अमेरिका में समाजवाद की धमक

Updated at : 08 Feb 2016 1:34 AM (IST)
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अमेरिका में समाजवाद की धमक

एक दिलचस्प उतार-चढ़ाव में सांडर्स और उनके ठीक उलट डोनाल्ड ट्रंप को आश्चर्यजनक बढ़त इसलिए मिल रही है, क्योंकि उन्होंने परंपरागत सत्ता की शक्ति जिसमें सबसे बड़ी पैसे की ताकत है के खिलाफ मध्य वर्ग और गरीबों को उकसाया है. ट्रंप चीखते हैं, सांडर्स मृदुभाषी हैं. ट्रंप नस्लभेदी है, सांडर्स समावेशी हैं. हमें कई बार […]

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एक दिलचस्प उतार-चढ़ाव में सांडर्स और उनके ठीक उलट डोनाल्ड ट्रंप को आश्चर्यजनक बढ़त इसलिए मिल रही है, क्योंकि उन्होंने परंपरागत सत्ता की शक्ति जिसमें सबसे बड़ी पैसे की ताकत है के खिलाफ मध्य वर्ग और गरीबों को उकसाया है. ट्रंप चीखते हैं, सांडर्स मृदुभाषी हैं. ट्रंप नस्लभेदी है, सांडर्स समावेशी हैं.

हमें कई बार बताया गया है कि अजूबे होते रहते हैं, परंतु अभी जो अजूबा हम देख रहे हैं, उसका बखान शब्दों में बयान कर पाना बहुत ही मुश्किल है. अमेरिका के ह्वाइट हाउस में पहुंचने की दौड़ में एक स्व-घोषित समाजवादी भरोसेमंद उम्मीदवार बन कर उभर रहा है. किसी अध्यापक और 1970 के दशक के वामपंथी की तरह दिखनेवाले पके बालों वाले बर्नी सांडर्स तालियां बजाते हुए दर्शकों को कहते भी हैं- उनकी उम्मीदवारी अमेरिका में एक क्रांति की शुरुआत है! समाजवादी क्रांति! आखिर मुक्त पूंजीवाद और बहादुर नागरिक के देश में यह क्या हो रहा है? हालांकि, इसका जवाब जटिल नहीं है. युवा फिर एक बार आगे हैं, और वे एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था से थक चुके हैं, जो एक फीसदी अभिजात्य के पक्ष में झुका है, जिसके कब्जे में देश के धन का बहुत बड़ा हिस्सा जमा होता जा रहा है.

एक दशक पहले समाजवाद जैसी खतरनाक विचारधारात्मक विषाणु से ग्रस्त होने का दावा करने जैसी मूर्खता करता, तो उसे मानसिक रोगियों के आवास के समतुल्य राजनीतिक हाशिये पर धकेल दिया जाता. ऐसा नहीं है कि दुनिया के इस प्रमुख आर्थिक महाशक्ति के यहां वामपक्ष नहीं रहा है, लेकिन कभी-भी वह हाशिये से ऊपर नहीं उठ सका. सत्तर और अस्सी के अभागे दशकों में राल्फ नादेर जैसे आदर्श थे, लेकिन वे उपभोक्ता कार्यकर्ता और ट्रेड यूनियनिस्ट थे, जो अपने एक सीमित एजेंडे पर काम करते थे. जब उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर जगह बनाने की कोशिश की, तो उन्हें दो प्रतिशत से भी कम वोट मिले. लेकिन, बीसवीं सदी के साथ उनके भी पटाक्षेप हो जाने के बावजूद उनकी कोशिशों की कुछ उपलब्धियां रहीं, क्योंकि उन्होंने व्यावहारिक सुधार तथा उत्पादों में बेहतरी के सुझाव दिये थे. उनकी इसी सफलता ने उन्हें अप्रासंगिक बना दिया. वॉल स्ट्रीट के बड़े जानवर आर्थिक जंगल के मालिक बने रहे, मध्यम वर्ग से करोड़पति बनने के अपने सपने बेहद चतुराई से बांटते रहे और अपने नेतृत्व के साथ कोई समझौता करने की गलती किये बिना अपने पूंजीवाद को पुनर्परिभाषित करते रहे.

यह कामयाब रहा. बड़े बहुमत से मतदाताओं ने इस बात को स्वीकार किया कि पूंजीवाद राष्ट्रीय झंडे का पर्यायवाची है, और उन्हें इसके लिए कोई दोष भी कैसे दे सकता है? इस समझ ने कामयाबी भी दर्ज की. इसने अवसरों से लबरेज कर और आय में बढ़ोतरी कर अमेरिका को इतिहास का सबसे धनी देश बनाया, जिससे आम जन-जीवन बेहतर हुआ. समाजवाद के उल्लेखमात्र से अमेरिकियों को परेशानी होने लगती थी, जिसे वे ऐसी समझ मानते थे, जिसने सोवियत संघ से शीत युद्ध के रूप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की पीढ़ी के सामने गंभीर खतरे पैदा किये. बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध का यह सबसे निर्णायक विवाद था, जिसे उस तनाव और गंभीरता से लड़ा गया, जो सिर्फ अस्तित्व पर खतरे की स्थिति में ही पैदा हो सकती है.

शीत युद्ध के दौरान परमाणु विनाश का खतरा मंडराता रहा था. इस शीत युद्ध में जीत ने बाजार के दर्शन में फिर से भरोसा पैदा किया, जिसने विजय हासिल की थी, और यह तार्किक था. और तब, अमेरिका का दक्षिणपंथ अपनी ही सफलता का शिकार हो गया. इसका निर्णायक मोड़ निश्चित रूप से इस सदी के पहले दशक का वित्तीय संकट था. इस बीमारी को पहचान लिया गयाः लालच, या अधिक ठीक से कहें, तो विश्वास से अधिक लोलुपता. आय विषमता स्वार्थ की हद को पार कर गयी. आवासीय संकट के समय सीधे तौर पर पकड़े जाने पर भी बैंकरों को दोष नहीं दिया गया. अमेरिका ने वॉल स्ट्रीट को जिम्मेवार ठहराने के बजाये उसे संकट से उबार दिया.

तब भले ही इस पर प्रतिक्रिया नहीं आयी, लेकिन यह दबी नहीं रह सकती थी. सबसे पहले किताबों ने साबित किया और फिल्मों ने दिखाया कि वॉल स्ट्रीट एक सदी तक नायक रहने के बाद अब खलनायक हो चुका है. अभी माइकल लेविस की किताब पर आधारित फिल्म ‘द बिग शॉर्ट’ खूब सफल हो रही है. अब खुद कानून बन बैठे बैंकरों की अनैतिकता के खिलाफ लेविस ने जम कर बोला है.

लेकिन, पॉपुलर संस्कृति में सहजीवी शब्दों के अर्थ को बदलना इतना आसान नहीं होता है. ‘समाजवाद’ आम चर्चा में स्वीकार्य कैसे हो गया?

मुझे इसका उत्तर सीएनएन पर चल रहे एक टेलीविजन बहस से मिला. अमेरिकी समाचार कार्यक्रम कठिन होते हैं, लेकिन सौभाग्य से वहां किसी को चिल्लाने की अनुमति नहीं होती है. टेलीविजन झगड़े को फर्जी पहलवानी जैसे दिखावटी खेल तक ही सीमित रखता है. आप लोगों की बात सचमुच में सुन सकते हैं. एक चतुर टिप्पणीकार ने विश्लेषित किया कि ‘समाजवादी’ राजनीति के शीर्ष तक धुर दक्षिणपंथी समाचार चैनल फॉक्स न्यूज की वजह से पहुंचे हैं. लगभग आठ सालों से, जब से बराक ओबामा राष्ट्रपति बने हैं, फॉक्स न्यूज ओबामा को बदनाम करने की उम्मीद में उन्हें समाजवादी कहता रहा है. लेकिन, दर्शकों को बराक ओबामा का कामकाज पसंद है, और अगर सही में यही समाजवाद है, तो उन्हें इससे कोई परेशानी नहीं है. बहुत खूब!

एक दिलचस्प उतार-चढ़ाव में सांडर्स और उनके ठीक उलट डोनाल्ड ट्रंप को आश्चर्यजनक बढ़त इसलिए मिल रही है, क्योंकि उन्होंने परंपरागत सत्ता की शक्ति, जिसमें सबसे बड़ी पैसे की ताकत है, के खिलाफ मध्य वर्ग और गरीबों को उकसाया है. ट्रंप चीखते हैं; सांडर्स मृदुभाषी हैं. ट्रंप नस्लभेदी है, सांडर्स समावेशी हैं. लेकिन इस विद्रोह को एक दक्षिण की ओर से नेतृत्व दे रहा है, दूसरा वाम पक्ष से. दोनों उस यथास्थिति के खात्मे की मांग कर रहे हैं, जो सिर्फ चंद लोगों की सेवा करती है.

किसी को नहीं पता कि अगले पखवाड़े में इस स्थिति में क्या बदलाव होगा, इसके अंत की तो बात ही छोड़ दें. लेकिन एक बात तो तय है. अमेरिकी बदल गये हैं. अमेरिकी राजनेताओं का अमेरिकियों का अनुसरण करना होगा.

एमजे अकबर

राज्यसभा सांसद, भाजपा

delhi@prabhatkhabar.in

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