अमीरों की हायतौबा!

Updated at : 01 Mar 2016 11:59 PM (IST)
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अमीरों की हायतौबा!

वित्त वर्ष 2016-17 के आम बजट से एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 29 फरवरी को उनकी परीक्षा होनी है, सवा सौ करोड़ देशवासियों की उन पर नजर होगी. बजट में ग्रामीणों और किसानों के लिए कुछ विशेष प्रावधानों के साथ-साथ एक करोड़ रुपये से अधिक आय पर सरचार्ज 12 से […]

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वित्त वर्ष 2016-17 के आम बजट से एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 29 फरवरी को उनकी परीक्षा होनी है, सवा सौ करोड़ देशवासियों की उन पर नजर होगी. बजट में ग्रामीणों और किसानों के लिए कुछ विशेष प्रावधानों के साथ-साथ एक करोड़ रुपये से अधिक आय पर सरचार्ज 12 से बढ़ा कर 15 फीसदी करके सरकार ने इस आरोप से पीछा छुड़ाने की कोशिश की है कि यह अमीरों की सरकार है.

अमीरों पर बढ़े सरचार्ज और महंगी गाड़ियों पर अतिरिक्त सेस जैसे कुछ उपायों से प्राप्त राशि नगण्य ही सही, लेकिन देश में लगातार बढ़ती आर्थिक गैर-बराबरी को पाटने की दिशा में सरकार की सकारात्मक पहलकदमी का संकेत करती है.

विरोधाभासों के देश भारत में अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ती खाई एक चमकता हुआ विरोधाभास है. लेकिन जब भी इस खाई को पाटने की बात होती है, अमीर तो अपने नैतिक दायित्व से मुंह मोड़ते ही रहे हैं, ज्यादातर मौकों पर सरकारें भी सामाजिक समानता बहाल करने के अपने संवैधानिक दायित्व से बचने के तरीके खोजती रही हैं.
आज के भारत के बारे में हाहाकारी सच यह है कि देश के एक फीसदी शीर्ष धनकुबेरों के पास देश की संपदा का 53 फीसदी हिस्सा है, जबकि दस फीसदी शीर्ष अमीर देश की कुल संपदा के 76 फीसदी हिस्से पर काबिज हैं. बीते तीन दशकों (1984-85 से लेकर 2014-15) में देश की जीडीपी का मोल 45 गुणा बढ़ कर ढाई लाख करोड़ से 113 लाख करोड़ रुपये हो गया है, लेकिन इस बढ़वार का सर्वाधिक हिस्सा चंद धनकुबेरों के हाथ में चला गया है. गैर-बराबरी की ऐसी स्थिति को लोकतंत्र में बहुजन के हित के लिए खतरनाक मान कर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने दुनियाभर में इस बहस को फिर से जिंदा किया है
कि जो लोग अपेक्षाकृत ज्यादा धनी हैं उन पर ज्यादा टैक्स लगना चाहिए, ताकि जन-सामान्य की स्वतंत्रताओं को बाधित करनेवाली स्थितियों- गरीबी, अशिक्षा, बीमारी आदि- को खत्म करने में सरकारी खर्चा बढ़ाया जा सके. संयुक्त राष्ट्र भी दुनियाभर में लोगों के जीवन से जुड़ी रिपोर्ट जारी करते वक्त ताकीद करता रहा है कि असमानता को कम करना हर देश की जिम्मेवारी है. फिर भी, धनिक ही नहीं,
सरकारें भी अपनी करनी और कथनी से जाहिर करती रही हैं कि आर्थिक गैर-बराबरी को बढ़ने से रोकने का जिम्मा उनका नहीं है. अपने देश की ही बात करें तो ‘इनहेरिटेंस टैक्स’ 1985 में ही खत्म कर दिया गया था. तब यह बहुत ज्यादा (बीस लाख रुपये से ज्यादा की संपदा हासिल होने पर 85 प्रतिशत) हुआ करता था. वेल्थ टैक्स भी खत्म किया जा चुका है.
इस समय देश में अमीरों को ढूंढना कोई मुश्किल काम नहीं है. देश में महंगे होटलों, मॉल्स और ज्वैलर्स का कारोबार बुलंदी पर है, हवाई सफर करनेवालों की संख्या और महंगी गाड़ियों की बिक्री लगातार बढ़ रही है, करोड़ों के घर धड़ल्ले से खरीदे-बेचे जा रहे हैं, लेकिन बात जब टैक्स देने की आती है, तो अमीरों की जमात गायब हो जाती है. केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने पिछले दिनों एक टीवी कार्यक्रम में बताया है कि देश में कुल करीब 24 करोड़ परिवारों में से चार करोड़ ही इनकम टैक्स भर रहे हैं. इनमें से सिर्फ 83 हजार परिवार ऐसे हैं,
जिनकी घोषित आय एक करोड़ से ज्यादा है. जयंत सिन्हा के मुताबिक, तमाम करों से केंद्र सरकार की कमाई करीब 12 लाख करोड़ रुपये ही है, जबकि उसके खर्चे करीब 18 लाख करोड़ रुपये हैं. इस तरह सरकार सालाना करीब 5.6 लाख करोड़ रुपये के घाटे में जा रही है और उस पर कुल ऋण करीब 70 लाख करोड़ रुपये का हो चुका है. इस ऋण पर सालाना 4.6 लाख करोड़ रुपये ब्याज में देना पड़ रहा है, जो कुल कर प्राप्ति का करीब 40 फीसदी है.
ऐसी दुरूह वित्तीय स्थिति के बावजूद देश में जीडीपी में टैक्स का अनुपात सिर्फ 16-17 फीसदी है, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन आदि में करीब 29 फीसदी. भारत में अधिकतम टैक्स दर भी 35 फीसदी ही है, जबकि चीन और ब्रिटेन में 45 फीसदी और अमेरिका में 55 फीसदी से ज्यादा है. इस स्थिति के बावजूद नये बजट में एक करोड़ से ज्यादा की आय वाले लोगों पर सरकार ने सरचार्ज 12 प्रतिशत से बढ़ा कर 15 फीसदी क्या कर दी, धनिकों के बीच फिर से हायतौबा मचने लगी है.
जबकि, देश के सतत विकास के लिए जरूरी है कि जिनकी आमदनी करोड़ों में है, उनसे अधिक कर वसूला जाये. साथ ही जो लोग विभिन्न गैरकानूनी एवं भ्रष्ट तौर-तरीकों से अपनी आय छिपाते हैं, उन्हें कर दायरे में लाने के ठोस उपाय किये जाएं. जरूरी यह भी है कि करों से सरकार के खजाने में जमा होनेवाली राशि को विकास और कल्याण के नाम पर खर्च करते समय भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने से बचाया जाये और उनका देशहित में अधिकतम उपयोग हो.
दूसरी ओर, देश में आयकर देनेवालों में बड़ी संख्या वेतनभोगी कर्मचारियों की है, जिनकी कंपनियां सुनिश्चित करती हैं कि उनकी आमदनी से टैक्स का निर्धारित हिस्सा काट कर सरकारी खजाने में समय पर पहुंच जाये. एक निम्न एवं मध्यमवर्गीय कर्मचारी की भविष्य की सुरक्षा का सबसे बड़ा साधन पीएफ और पेंशन निधि है. इसे टैक्स दायरे में लाने के किसी भी विचार पर सरकार को निश्चित रूप से पुनर्विचार करना चाहिए.
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