सुधरेगी शिक्षा की गुणवत्ता

Updated at : 01 Apr 2016 2:28 AM (IST)
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सुधरेगी शिक्षा की गुणवत्ता

यह बात ठीक है कि देश के स्कूलों में नामांकन का स्तर 2014 में 96 प्रतिशत का आंकड़ा पार कर गया है. यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. लेकिन, एक तथ्य यह भी है कि पढ़ाई बीच में ही छोड़ देनेवाले बच्चों की तादाद कुछेक राज्यों में 45 प्रतिशत से भी ज्यादा है. ‘असर’ रिपोर्ट 2014 […]

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यह बात ठीक है कि देश के स्कूलों में नामांकन का स्तर 2014 में 96 प्रतिशत का आंकड़ा पार कर गया है. यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. लेकिन, एक तथ्य यह भी है कि पढ़ाई बीच में ही छोड़ देनेवाले बच्चों की तादाद कुछेक राज्यों में 45 प्रतिशत से भी ज्यादा है.
‘असर’ रिपोर्ट 2014 की मानें तो ग्रामीण भारत में 15-16 साल की उम्र के करीब 16 फीसदी लड़के और 17.3 फीसदी लड़कियां पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं. स्कूली बच्चों की शैक्षणिक परिलब्धि का स्तर भी बहुत चिंताजनक है. ऐसी खबरें अक्सर आती रहती हैं कि सरकारी स्कूलों में पांचवीं क्लास के आधे से ज्यादा बच्चे दूसरी कक्षा की किताबों को भी पढ़ने-समझने में सक्षम नहीं हैं. ऐसे में यह सुनिश्चित करना भी समान रूप से जरूरी है कि बच्चों को मिल रही शिक्षा गुणवत्तापूर्ण हो, साथ ही उनके सामने ऐसी बाध्यता न आये कि उन्हें बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़े.
शिक्षा विषयक इन्हीं चिंताओं के मद्देनजर प्रधानमंत्री ने नवगठित नीति आयोग और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ बैठक कर सुझाव दिया है कि स्कूल कक्षावार शैक्षणिक परिलब्धि के अपने लक्ष्यों को सार्वजनिक तौर पर घोषित करें और नीति आयोग अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए नये सिरे से सुधार करे. प्रस्तावित सुधारों के अंतर्गत शिक्षा मुहैया कराने के लिए दी जा रही राशि, प्रदान की जा रही शिक्षा की गुणवत्ता के आधार पर तय की जायेगी. शिक्षकों के प्रशिक्षण के नये संस्थान खोलने के अलावा विद्यार्थियों से अपने शिक्षक का मूल्यांकन करने को भी कहा जा सकता है.
विश्वबैंक की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के गंवई इलाके के सरकारी स्कूलों में करीब एक चौथाई (23.6 फीसदी) शिक्षक स्कूल से गैरहाजिर रहते हैं. शिक्षकों की इस गैरहाजिरी की वजह से सरकार को सालाना डेढ़ अरब डॉलर का घाटा उठाना पड़ता है. शिक्षकों के मूल्यांकन का काम विद्यार्थियों से करवाने पर गैरहाजिरी की प्रवृत्ति पर लगाम लग सकती है.
यह प्रवृत्ति भी देखने में आयी है कि अब गरीब भारतीय परिवार भी अपने बच्चों की अच्छी पढ़ाई के लिए उन्हें निजी शिक्षा संस्थानों में भेज रहे हैं. इसके लिए वे अपने दैनिक खर्चों में कटौती कर रहे हैं, ताकि प्राइवेट स्कूलों की मोटी फीस चुका सकें. ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि शिक्षा में सुधार का प्रधानमंत्री का मौजूदा कदम शिक्षा के सार्वीकरण के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा.
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