खतरनाक है धन बल

Updated at : 04 Apr 2016 12:43 AM (IST)
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खतरनाक है धन बल

निर्वाचन आयोग ने उन पांच राज्यों से भारी मात्रा में बेनामी नकदी बरामद की है, जहां अप्रैल और मई में विधानसभा के चुनाव होने हैं. रिपोर्टों के अनुसार, 30 मार्च तक 41 करोड़ रुपये जब्त किये जा चुके हैं. अकेले तमिलनाडु से ही करीब 17 करोड़ रुपयों की बरामदगी हुई है. शेष राशि असम, केरल, […]

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निर्वाचन आयोग ने उन पांच राज्यों से भारी मात्रा में बेनामी नकदी बरामद की है, जहां अप्रैल और मई में विधानसभा के चुनाव होने हैं. रिपोर्टों के अनुसार, 30 मार्च तक 41 करोड़ रुपये जब्त किये जा चुके हैं. अकेले तमिलनाडु से ही करीब 17 करोड़ रुपयों की बरामदगी हुई है. शेष राशि असम, केरल, बंगाल और पुद्दुचेरी में पकड़ी गयी है.

स्थानीय निकायों से लेकर लोकसभा तक हर चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए नकदी, शराब, कपड़े, टीवी, लैपटॉप आदि बांटने की खबरें अक्सर सामने आती रहती हैं. कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि तमिलनाडु में विभिन्न पार्टियां मतदाताओं को खरीदने पर छह से नौ हजार करोड़ तक खर्च कर सकती हैं. निर्वाचन आयोग की कोशिशों और मतदाताओं में बढ़ती लोकतांत्रिक जागरूकता के बावजूद भी इस तरह की गतिविधियां निर्बाध रूप से जारी हैं. पिछले महीने दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार को चुनाव में धन बल को रोकने का निर्देश दिया है. न्यायालय ने इस समस्या के समाधान के लिए ठोस वैधानिक प्रावधान करने की जरूरत को रेखांकित करते हुए विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव सुधारों की बात भी कही है.

हालांकि, उम्मीदवारों द्वारा खर्च की राशि की सीमा निर्धारित है, पर इस नियम का खुला उल्लंघन किया जाता है. विडंबना यह भी है कि पार्टियों द्वारा खर्च की जानेवाली रकम की कोई कानूनी सीमा नहीं है. स्पष्ट कानूनी प्रावधानों के अभाव तथा शिथिल नियमों के कारण निर्वाचन आयोग भी बहुत कड़ाई से पैसे की ताकत को नहीं रोक पाता है. अनेक शोधों में बताया गया है कि चुनावों में खर्च के लिहाज से भारत ने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है. चुने हुए जन-प्रतिनिधियों के विवरणों से यह भी स्पष्ट है कि धन बल जीत का एक बड़ा कारक है.

निश्चित रूप से इन प्रवृत्तियों से न सिर्फ सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की पैठ गहरी होती है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ें भी खोखली होती हैं. ऐसे में यह जरूरी है कि धन के दुरुपयोग को रोकने के लिए ठोस कदम उठाये जायें. इसके लिए नागरिकों को भी सरकार और राजनीतिक पार्टियों पर दबाव बनाना होगा.

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