चुनावी सुधारों का यह वक्त

Updated at : 30 Mar 2016 6:48 AM (IST)
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चुनावी सुधारों का यह वक्त

पवन के वर्मा पूर्व प्रशासक एवं राज्यसभा सदस्य अभी कुछ ही दिनों पूर्व राजनीतिक दलों तथा उनके चंदे के संबंध में दिल्ली हाइकोर्ट का एक अहम फैसला आया है, जो चुनाव सुधारों के साथ-साथ बिना किसी हिसाब-किताब के चंदे और राजनीति के घातक गंठजोड़ के संबंध में है. कोर्ट ने कहा, ‘धन बल को स्वतंत्र […]

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पवन के वर्मा

पूर्व प्रशासक एवं राज्यसभा सदस्य

अभी कुछ ही दिनों पूर्व राजनीतिक दलों तथा उनके चंदे के संबंध में दिल्ली हाइकोर्ट का एक अहम फैसला आया है, जो चुनाव सुधारों के साथ-साथ बिना किसी हिसाब-किताब के चंदे और राजनीति के घातक गंठजोड़ के संबंध में है.

कोर्ट ने कहा, ‘धन बल को स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनावों के संचालन में आड़े आने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए. इससे राजनीतिक दलों के क्रियाकलाप में पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व का संचार होगा, जो लोकतंत्र को गहराई तथा मजबूती प्रदान करेगा.’ विद्वान न्यायाधीशों ने आगे कहा कि राजनीतिक दलों को स्वेच्छा से दिये गये चंदे का ‘भलीभांति अंकेक्षित हिसाब-किताब’ अवश्य रखा जाना चाहिए और जब तक ऐसा नहीं किया जाता, राजनीतिक दल आयकर से छूट का दावा नहीं कर सकते. इस फैसले का सार यह था कि ‘चुनावी राजनीति में धन के प्रभाव पर प्रभावी नियंत्रण’ लागू करने का वक्त आ चुका है.

लोग इतना तो समझते ही हैं कि भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में उचित बदलाव के लिए मूलभूत तथा व्यापक चुनावी सुधार जरूरी है, मगर जैसा अब तक के इतिहास से स्पष्ट है, इसे कहना इसे किये जाने से ज्यादा आसान रहा है.

26 वर्ष पहले 1990 की गोस्वामी समिति से लेकर 2008 के द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग तक गठित अनेक निकायों ने इसके लिए अपनी अनुशंसाएं, प्रस्ताव तथा अवधारणाएं प्रस्तुत कीं, किंतु कोई भी लागू नहीं की जा सकी. इस स्थिति के लिए प्रथमतः तो राजनीतिक दल तथा राजनीतिज्ञ ही जिम्मेवार हैं, जो कोई बदलाव नहीं चाहते, क्योंकि वे ही इसका सबसे ज्यादा लाभ उठाते हैं.

एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स नामक अत्यंत सम्मानित एनजीओ के अनुसार, राजनीतिक दलों के 85 प्रतिशत धनदाता बेनामी होते हैं. अनौपचारिक अनुमानों के अनुसार, चंदे से हासिल वास्तविक आय बतायी गयी आय की दस गुनी तक होती है और कालेधन तथा राजनीतिक दलों का यह गंठजोड़ ही अपने देश में भ्रष्टाचार की जड़ है.

जिनसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध कानून बनाने की अपेक्षा की जाती है, जब वे स्वयं ही एक भ्रष्ट प्रणाली की उपज हों, तो बाकी समाज किस तरह स्वच्छ हो सकता है? राजनीतिक दल जब बेनामी दाताओं से नकदी में चंदे हासिल कर रहे हों, तो फिर वे कर वंचकों के हित साधेंगे ही. ग्लोबल इंटीग्रिटी (वैश्विक निष्ठा) रिपोर्ट के अनुसार, राजनीतिक वित्त नियमन के क्षेत्र में भारत विश्व के सबसे निचले पायदान पर है, क्योंकि राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को मिले धन के खुलासे को लागू करने के पैमाने पर इसके द्वारा भारत को शून्य अंक दिया गया है.

इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से निबटने के लिए प्राथमिक रूप में कौन-से व्यावहारिक तथा सैद्धांतिक कदम उठाये जा सकते हैं? सबसे पहले तो राजनीतिक दलों को 20,000 रुपये से कम राशि देनेवाले दाताओं की पहचान उजागर न करने की मिली छूट तुरंत खत्म की जानी चाहिए.

यह दलों द्वारा खुलासा किये बगैर बड़ी धनराशियां इकठ्ठा करने का सबसे बड़ा (मगर अकेला नहीं) रास्ता है. उनके चंदे के पैसों को बैंकों की मार्फत किये गये अंकेक्षणीय तथा पारदर्शी भुगतान द्वारा दिया जाना अनिवार्य होना चाहिए. दूसरा, दलों को दिये जानेवाले 20,000 रुपये से ऊपर के सभी चंदे को भी रेखांकित (क्रॉस्ड) चेक या बैंक ट्रांसफर से ही दिया जाना आवश्यक कर देना चाहिए. पहले भी इन उपायों की जोरदार सिफारिश की जा चुकी है.

निर्वाचन आयोग को भी चाहिए कि सूचना प्रौद्योगिकी में अपने देश की सक्षमता का लाभ उठाते हुए वह एक ऐसा ऑनलाइन ढांचा खड़ा करे कि दलों द्वारा अपने आय-व्यय छिपा सकने की गुंजाइश कम-से-कम बचे. तीसरा, हर दल द्वारा अपना अंकेक्षित लेखा प्रतिवर्ष अनिवार्यतः सार्वजनिक किया जाना चाहिए. अभी प्रत्याशियों के लिए तो अपनी संपत्ति तथा देनदारियां उजागर करना आवश्यक है, पर दलों के लिए नहीं. निर्वाचन आयोग द्वारा 2004 में ही इसकी अनुशंसा की जा चुकी है. मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि उन्हें सूचना के अधिकार के अंतर्गत भी लाया जाना चाहिए.

चौथा, इन सभी मामलों में निर्वाचन आयोग की प्रवर्तन एवं विनियामक भूमिका को सशक्त करने पर भी गहराई से गौर किया जाना चाहिए. अब आयोग को संभवतः यह अधिकार देने का वक्त आ गया है कि जब भी दलों द्वारा किये गये व्यय उनकी आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक होने के सबूत उसे मिलें, वह उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर सके. भारत के लिए विश्व का केवल सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाना ही अहम नहीं है; हमें हर मायने में एक विश्वसनीय लोकतंत्र भी होना ही चाहिए.

(अनुवाद : विजय नंदन)

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