मिलने-मिलाने का पर्व

Updated at : 23 Mar 2016 6:26 AM (IST)
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मिलने-मिलाने का पर्व

होली हमारे समाज का एक प्राचीन त्योहार है. भारतीय समाज की विविधता के कारण इसके मनाने के ढंग भी अलग-अलग हैं, परंतु प्रेम, समभाव और सद्भाव के रंग हर जगह मिलते हैं. उमंग में पगी टोलियों के गीत गाने और गुलाल-अबीर से एक-दूसरे को सराबोर करने के दृश्य देखे जा सकते हैं. ऊंच-नीच, छोटे-बड़े और […]

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होली हमारे समाज का एक प्राचीन त्योहार है. भारतीय समाज की विविधता के कारण इसके मनाने के ढंग भी अलग-अलग हैं, परंतु प्रेम, समभाव और सद्भाव के रंग हर जगह मिलते हैं. उमंग में पगी टोलियों के गीत गाने और गुलाल-अबीर से एक-दूसरे को सराबोर करने के दृश्य देखे जा सकते हैं.
ऊंच-नीच, छोटे-बड़े और अमीर-गरीब के भेदभाव सतरंगी छटाओं में विलीन हो जाते हैं. बहुधा रंगों में आपसी द्वेष और मतभेद भी घुलते जाते हैं. सामाजिक और आर्थिक बदलावों से हमारे जीने के तौर-तरीके भी प्रभावित हुए हैं. ऐसे में पर्व-त्योहार और उत्सव भी अछूते नहीं रह सकते हैं. कभी गांवों-कस्बोंमें सामूहिक रूप से मनाये जानेवाला होली का त्योहार आधुनिकता के दबाव में घर-पड़ोस की हद तक सिमट गया है.
रंग-अबीर लगाना अब महज औपचारिकता बन कर रह गयी है. लोगों से मिलने-जुलने की जगह हम अपने कंप्यूटर, स्मार्ट फोन या टीवी से चिपके रहते हैं. बच्चों और कामकाजी लोगों के लिए यह पर्व भी सामान्य अवकाश का एक अवसर भर रह गया है. शुभकामनाएं देने की रस्म डिजिटल संदेशों द्वारा पूरी कर ली जाती है. गोलबंद होकर पारंपरिक गीत गाने की जगह हम सीडी या मोबाइल से गाना बजा कर संतोष कर लेते हैं. सामूहिकता की कमी का ही एक खराब नतीजा यह है कि उद्दंडता उत्सव पर हावी हो गयी है.
खतरनाक रंगों, पेंट, ग्रीस आदि का उपयोग और अश्लील हरकतें इस उत्सव के मूल तत्वों को नुकसान पहुंचाती हैं. उत्सव हमारे जीवनधर्मिता का अभिन्न अंग हैं. उनके कमतर होते जाने से जीवन का रस और अर्थ भी घटते चले जाते हैं. इसलिए, यह जरूरी है कि होली जैसे अवसरों की बुनियादी विशेषताओं को बचाया जाये और उन्हें बेहतर बनाया जाये.
मिलने-जुलने और गिले-शिकवे दूर करने के इस मौके को प्रासंगिक और बेहतर बनाने की जिम्मेवारी हम सबकी है. हमें उन प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करना चाहिए, जिनके कारण त्योहार का आनंद कम होता है. प्रेम और सद्भाव के संदेशों को गुंजायमान करना होगा, जिनकी हमारे समाज में भारी कमी होती जा रही है. शांतिपूर्ण और मिलनसार समाज ही विकास की ओर उन्मुख हो सकता है.
इसके लिए समाज को उत्सवधर्मी बने रहना होगा तथा होली जैसे पर्वों के अर्थ युवा पीढ़ी तक पहुंचाने होंगे. यह उत्सव हमारे रोजमर्रा के जीवन की उदासी को भी रंग देता है. पाठकों को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं देने के साथ ही प्रभात खबर परिवार इस उम्मीद से भी लबरेज है कि यह होली मेल-मिलाप के एक नये साल की रंगारंग शुरुआत होगी.
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