सरकारी स्कूल और नक्सलवाद
Updated at : 23 Mar 2016 6:30 AM (IST)
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बिभाष कृषि एवं आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ श्री श्री रविशंकर ने हाल ही में सरकारी स्कूलों पर एक टिप्पणी की कि ‘गवर्नमेंट को कोई स्कूल नहीं चलाना चाहिए. अक्सर पाया जाता है कि गवर्नमेंट स्कूल से पढ़े हुए बच्चे ही इस तरह नक्सलवाद में हिंसा के मार्ग में चले जाते हैं.’ उन्होंने आगे कहा कि […]
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बिभाष
कृषि एवं आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ
श्री श्री रविशंकर ने हाल ही में सरकारी स्कूलों पर एक टिप्पणी की कि ‘गवर्नमेंट को कोई स्कूल नहीं चलाना चाहिए. अक्सर पाया जाता है कि गवर्नमेंट स्कूल से पढ़े हुए बच्चे ही इस तरह नक्सलवाद में हिंसा के मार्ग में चले जाते हैं.’ उन्होंने आगे कहा कि सभी स्कूल और कॉलेज का निजीकरण कर किसी संस्था को सौंप देना चाहिए.
ऐसा कोई शोध नहीं मिला है कि नक्सलवादी या हिंसा की पृष्ठभूमि वाले लोगों का शैक्षिक बैकग्राउंड क्या है. अत: कोशिश की गयी कि उपलब्ध आंकड़ों को ही खंगाल कर कुछ निष्कर्ष पर पहुंचा जाये. टीएनएस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने एडसिल को जनवरी 2013 में ‘सर्वे फॉर असेसमेंट ऑफ ड्रॉपआउट रेट्स इन एलिमेंटरी लेवल इन 21 स्टेट्स’ शीर्षक से एक रिपोर्ट सौंपी. जिन राज्यों को नक्सलवाद से जोड़ कर देख सकते हैं, वे हैं आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल. अगर हिंसा को जोड़ दें तो जम्मू-कश्मीर को भी ले सकते हैं.
2009-10 में कक्षा में ही स्कूल छोड़नेवाले बच्चों की दर अखिल भारतीय स्तर पर 6.3 प्रतिशत थी. आंध्र प्रदेश में यह दर 11.5, छत्तीसगढ़ में 7.3, मध्य प्रदेश में 6.9, झारखंड में 7.3 और पश्चिम बंगाल में 2.7 थी. जम्मू-कश्मीर में यह दर 13.6 थी. यानी जिन राज्यों में नक्सलवाद और हिंसा है, वहां पहली कक्षा में ही स्कूल छोड़नेवाले बच्चों की संख्या अखिल भारतीय स्तर की संख्या से पश्चिम बंगाल को छोड़ कर ज्यादा है. स्कूल छोड़ने की दर वर्ष 2009-10 में सबसे ज्यादा अनुसूचित जनजाति बच्चों में थी.
मतलब, नक्सलवाद और हिंसा का अगर शिक्षा से कोई संबंध है, तो वह निगेटिव है. स्कूल छोड़नेवाले कारणों में मुख्य कारण आर्थिक थे. अत: स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति पर अगर रोक लगाना है, तो आर्थिक विकास पर ध्यान देना होगा. यानी आर्थिक विकास-नक्सलवाद-हिंसा में संबंध तलाशे जा सकते हैं. आश्चर्यजनक है कि राजस्थान जिसे हिंसा से नहीं जोड़ा जा सकता, वहां पहली कक्षा में स्कूल छोड़नेवाले बच्चों की दर 15.1 देश में सबसे ज्यादा है.
मानव संसाधन विकास मंत्रालय भी शिक्षा पर आंकड़े जारी करता है. दिसंबर 2014 में जारी ‘एजुकेशन स्टैटिस्टिक्स ऐट ए ग्लांस’ रिपोर्ट www.mhrd.gov.in पर उपलब्ध है. अखिल भारतीय स्तर पर आंकड़ों के अनुसार, 2013-14 में दर्जा एक से आठ तक ड्रॉपआउट बच्चों का प्रतिशत 36.3 प्रतिशत था, अनुसूचित जाति के मामलों में 16.6 और अनुसूचित जनजाति बच्चों में यह आंकड़ा 31.3 प्रतिशत था.
गौरतलब है कि हर वर्ग में लड़कों के ड्रॉपआउट का प्रतिशत लड़कियों के ड्रॉपआउट प्रतिशत से ज्यादा था. अगर ध्यान दें तो नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्र आमतौर पर अनुसूचित जनजातियों के इलाके हैं.
इसी प्रकार राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन विश्वविद्यालय द्वारा जारी डीआइएसइ 2013-14 आंकड़े www.dise.in पर उपलब्ध हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार भी आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में दर्जा एक में ड्रॉपआउट दर अखिल भारतीय दर 4.83 से कहीं ज्यादा है. इसी रिपोर्ट में प्रति दस वर्ग किमी प्राथमिक स्कूल के आंकड़े भी हैं. अखिल भारतीय स्तर पर यह 3.66 है, जबकि आंध्र प्रदेश में यह 3.10, छत्तीसगढ़ में 2.89, जम्मू-कश्मीर में 1.24, झारखंड में 5.68 और मध्य प्रदेश में 3.62 है, जबकि पश्चिम बंगाल में 8.91 है.
इसी रिपोर्ट में आंकड़े दिखाते हैं कि अखिल भारतीय स्तर पर कुल स्कूलों में प्राइवेट स्कूलों का प्रतिशत 22.09 है. वहीं आंध्र प्रदेश में 27, छत्तीसगढ़ में 10.9, जम्मू-कश्मीर में 17.92, झारखंड में 5, मध्य प्रदेश में 18.67 तथा पश्चिम बंगाल में 10.17 प्रतिशत प्राइवेट स्कूल हैं. आखिर क्यों इन राज्यों में सरकारी स्कूल ज्यादा हैं? क्यों नहीं प्राइवेट स्कूल खोले गये इन राज्यों में? सीधा मामला है कि यह उनके लिए लाभदायक प्रोजेक्ट नहीं होगा, क्योंकि मां-पिता के पास इतना धन ही नहीं होगा कि वे भारी फीस दे सकें.
श्री श्री रविशंकर ने छात्रों को दी जानेवाली सब्सिडी में अपनी तरफ से एक नया आयाम जोड़ा है. सब्सिडी को वर्तमान समय में गलत परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जाता है. कोई प्रोजेक्ट देश या समाज के लिए लाभदायक हो सकता है. जैसे शिक्षा का सीधा संबंध जीडीपी ग्रोथ से निकाला जा सकता है.
लेकिन घर के स्तर पर यह लाभदायक नहीं हो सकता, मां-बाप की माली हालत अच्छी नहीं हो सकती कि वे शिक्षा का खर्च उठा सकें. इसीलिए देश के जीडीपी में अगर बढ़ाव चाहिए, तो यह सरकार की जिम्मेवारी है कि वह सबको सस्ती शिक्षा सुलभ कराये. यह काम निजी क्षेत्र नहीं कर सकता, क्योंकि उसे मुनाफा चाहिए.
जाहिर सी बात है कि प्राइवेट हाथों में शिक्षा जाने से जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा, खासकर वंचित हिस्सा शिक्षा से दूर होता जायेगा. उसे रोजी-रोजगार पाने में समस्या आयेगी. और इस तरह से कई सामाजिक समस्याएं उत्पन्न होंगी.
इस साल के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता एंगस डेटन ने अपनी किताब, ‘दी ग्रेट एस्केप: हेल्थ, वेल्थ एंड दी ओरिजिन ऑफ इनइक्वाॅलिटी’ में लिखा है कि नवधनाढ्य पब्लिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा पर रोक लगाने के लिए अपनी अमीरी का प्रयोग राजनीतिज्ञों को प्रभावित करने में कर सकते हैं, क्योंकि यह सेवाएं खुद उन्हें नहीं चाहिए. श्री श्री रविशंकर को शायद यह जमीनी हकीकत न मालूम हो कि नक्सल और हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा की वस्तुस्थिति क्या है, फिर भी उनका बयान शिक्षाशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों को एक मुद्दा तो देता ही है अपनी बात रखने के लिए. अगर उनका बयान कुतर्क है, तो इसे भी तर्क से ही काटना होगा. लेकिन, जो भी आंकड़े उपलब्ध हैं, वे यही इशारा करते हैं कि जिन राज्यों में नक्सलवाद और हिंसा है, वहां शिक्षा की हालत खस्ता है.
लाभ कौन नहीं कमाना चाहेगा? प्राइवेट स्कूल वहीं खुलेंगे, जहां लाभ हो और वंचित वर्ग के लोग बच्चों को स्कूल न भेज कर लाभ बचाना चाहेंगे. लेकिन मार तो विकास खायेगा. विकास समावेशी होगा, तो सबको लाभ मिलेगा. इसीलिए स्कूल चलाने के काम का बड़ा भार तो सरकार को ही उठाना पड़ेगा.
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