हिंदी में भाषाविदों की पूछ नहीं है

Updated at : 11 Feb 2016 1:52 AM (IST)
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हिंदी में भाषाविदों की पूछ नहीं है

प्रभात रंजन कथाकार हिंदी में भाषा को गंभीरता से नहीं लिया जाता है क्या? मैं हिंदी का विद्यार्थी रहा हूं, हिंदी का लेखक हूं, हिंदी का पत्रकार रहा हूं, ब्लॉगर हूं. पिछले सालों में इस सवाल ने मुझे बहुत परेशान किया है. अभी फिर से यह सवाल मन में कौंधा है, तो इसका एक कारण […]

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प्रभात रंजन
कथाकार
हिंदी में भाषा को गंभीरता से नहीं लिया जाता है क्या? मैं हिंदी का विद्यार्थी रहा हूं, हिंदी का लेखक हूं, हिंदी का पत्रकार रहा हूं, ब्लॉगर हूं. पिछले सालों में इस सवाल ने मुझे बहुत परेशान किया है. अभी फिर से यह सवाल मन में कौंधा है, तो इसका एक कारण यह है कि यह ‘समांतर कोश’ के प्रकाशन का बीसवां साल है. हिंदी के पहले थिसॉरस का, जिसे अरविंद कुमार ने तैयार किया था.
लेकिन, हिंदी में भाषा के इस गौरव ग्रंथ को कितने लोग याद करते हैं? किसी हिंदी विभाग में उसको महत्व दिया जाता है क्या?
हिंदी में पिछले बीस सालों में भाषा के काम का सबसे अधिक विस्तार हुआ है. मीडिया, अनुवाद ने हिंदी भाषा को केंद्र में ला दिया है, लेकिन आज भी हिंदी के विमर्श के केंद्र में साहित्य ही है. हम हिंदी वाले गल्पजीवी लोग होते हैं. भाषा के विकास के लिए कोई कितना भी काम कर ले, कितने भी ग्रंथ आ जायें, शोध वगैरह कविता-संग्रहों, कहानी संग्रहों, उपन्यासों पर ही होते हैं.
दुख जिस बात का होता है वह यह है कि मैं हिंदी का अच्छा विद्यार्थी रहा, दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ा, लेकिन जब पहली बार पत्रकारिता करने गया, तो यह समझ में आया कि भाषा की एकरूपता, उसके प्रयोगों, छोटे-छोटे वाक्य लिखना, एक जैसे अनुच्छेद लिखना कितना जरूरी होता है.
सच बताऊं हिंदी में पीएचडी करने के बावजूद, डीयू में टॉप करने के बावजूद मुझे भाषा के इन बुनियादी पहलुओं के बारे में जानकारी नहीं थी. कारण बहुत साफ था कि हमारे हिंदी विभागों के आचार्यों ने जो पाठ्यक्रम बनाया है, जिस तरह के पाठ्यक्रम बनाये-पढ़ाये जाते रहे हैं, उनमें भाषा के ऊपर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. इस बात की कोई कोशिश भी नहीं की जाती है कि विद्यार्थियों को भाषा प्रयोगों की बारीकियों से भी वाकिफ करवाया जाये.
एक बड़ा मजेदार वाकया है. तब मैं जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय में पढ़ाता था. वहां हिंदी के एक बड़े आचार्य से मैंने बालसुलभ कौतूहल के साथ यह सवाल किया था कि हिंदी में मीडिया में काम बढ़ रहा है, जहां भाषा ज्ञान प्रमुख होता है, लेकिन भाषा प्रयोगों को लेकर एक पेपर तक नहीं पढ़ाया जाता है. ऐसा क्यों? उन्होंने गुटका थूकते हुए जवाब में एक शेर सुना दिया था- ‘जो इश्क करने का ढब जानते हैं/ वो तरकीब वरकीब सब जानते हैं.’ कहने का मतलब यह कि भाषा तो आदमी अपने आप सीख लेता है. असली बात तो विचार होता है, साहित्य होता है, अभिव्यक्ति होती है, अभिव्यक्ति का आत्मसंघर्ष होता है.
भाषा के प्रति यही रवैया है हिंदी के मेनस्ट्रीम का, जो भाषा के क्षेत्र में युगांतकारी काम करनेवालों को याद नहीं करता. कोश बनानेवाले, थिसॉरस बनानेवाले इस भाषा में हाशिये पर ही रह जाते हैं.
आज किशोरी दास वाजपेयी, कामिल बुल्के, हरदेव बाहरी को कौन याद करता है. अरविंद कुमार और उनका ‘समांतर कोश’ तो समकालीन कृति है.
ऐसे समय में इस बात की तरफ शिद्दत से ध्यान जाने का एक कारण यह है कि हिंदी में भाषा का प्रयोग पहले से बहुत अधिक बढ़ गया है, लेकिन भाषा प्रयोगों की अराजकता भी बढ़ी है. यह साहित्य से अधिक भाषा पर ध्यान देने का समय है!
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