नकाबपोश डिपोजिटर

डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार बैंक पहले रुपये-पैसे जमा करवानेवाली संस्था को कहा जाता था, आज वह रुपये-पैसे लुटवानेवाली संस्था हो गयी है. अमीर आदमी बैंक से कर्ज लेता है और गरीबी के कारण उसे चुका नहीं पाता, तो बैंक उसे वह कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज दे देता है और चूंकि और ज्यादा […]
डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
बैंक पहले रुपये-पैसे जमा करवानेवाली संस्था को कहा जाता था, आज वह रुपये-पैसे लुटवानेवाली संस्था हो गयी है. अमीर आदमी बैंक से कर्ज लेता है और गरीबी के कारण उसे चुका नहीं पाता, तो बैंक उसे वह कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज दे देता है और चूंकि और ज्यादा गरीब हो जाने के कारण वह अमीर आदमी उसे भी नहीं चुका पाता, अत: सरकार के कहने पर बैंक उसे बट्टे खाते में डाल देते हैं.
इसमें शायद उसका यह सोच भी आड़े आ जाता हो कि जब पहला कर्ज ही नहीं चुका पाया, तो दूसरा कैसे चुकाऊं, क्योंकि सिद्धांतत: पहले पहला कर्ज चुकाना चाहिए, बाद में दूसरा, और अगर वह दूसरा कर्ज पहले चुका देगा तो इससे एक गलत परंपरा पड़ जायेगी. अमीर आदमी इस तरह, आम धारणा के विपरीत, न केवल काफी गरीब होता है, बल्कि काफी सिद्धांतवादी भी होता है.
बैंकों में एक बड़ा बदलाव यह भी आया है कि रुपये-पैसे के लेनदेन के अलावा वहां और भी बहुत-कुछ होने लगा है, जिसकी जिम्मेवारी भी स्वभावत: बैंककर्मियों पर डाली जाती है.
वे बेचारे रावण द्वारा सीता मैया का अपहरण कर लेने पर भगवान राम द्वारा हर आते-जाते से सीता के बारे में पूछने की तरह, बैंक में और बैंक के बाहर भी, हर आने-जानेवाले से कभी बीमा करवा लेने की गुहार लगाते हैं, तो कभी जनधन आदि विभिन्न सरकारी योजनाओं में शामिल होने की. इसका पता मुझे बैंक की एक शाखा में जाने पर चला.
बैंक की वह शाखा अभी खुली नहीं थी, पर खुलनेवाली थी. भीतर कर्मचारी अपनी-अपनी जगहों पर ग्राहकों का सामना करने के लिए जिरह-बकतर वगैरह से लैस हो गये थे.
गलतफहमी दूर करने के लिए बताता चलूं कि इस जिरह-बकतर में जो ‘जिरह’ शब्द है, वह फारसी का ‘जिरह’ नहीं है, जिसका मतलब फौलाद की कड़ियों का बना कवच होता है, बल्कि अरबी का ‘जिरह’ है, जिसका मतलब बहस, हुज्जत और तकरार होता है. यानी कर्मचारी ग्राहकों द्वारा अपने खाते और विभिन्न सरकारी योजनाओं के बारे में की जानेवाली बहसबाजी का मुकाबला करने के लिए बहसबाजी के ही बकतर से लैस हो गये थे.
जैसे यह कि- हमें पता चला है कि मोदी ने तो विदेशों से काला धन वापस लाकर हर आदमी के खाते में उसके हिस्से के पंद्रह-पंद्रह लाख रुपये कब के जमा करवा दिये हैं, फिर तुम क्यों बदमाशी कर रहे हो और क्यों नहीं वे रुपये हमें दे देते? अरबी का तो पता नहीं, पर फारसी वह अद्भुत भाषा रही है, जिसे पढ़ कर कुदरत के एक खेल के मुताबिक आदमी तेल बेचने लगता था. वह ऐसा क्यों करता था, यह अलबत्ता कोई भुक्तभोगी भाषावैज्ञानिक ही बता सकता है, जो फारसी पढ़ कर खुद भी तेल बेचने का धंधा करने लगा हो.
बहरहाल, इस शब्द-चर्चा के दौरान पता नहीं कब शाखा का दरवाजा खुल गया और ग्राहकों का रेला अंदर घुस गया. उन्हें देख ऐसा लगता था कि देश में लोगों को बैंक आने-जाने के अलावा और कोई काम नहीं रह गया है. उसी समय एक नकाबपोश भी सुरक्षा-गार्ड को धकियाता हुआ अंदर घुस आया और बैंककर्मियों पर पिस्तौल तान दी. सारे बैंक-कर्मी घबराने की मुद्रा में आ गये और ग्राहक भी इस पवित्र कार्य में उनका साथ देने लगे.
तभी वह नकाबपोश बैंककर्मियों को धमकाते हुए बोला- खबरदार, कोई अपनी जगह से हिला तो! मैं बैंक में सिर्फ पैसा जमा कराने आया हूं, किसी बैंक-कर्मी ने मुझे जबरदस्ती कोई बीमा, पेंशन-योजना या कोई भी अन्य योजना बेचने की कोशिश की, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा!
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