जीजा कब जीजू हो गये!

Updated at : 28 Mar 2016 12:34 AM (IST)
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जीजा कब जीजू हो गये!

बंदे को नॉस्टेल्जिया है. विगत में विचरता रहता है. विगत में विचरते हुए कल गिरते-गिरते बचा था. किसी ने कह दिया. बाबा संभलो खुद को, गिरोगे तो हाथ-पैर फूट जायेंगे. बाबा शब्द सुनते ही तकरीबन पचास-पचपन साल पीछे का फ्लैशबैक शुरू… हो गया. सब कुछ धुंधला-धुंधला-सा है. मां-बाप माताजी-पिताजी हैं. अब्बा और अम्मी नाम भी […]

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बंदे को नॉस्टेल्जिया है. विगत में विचरता रहता है. विगत में विचरते हुए कल गिरते-गिरते बचा था. किसी ने कह दिया. बाबा संभलो खुद को, गिरोगे तो हाथ-पैर फूट जायेंगे.

बाबा शब्द सुनते ही तकरीबन पचास-पचपन साल पीछे का फ्लैशबैक शुरू… हो गया.

सब कुछ धुंधला-धुंधला-सा है. मां-बाप माताजी-पिताजी हैं. अब्बा और अम्मी नाम भी अक्सर कानों में पड़ते हैं. दो बूढ़े-से लोग दिखते हैं. ये दादा और दादी हैं. हमारे पड़ोसवाला मुन्ना अपने दादा जी को बाबा कहता है. फूफा भी हैं उसके, और मौसा भी हैं.

चाचा की दिल्ली में शादी होती है. पचास का मध्यकाल है यह. उस दौर का नया जमाना चढ़ रहा है. चाची बीए पास कड़क मास्टरनी हैं. उन्हें चाची शब्द से सख्त नफरत है. चाची सुन कर डपट देती हैं बच्चे को. वे कहती हैं- आंटी कहो. दिल्ली बहुत मॉडर्न है. यहां हर चाचा आंटी ब्याह कर लाता है. चाची मृत्युपर्यंत आंटी रहीं. चाची वाला प्यार नहीं मिला. पता चला कि आंटी कल्चर बड़े लोगों की देन है. मिडिल क्लास इसे अपना कर गौरवान्वित महसूस करता है. उसका सीना मुर्गे की तरह फूला रहता है.

इससे अच्छा तो हमारा शहर है. नयी पड़ोसन अभी-अभी ब्याह कर आयी है. उसे चाची कहा. उसने खुश होकर दुअन्नी दी. दिल खुश हो गया. नीचे वाले फ्लैट में श्रीवास्तव फैमिली के बच्चे मां को जिया कहते हैं. हम भी उन्हें जिया कहते हैं. लेकिन, जिया तो बड़ी बहन को कहते हैं. होगा कुछ भी. हमें तो चाची और बड़ी बहन दोनों का प्यार मिला. बंदे को ताउम्र फख्र रहा कि बुआ को बुआ ही कहा और मौसी को आंटी नहीं बोला.

एक दिन स्कूल में पिताजी आये. बंदे ने मास्टर जी से परिचय कराया. ये मेरे ‘फादर’ हैं. मास्टर जी ने घुमा कर दो छड़ी लगायी. पिताजी कहने में शर्म आती है?

पता ही नहीं चला कि कब दौर बदल गया. आदरणीय जीजा जाने कब जीजू हो गये और चाचा चाचू हो गये. मामा भी मामू हो गये. दादा को दादू से और नाना को नानू से प्यार हो गया. मौसियां और बुआ भी आंटियां कहलाने में गौरव महसूस करने लगीं. ताऊ और ताई को छोड़ कर सारे रिश्ते गडमड हो गये. पिताजी डैडी बने और फिर पापा. उस दिन एक बच्चे ने अपने पापा को पापू कहा तो गलगलान हो गये. अंगरेजी कल्चर में रंगे बच्चे तो पापा को पॉप कहते ही हैं. मां भला पीछे कैसे रहे? मम्मी बनी और फिर मॉम. दादी और नानी ने भी चुपचाप नाम बदल लिया. एक ग्रेमी है, तो दूसरी ग्रैनी है.

नेपथ्य से आवाज आती है. संस्कृति का क्षरण है यह. लेकिन, इसका कोई हल्ला-गुल्ला और विरोध भी तो नहीं है. ओल्ड और मॉडर्न- दोनों पक्षों को मजा आ रहा है.

जाने भी दो यारों. क्या रखा है नाम में? फिर हर पीढ़ी का एक अपना वर्तमान है. इन्हें भी अपनी जिंदगी जीने का हक है. इनके पास तर्क भी हैं. चाचू-नानू कहने से रिश्तों में चाशनी घुल गयी है.

बदले रिश्तों का बाजार पर भी असर है. सब्जी वाले के लिए ग्राहक कबकी आंटीजी और अंकलजी हो चुके हैं. ऑटो वाले के लिए भी सवारी अंकल-आंटी है. भिखारियों तक ने रिश्ते बदल दिये हैं. दादी की उम्र को आंटी कह दो, तो खट से दस का नोट हाजिर.

बंदे का मॉडर्न पड़ोसी कहता है- यार जब कोई बाबाजी कहता है, तो तबीयत करती है कि लगाऊं घुमा कर एक झन्नाटेदार चांटा!

वीर विनोद छाबड़ा

व्यंग्यकार

chhabravirvinod@gmail.com

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