गरमी और पारंपरिक ज्ञान

Updated at : 13 Apr 2016 5:50 AM (IST)
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गरमी और पारंपरिक ज्ञान

क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार गरमी बढ़ रही है. कुछ दिन पहले तक जो पेड़ चमकते पत्तों से भरे थे, उनके पत्ते कुम्हलाने लगे हैं. आदमियों की तरह वे भी बढ़ते ताप से परेशान हैं. सड़कों के किनारे कहीं-कहीं घड़े दिखाई देते हैं. घड़े के पानी की खुशबू, मिट्टी की गंध, जो आज भी बहुत अच्छी […]

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क्षमा शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

गरमी बढ़ रही है. कुछ दिन पहले तक जो पेड़ चमकते पत्तों से भरे थे, उनके पत्ते कुम्हलाने लगे हैं. आदमियों की तरह वे भी बढ़ते ताप से परेशान हैं. सड़कों के किनारे कहीं-कहीं घड़े दिखाई देते हैं. घड़े के पानी की खुशबू, मिट्टी की गंध, जो आज भी बहुत अच्छी लगती है.

भरी दोपहर, चिलचिलाती धूप से परेशान पसीने से नहाया लड़का घर में घुसता है. वह काॅलेज से लौटा है. प्यास से उसका गला सूखा जा रहा है. घर में घुसते ही वह फौरन पंखे को फुल स्पीड से चलाता है.

फ्रिज खोल कर ठंडे पानी की बोतल निकालता है. पानी पीने को है कि सामने से दादी आ जाती है. वह उसे टोकती है- अरे बेटा, इतना पसीना और यह ठंडा पानी. पंखा बंद करो और पानी भी थोड़ी देर बाद पीना. पहले पसीना सूख जाने दो. वरना तबियत खराब हो जायेगी. मगर नौजवान नहीं मानता. दादी के जाते ही वह पानी की पूरी बोतल गले से नीचे उतार लेता है.

उसे लगता है कि दादी हमेशा अपने जमाने की बातें करती है. बाहर निकलने से पहले ही दस तरह का ज्ञान देती है. कहती है कि बाहर निकलने से पहले भरपेट पानी पियो और सिर ढक कर जाना. इससे गरमी नहीं लगेगी. कभी-कभी तो कच्चे आम का पना भी बना कर देती है. कहती है कि इसे पीने से कभी लू नहीं लगती.

इस नौजवान के घर की तरह ही घर-घर में ऐसी दादी-नानियां हैं, जो खान-पान के जरिये ही हर मौसम से लड़ने और निपटने के कारगर तरीके जानती हैं. वे भी अपनी परंपरा, अपनी दादी-नानियों से सीखती आयी हैं. यह शिक्षा उन्होंने किसी स्कूल-काॅलेज में जाकर नहीं ली, बल्कि घर में जो कुछ होता आया है, उसे देख कर, सुन कर, समझ कर ली है. जैसे कि खरबूज, तरबूज और आम को खाने से पहले देर तक ठंडे पानी में डुबो कर रखा जाये. इससे उनकी गरमी निकल जाती है. खीरे को कभी खाली पेट न खाया जाये, इससे पेट खराब होने और डायरिया का खतरा रहता है. खरबूज खाने के बाद शरबत पीना अच्छा होता है.

इसी तरह खरबूज, तरबूज, खीरे, ककड़ी के साथ दूध का सेवन भी ठीक नहीं है. बेल का शरबत हो तो कहने ही क्या. धूप में बाहर निकलते हुए, अगर कुरते की जेब में एक प्याज रख ली जाये, तो भी लू का प्रकोप कम हो जाता है. सवेरे के वक्त सौंफ, गुलाब की पत्तियों, खरबूज के बीज मिला कर अगर दूध की ठंडाई पी जाये, तो वह गरमी लगने ही नहीं देती.

मगर एसी, फ्रिज, कोल्ड ड्रिंक्स के शोर में लोग आज अपने इस पारंपरिक ज्ञान को भूलते जा रहे हैं. इसे सहेजा जाये, तो शायद पल-पल पर डाॅक्टर के पास भागने और हर बात पर मुट्ठीभर दवाएं खाने की जो जरूरत पड़ती है, उससे बचा जा सकता है.

और पारंपरिक तौर-तरीकों के तहत, हमारी रसोई ही सबसे बड़ा मेडिकल स्टोर है और घर की औरतें सबसे अच्छी डाॅक्टर और विशेषज्ञ हैं. बूढ़ों को यह मान लेना कि वे तो आज के नहीं हैं, तो आज के बारे में क्या जानें, यह ठीक नहीं है. क्योंकि मौसम तो उनके जमाने में भी कमोबेश वैसे ही थे, जैसे आज हैं.

उनसे लड़ने के तौर-तरीके भी वर्षों की मेहनत और शोध का नतीजा हैं. तब उसे तपस्या कहा जाता था. आज दुनियाभर में हो रहे तमाम तरह के शोध भी इन जानकारियों के महत्व को रेखांकित कर रहे हैं. इसलिए मौसम की मार से बचने के लिए, उनकी बात पर कान देना भी जरूरी है. आज घर के किसी आदमी, औरत की बात यानी कि घर की मुर्गी दाल बराबर की समझ का बदलना जरूरी है.

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