चली-चली रे मेरी साइकिल

Updated at : 09 Mar 2016 5:46 AM (IST)
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चली-चली रे मेरी साइकिल

क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार उन दोनों भाइयों को सवेरे के वक्त सरपट साइकिल दौड़ाते पाया. पता चला कि वे लगभग तीस किलोमीटर दूर साइकिल से दफ्तर जाते हैं. हफ्ते में कितने दिन पूछने पर बोले-तीन दिन. यानी तीन दिनों में दोनों मिल कर 360 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं. बताते हैं कि शुरू में पांवों में […]

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क्षमा शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

उन दोनों भाइयों को सवेरे के वक्त सरपट साइकिल दौड़ाते पाया. पता चला कि वे लगभग तीस किलोमीटर दूर साइकिल से दफ्तर जाते हैं. हफ्ते में कितने दिन पूछने पर बोले-तीन दिन. यानी तीन दिनों में दोनों मिल कर 360 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं. बताते हैं कि शुरू में पांवों में बहुत दर्द हुआ. मन किया कि छोड़ दें, मगर अब आदत पड़ गयी है.

अपने इस निर्णय पर खुश ये लड़के कहते हैं कि व्यायाम, स्वास्थ्य, प्रदूषण में कमी और पैसे की बचत, ये चार फायदे हैं साइकिल चलाने के. जो साइकिल कुछ अरसा पहले तक गरीब की सवारी मानी जाती थी, वही अब बहुराष्ट्रीय निगमों में काम करनेवाले युवाओं का स्टाइल और फैशन स्टेटमेंट बन चली है. एक से एक बढ़िया और महंगी साइकिलें बाजार में उपलब्ध हैं. बताया जाता है कि जवाहरलाल नेहरू विवि के नये उपकुलपति जगदीश कुमार कार से नहीं, साइकिल से दफ्तर जाते हैं. पुराने जमाने में फिल्मों में हीरोइंस भी साइकिल चलाते और गाना गाते नजर आती थीं. साइकिल चलाती लड़कियों को तब अजूबे भाव से देखा जाता था.

बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लड़कियों को साइकिलें क्या दीं, लड़कियों की तकदीर ही बदल गयी. बड़ी संख्या में लड़कियां स्कूल जाने लगीं. स्कूल जाने के अलावा घर के दूसरे काम भी इसी साइकिल से होने लगे. और तो और, हाल ही में हुए चुनाव में लड़कियां अपने घर की महिलाओं को इन्हीं साइकिलों पर बिठा कर वोट डलवाने भी ले गयी थीं.

हालांकि, जब नीतीश कुमार ने लड़कियों को साइकिल देने की बात कही थी, तब बहुत से लोगों ने इसका वही घिसे-पिटे तर्क देकर विरोध किया था कि लड़कियां बिगड़ जायेंगी. लोग बताते हैं कि अब वे ही लोग अपनी लड़कियों की साइकिलों के पीछे बैठ कर जाते हैं. यदि उनके पास साइकिल नहीं है, तो अपनी लड़कियों के लिए साइकिल की मांग भी करते हैं.

जब साइकिल की खोज हुई थी, तो इंग्लैंड में इसे शैतान की सवारी कहा गया था. इसे न चलाने के फतवे तक जारी किये गये थे. तब साइकिल कंपनियां बाकायदा मैदानों में साइकिल चलाने की प्रतियोगिता आयोजित करती थीं.

इनाम दिये जाते थे. अपने यहां भी एक जमाने में साइकिल दौड़ प्रतियोगिता बहुत से काॅलेजों में आयोजित की जाती थी. आमिर खान द्वारा अभिनीत फिल्म- जो जीता वही सिकंदर, काॅलेज में होनेवाली साइकिल रेस की कहानी बहुत ही सुंदर ढंग से कहती है.

स्विट्जरलैंड के शहर जिनेवा में लिनियो नामक एक जगह है. लिनियो अपने आप में एक छोटा मगर संपूर्ण शहर जैसा है. चारों तरफ पहाड़ियों और हरियाली से घिरा हुआ है. बेशुमार फूल और पार्कों में घास पर पड़े दिखाई देते छोटे-छोटे शंख मिलते हैं. लिनियो के बीचोबीच एक बड़ा बाजार है. यहां की एक दुकान में नन्ही-नन्ही बहुत सी साइकिलें एक खिड़की पर सजी हैं. यहां इनका इतिहास बताया गया है. यानी जब साइकिल शुरू हुई थी, तब कैसी थी और अब कैसी है, साइकिल के जीवन में अब तक कितने परिवर्तन हुए हैं, रूप-रंग कितना बदला है आदि.

यहां रखी ये मिनी साइकिलें बहुत से रंगों की हैं. जो साइकिल अब बेहद मामूली लगती है, उसे बनाने और विकसित करने में कितना श्रम और कितने वर्ष लगे हैं, मिनी साइकिलों को देख यह पता चलता है. साइकिल को उसके मौजूदा रूप तक लानेवालों का नाम शायद ही कोई जानता हो. न ही कभी किसी ने जानने में दिलचस्पी दिखायी है. कुल मिला कर कहें, तो साइकिल की इस अद्भुत यात्रा को देखना एक अनोखा अनुभव है.

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