आजादी! श्श्श्श...! राष्ट्रदोही हैं क्या?

Updated at : 18 Feb 2016 1:38 AM (IST)
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आजादी! श्श्श्श...! राष्ट्रदोही हैं क्या?

नासिरुद्दीन वरिष्ठ पत्रकार क्या कहें, क्या न कहें? किसी पोस्ट या टिप्पणी के साथ किसे टैग करें, किसे न करें? क्या साझा करें, क्या न करें? यह दुविधा भी है और मुश्किल भी? जो भी है, पर यह दिनों-दिन बढ़ती जा रही है. अगर नाम और आस्था के तरीके ‘कुछ’ बताते हैं और पहचान की […]

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नासिरुद्दीन

वरिष्ठ पत्रकार

क्या कहें, क्या न कहें? किसी पोस्ट या टिप्पणी के साथ किसे टैग करें, किसे न करें? क्या साझा करें, क्या न करें? यह दुविधा भी है और मुश्किल भी? जो भी है, पर यह दिनों-दिन बढ़ती जा रही है. अगर नाम और आस्था के तरीके ‘कुछ’ बताते हैं और पहचान की कई परत चढ़ी है, तो दुविधाएं या मुश्किलें और बढ़ जा रही हैं. अनेक पहचान यानी अनेक मुश्किलें. दुविधाओं की तह-दर-तह.

एक नयी दुविधा/मुश्किल इन दिनों कई लोगों के सर आ खड़ी हुई है. क्या न कहें/ क्या न करें, जो ‘राष्ट्र’ से ‘द्रोह’ न माना जाये. इस वक्त कोई तगमा बड़ी आसानी से मिल रहा है, तो वह ‘राष्ट्रद्रोह’ का ही है. जिसे देखिए, वही बांटे जा रहा है. इसके साथ गंदी-गंदी गालियां, ढेरों विशेषण और लात-घूंसे बोनस में दे रहा है.

देखने और सुनने में तो यह मामूली-सी बात लगती है, मगर यह सबके लिए मामूली नहीं है. हमारे समाज की दस फीसदी आबादी दुविधाओं/मुश्किलों से आजाद है. वह कुछ भी कर या कह सकती है. अब जो नब्बे फीसदी हैं, वे भी दुविधाओं/ मुश्किलों से ऐसी ही आजादी चाहते हैं. खासतौर पर वे लोग जिनकी जिंदगी का नाम जद्दोजहद है.

करीब तीन दशक से एक गीत जगह-जगह सभाओं और जुलूसों में सुना जा रहा है. इस गीत के लिखे रूप के बारे में पता नहीं. अलग-अलग समूह अलग-अलग तरीके से गाते हैं. महिलाएं अपने हिसाब से तो दलित अपने हिसाब से. अब मुश्किल यह है कि इस गीत में बार-बार आजादी का जिक्र आता है.

दुविधा यह है, कहीं इसे गाना अब राष्ट्रद्रोह तो नहीं माना जायेगा? जैसे- हिंसा मुक्त माहौल की मांग करनेवाली लड़कियां गाती हैं- आजादी ही आजादी, हमें चाहिए हिंसा से आजादी… हमें चाहिए डर से आजादी… बहना मांगे, जीने की आजादी… हमें चाहिए बराबरी का हक… हम लेकर रहेंगे बराबरी का हक. तेजाब से जला दिये जानेवाले दलित गायेंगे- हमें चाहिए जातिवाद से आजादी… हमें चाहिए छुआछूत से आजादी. शराब के खिलाफ आंदोलन करनेवाली महिलाएं गाती हैं… मेरी बहना मांगें शराब से आजादी. दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद करनेवाले गाते हैं… हमें चाहिए भूख से आजादी… हमें चाहिए रोजगार की आजादी… आजादी ही आजादी.

इतनी आजादी! अब सवाल यह है कि ये ‘आजादियां’ किसे नागवार गुजरेंगी?

दुविधा तो यह भी है कि फैज अहमद फैज की आजादी के मौके पर लिखी गयी नज्म ‘वह इंतजार था जिसका, ये वह सहर तो नहीं…’ अब पढ़ा जाये या नहीं! साहिर लुधियानवी का गीत, ‘ये लुटते हुए कारवां जिंदगी के… जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं, कहां हैं…’ सुना जाये या नहीं! और तो और… यह देखिए कि अदम गोंडवी उर्फ रामनाथ सिंह ने क्या लिख डाला-

सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं।

दिल पर रख कर हाथ कहिए देश क्या आजाद है।।

ये सब तो चले गये. अब हमारी मुश्किल है. यदि हम ये सब पढ़ें या सुनें या गायें, तो कहीं राष्ट्रद्रोही तो नहीं कहे जायेंगे?

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