जल बिन सब सून

महाराष्ट्र के लातूर में जल-संकट भयावह होता जा रहा है. पिछले महीने से ही इलाके से लोगों का पलायन हो रहा है और शहर में रह रहे लोगों को सीमित मात्रा में टैंकरों से पानी की आपूर्ति की जा रही है. पानी के लिए लोगों में झगड़ा होने के कारण क्षेत्र में धारा 144 तक […]
महाराष्ट्र के लातूर में जल-संकट भयावह होता जा रहा है. पिछले महीने से ही इलाके से लोगों का पलायन हो रहा है और शहर में रह रहे लोगों को सीमित मात्रा में टैंकरों से पानी की आपूर्ति की जा रही है. पानी के लिए लोगों में झगड़ा होने के कारण क्षेत्र में धारा 144 तक लगानी पड़ी है. यदि अगले कुछ समय में पर्याप्त बारिश नहीं हुई, तो लातूर भूतहा बस्ती में बदल सकता है. लेकिन, सूखे की चिंताजनक स्थिति पूरे मराठवाड़ा में है. कुछ दिन पहले ही राज्य सरकार ने 12 हजार गावों को सूखाग्रस्त घोषित किया है. जानकारों की मानें, तो देर-सबेर देश के विभिन्न इलाकों में भी ऐसे हालात पैदा हो सकते हैं. पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने की त्वरित चिंता के साथ सरकारों के सामने पानी के प्रबंधन और जल-नीति की समीक्षा की चुनौती भी है.
मराठवाड़ा में पानी पहुंचाने के लिए सरकार बड़े बांधों पर निर्भर रही है और इस नीति को लेकर लंबे समय से सवाल उठाये जाते रहे हैं. आज स्थिति यह है कि क्षेत्र के 11 में से सात बांध पूरी तरह से सूख चुके हैं. कुछ बांधों में पिछले साल का बचा हुआ पानी है, जिसे पंप द्वारा बाहर निकाला जा रहा है. पानी की समस्या का एक बड़ा कारण गन्ने की व्यावसायिक खेती और चीनी मिलों को पानी आपूर्ति करना भी है. राष्ट्रीय स्तर पर देखें, तो 91 बड़े संग्रहण-तालों में पानी की मात्रा गत एक दशक में सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है और इनमें महज 29 फीसदी पानी ही है.
ऐसे गहन अध्ययन भी हुए हैं जिनके अनुसार भारत में 2025 तक पानी समाप्त हो सकता है. पानी के संकट से खेती के नुकसान के साथ पेयजल की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है. प्रदूषण, पानी का विषाक्त होना, खतरनाक रसायनों का होना आदि विकराल समस्या बनती जा रही हैं. देश में होनेवाली 21 फीसदी बीमारियों का कारण दूषित जल ही है. अब समय आ गया है कि वर्षा के जल का संग्रह, प्राकृतिक जलाशयों और नमीवाले क्षेत्रों का उद्धार, नदियों की सफाई, पर्यावरण को प्राथमिकता जैसे उपायों पर गंभीरता से अमल किया जाये.
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