घोषणापत्र में बाल उगाने का वादा!

Published at :04 Jan 2014 7:27 AM (IST)
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घोषणापत्र में बाल उगाने का वादा!

कमलेश सिंह // इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल के प्रबंध संपादक ========================================= नये आदर्श स्थापित करने की नयी होड़ में जो तोड़-फोड़ मचनेवाली है, इसके लिए तैयार रहिए. आम चुनाव सर पर है और शुक्र कीजिए कि आपके बाल सलामत रहें. उड़ गये तो कोई न कोई पार्टी बाल वापस उगाने को घोषणापत्र में शामिल कर […]

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कमलेश सिंह // इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल के प्रबंध संपादक

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नये आदर्श स्थापित करने की नयी होड़ में जो तोड़-फोड़ मचनेवाली है, इसके लिए तैयार रहिए. आम चुनाव सर पर है और शुक्र कीजिए कि आपके बाल सलामत रहें. उड़ गये तो कोई न कोई पार्टी बाल वापस उगाने को घोषणापत्र में शामिल कर ही लेगी.

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मुबारक हो! नये साल में नये आदर्श स्थापित हो रहे हैं. नींव तो पिछले साल ने ही डाल दी थी. दिल्ली के इर्द-गिर्द कुछ जलने की बू सी हवा में तैर रही है. गिराने में जिनको महारत है, उनके दिल तो नहीं जल रहे, क्योंकि पत्थर जलता नहीं. कहते हैं शिलाजीत पत्थर का पसीना है. शीला पर जीतनेवाले ने बहुतों के तलवों के पसीने निकाल दिये हैं. वे सब जुगत में हैं कि कैसे वे भी आम हो जायें. आदर्श बना डालें. नये आदर्श की स्थापना वाले पत्थर में अपना नाम खुदवा लें. पांच साल जिनको भ्रष्टाचार नहीं साला, वे भी मैदान में कूद गये हैं.

आदर्श की जांच की आंच जब पुराने मुख्यमंत्री-मंत्रियों तक पहुंच गयी, तो जांच आयोग का ही भोग चढ़ा दिया. अध्यादेश फाड़ देनेवाले चिरयुवा नेता ने इस इनकार को चीर दिया, तो ना, हां में बदल गयी. नया आदर्श स्थापित हुआ. केजरीवाल ने पानी मुफ्त किया तो मुफ्त के चंदन लेकर बड़े रघुनंदन दौड़ पड़े. रहिमन पानी राखिये पर सात सौ लीटर तक फ्री है. नये फ्रीडम मूवमेंट में नये आदर्श स्थापित करने की नयी होड़ में जो तोड़-फोड़ मचनेवाली है, इसके लिए तैयार रहिए. आम चुनाव सर पर है और शुक्र कीजिए कि आपके बाल सलामत रहें. उड़ गये तो कोई न कोई पार्टी बाल वापस उगाने को घोषणापत्र में शामिल कर ही लेगी.

आम आदमी पार्टी अपवाद है, क्योंकि इसका अभी तक कोई स्पष्ट वाद नहीं. परदा उठा नहीं है, गर्दा दिखा नहीं हैं. पास जाकर सूंघें तो समाजवाद की खुशबू आती है. कइयों को बदबू भी आती होगी. मेरी नजर में यह गमकौआ समाजवाद है. मार्क्‍स धर्म को अफीम कहते थे. धर्म मार्क्‍स को अफीमची समझता है. पर दोनों का अपना धर्म है. समाजवाद थोड़ा इधर है, थोड़ा उधर है और पूरा रोमांटिक है. सबको रोटी, सबको कपड़ा, सबको मकान, सबको स्वास्थ्य, सबको शिक्षा, सबको पानी, सबको बिजली. कर लो विरोध! कोई सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का विरोध करने की हिम्मत कैसे करे?

ये चिकने पात वाले होनहार विरवान सिद्धांत जब यथार्थ के खुरदरे धरातल पर उतरते हैं, तो उनके अर्श के आदर्श फर्श पर लेट जाते हैं. नेहरू से लेकर लालू-मुलायम तक हमने यही देखा है. भूखा रोटी के वादे किये जा रहा है. बिजली जो पैदा नहीं करता, वह आधे दाम में कैसे देगा? पर आप के मुखारविंद से घोषणाएं ही नहीं हुईं, अमल भी हो गया. सभी खुश हैं कि भाई कमाल है. सरकार चाहे तो सरकारी पैसे का सदुपयोग कर सकती है. गरीब तो छोड़िए, अमीरों को भी मुफ्त पानी दे सकती है. एक कहावत है- देयर इज नो फ्री लंच. मुफ्त का भोजन जैसी चीज नहीं होती. कोई भी पैसा सरकारी नहीं होता. जो मुफ्त का नहीं है, वह मुफ्त की शकल में आये तो अकल जरूर लगाएं, क्योंकि वह ज्यादा महंगा पड़ता है. साठ साल तक हमने समाजवाद के रामबाण का इंतजार किया. घाव बढ़ता गया. जब हम कटोरा लिये विश्व बैंक के आगे मिमियाते थक गये, तब उस छद्म समाजवाद के मवाद को चीर कर निकालना पड़ा.

सबको रोटी, सबको कपड़ा, सबको मकान, ये आदर्श खोखले नहीं हैं. ये खोखले तब होते हैं, जब खोखली व्यवस्थाएं इनका फुग्गा फुलाती हैं. पैसा न कौड़ी, बीच बाजार दौड़ा-दौड़ी. संसाधनों का निर्माण करने से पहले उसका बंटवारा. इसके उलट पूंजीवाद संसाधनों का बटोरनवाद है. दोनों वादों के अपने विवाद हैं. दोनों का मिलना असंभव. सरकार का काम जनकल्याण है, वह समाजवाद का रास्ता ले. व्यापार का काम धनार्जन है, वह पूंजीवाद को माने. दोनों के बीच एक लकीर हो, जो उन्हें नहीं मिलने दे, तो ये दो वाद बिना मिले भी मिल सकते हैं. सरकार और उसके प्रिय उद्योगपतियों के लिए भले ही मुक्त हो, व्यापार मुक्त नहीं है. कहते हैं लाइसेंस राज चला गया. टेबल के अंदर झांकिए, वहीं बैठा मिलेगा. आज का पूंजीवाद भी दिखावा है और समाजवाद भी. स्वास्थ्य और शिक्षा सरकार के काम थे, धीरे-धीरे निजी हाथों में जा रहे हैं. हर जगह सुरक्षा गार्ड देख कर लगता है कि लोग अपनी सुरक्षा के स्वयं जिम्मेवार हैं. सरकार व्यापार में व्यस्त है. आपकी पैंट की जेब से पैसे निकाल कर आपकी शर्ट की जेब में डाल कर वोट खरीदने में व्यस्त है.

केजरीवाल का समाजवाद अभी परीक्षित नहीं है. उनके ‘लच्छन’ भी थोड़े ‘विलच्छन’ हैं. उनकी शक्ति और बुद्धि में वृद्धि हो. क्योंकि इनके पहले के सब समाजवादी सिर्फ वोट लेने में पास हुए. जरूरी नहीं कि बेवफा थे सब. इतना जरूर है कि झूठे निकले. बिजली, सड़क, पानी आज भी मुद्दा है, उन्हीं की बदौलत. फिर से उठाने का मौसम भी आ गया है. जनता फिर उम्मीद से है. उन्हें बिना बेवफा बताए.

देखें हमें नसीब से अब अपने क्या मिले,

अब तक तो जो भी दोस्त मिले ख्वामख्वाह मिले.

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