये से 300 रुपये किलो के भाव से खरीदते हैं.
जरा सोचिए उस किसान के बारे में, जिसकी डेढ़ बीघा जमीन में सिर्फ 3 क्विंटल लहसुन की पैदावार हुई और महीनों की मेहनत के बाद उसे मिले मात्र 1,200 रुपये और बिचौलिये ने कमाये 50,000 रुपये! क्या विगत 14 अप्रैल को शुरू हुई इ-मंडी इन छोटे, अनपढ़ और कम जोत वाले किसानों की मदद कर पायेगी?
एनएसएसओ की ही एक रिपोर्ट के अनुसार, देश का आधे से ज्यादा अन्नदाता (52 प्रतिशत) कर्जे में डूबा हुआ है. दक्षिण के राज्यों में यह आंकड़ा तो बहुत गंभीर हो चला है. आंध्र प्रदेश के 93 प्रतिशत, तेलंगाना के 88 प्रतिशत, तमिलनाडु के 80 प्रतिशत और कर्नाटक के 74 प्रतिशत किसान कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं. महाराष्ट्र- जहां से किसानों की आत्महत्या की दुखद खबरें आती रहती हैं, वहां यह आंकड़ा 62 प्रतिशत है. कैसे इतने कर्ज में डूबे किसान की आय में वृद्धि हो पायेगी? हर किसान पर आज औसतन 47 हजार रुपये का कर्ज है.
अगर कभी फसल अच्छी हो भी गयी, तो कमाई सूदखोर ले जायेगा. जरूरत है देश भर में सूक्ष्म-वित्त संस्थाओं (माइक्रो-फाइनेंस) का जाल बिछाने की.
खेती फायदे का सौदा हो सकती है यदि जोत बड़ी हो, पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हों और उत्पादकता अच्छी हो. पर हमारे देश में लगभग 90 प्रतिशत जोत 2 हेक्टेयर या इससे कम है.
राष्ट्रीय औसत 1.15 हेक्टेयर का है. इतनी कम जमीन में क्या उपज मिलेगी? ऊपर से हमारी उत्पादकता भी बहुत कम है. चीन की तुलना में भारत में प्रति हेक्टेयर धान का उत्पादन 3,590 किलो है, जबकि वहां उत्पादन 6,686 किलो है. इस कम उत्पादकता का बड़ा कारण है सिंचाई के साधनों का अभाव. देश की कुल जोत का सिर्फ एक तिहाई ही सिंचित है, बाकी सब भगवान भरोसे है. कम जोत और ऊपर से बढ़ती लागत, जिसमें खाद, बीज, कीटनाशक और मजदूरी शामिल हैं, ने खेती को घाटे का सौदा बना दिया है.
वस्तुस्थिति यह है कि इसीलिए जहां बड़े किसान और कृषि-कंपनियां खेती से करोड़ों, अरबों का टैक्स-फ्री मुनाफा कमा रही हैं, वहीं हमारा किसान भूखों मर रहा है.
यह स्थिति तभी सुधर सकती है, जब सरकार और निजी-क्षेत्र कृषि में निरंतर निवेश करें और ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि से इतर रोजगार के साधन उपलब्ध करायें. साथ ही सहकारी खेती को- जिसमें कई किसान साथ मिल कर खेती करें- को बढ़ावा दिया जाये. कृषि में शोध हो और ड्राइ-लैंड फार्मिंग की तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाया जाये, जिससे बरसात पर निर्भरता कम हो. इसी तकनीक ने ब्राजील के सवाना को हरा-भरा बनाया है और रेगिस्तान जैसे इजरायल को कृषि क्रांति का अगुआ.
अन्नदाता की आय बढ़ाना अब सिर्फ सरकार ही नहीं, हम सब की जिम्मेवारी है. क्योंकि, अगर हमारा अन्नदाता नहीं बचा, तो हम भी नहीं बचेंगे!
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