झारखंडी अस्मिता के नाम पर..

विनय कुमार सिन्हा,रांची आपके नव-वर्ष के अंक में प्रकाशित एक समाचार ‘अस्मिता के मुद्दे पर मुखर हुए बुद्धिजीवी’ ने मेरा ध्यान आकर्षित किया. उक्त समाचार के अनुसार झारखंड के कुछ ‘बुद्धिजीवी’ कहे जानेवाले महानुभावों ने राज्य के तमाम विधायकों से मांग की है कि वे झारखण्ड को ‘बिहार’ न बनने दें, भोजपुरी और मगही के […]
विनय कुमार सिन्हा,रांची
आपके नव-वर्ष के अंक में प्रकाशित एक समाचार ‘अस्मिता के मुद्दे पर मुखर हुए बुद्धिजीवी’ ने मेरा ध्यान आकर्षित किया. उक्त समाचार के अनुसार झारखंड के कुछ ‘बुद्धिजीवी’ कहे जानेवाले महानुभावों ने राज्य के तमाम विधायकों से मांग की है कि वे झारखण्ड को ‘बिहार’ न बनने दें, भोजपुरी और मगही के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति न करें और ‘स्थानीयता’ नीति के निर्धारण के लिए ‘गैर-झारखंडियों’ के नेतृत्व में बनी कमिटी तत्काल भंग की जाये. कहते हैं कि बुद्धिजीवी वह होता है जो किसी मुद्दे पर गंभीरता से चिंतन कर सही निर्णय पर पहुंचने में समर्थ हो. मुङो यह समझने में कठिनाई हो रही है कि इन तथाकथित बुद्धिजीवियों में, जो झारखंड को बिहार बनने से रोकना चाहते हैं, गंभीर चिंतन करने की क्षमता है भी या नहीं! ‘अस्मिता’ शब्द से उनका क्या अभिप्राय है, इसे भी मैं नहीं समझ पा रहा हूं. झारखंडी ‘अस्मिता’ के नाम पर ही झारखंड राज्य का निर्माण हुआ था. आज बिहार कितना आगे निकल चुका है यह हम सभी जानते हैं. और झारखण्ड! अपनी तथाकथित ‘अस्मिता’ को अक्षुण्ण रखने के नाम पर वहीं है जहां तेरह साल पहले था. आवश्यकता इस बात की है कि अपनी कमियों की तरफ ध्यान दिया जाये, न कि अपनी दुर्दशा के लिए अन्य को दोषी सिद्ध करने के प्रयास किये जायें. झारखंड बनने के बाद इसकी कमान तथाकथित धरती-पुत्रों के हाथ में ही रही है. और क्या हाल कर रखा है इन लोगों ने झारखंड का! आत्मचिंतन की घोर आवश्यकता है. कौन सा कहर टूट पड़ेगा यदि चंद भोजपुरी और मगही भाषा भाषी दो-चार पदों पर बैठ जायेंगे? संवैधानिक रूप से भारत एक है. हर कोई भारतवासी है न कि बिहारी, झारखंडी, पंजाबी या बंगाली.
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