आती रहना इस देश मेरी लाडो!

Updated at : 06 Feb 2016 6:25 AM (IST)
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आती रहना इस देश मेरी लाडो!

डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार हरियाणा कई दृष्टियों से एक अनोखा राज्य है. उसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि एक प्रदेश होते हुए भी हरियाणावासियों की नजरों में वह एक देश है. वह भी कोई साधारण देश नहीं, बल्कि अन्य सभी देशों से बढ़ कर. तभी तो वे कहते हैं- देसां मैं देस हरियाणा. […]

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डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
हरियाणा कई दृष्टियों से एक अनोखा राज्य है. उसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि एक प्रदेश होते हुए भी हरियाणावासियों की नजरों में वह एक देश है. वह भी कोई साधारण देश नहीं, बल्कि अन्य सभी देशों से बढ़ कर.
तभी तो वे कहते हैं- देसां मैं देस हरियाणा. भारत का केवल एक ही और राज्य है, जो उसकी इस विशेषता का मुकाबला कर पाता है और वह है महाराष्ट्र. दुनिया की नजरों में भारत भले ही केवल एक राष्ट्र हो, लेकिन इस राष्ट्र को यह गौरव प्राप्त है कि इस राष्ट्र के भीतर एक महा राष्ट्र भी है.
महाराष्ट्र भी इस मामले में हरियाणा का मुकाबला नहीं कर सकता कि हरियाणा वाले गेहूं-चावल वगैरह नहीं खाते.क्योंकि, जो सूक्ति यह कहती है कि देसां मैं देस हरियाणा, वही उसकी यह खासियत भी बताती है कि जित दूध-दही का खाणा. चूंकि मुझे किसी हरियाणवी भाई ने कभी अपने यहां खाने पर नहीं बुलाया, इसलिए मैं नहीं बता सकता कि जिस तरह बाकी देशवासी दाल-चावल-रोटी-सब्जी आदि के साथ पूरक भोजन के रूप में दूध-दही का सेवन करते हैं, बशर्ते अफोर्ड कर सकते हों, वैसे ही हरियाणवी भाई दूध-दही के साथ पूरक भोजन के रूप में दाल-चावल-रोटी-सब्जी आदि भी खाते हैं या खालिस दूध-दही खाकर ही मूंछों पर ताव दे लेते हैं?
दही तो चलो बाकी लोग भी खाते ही हैं, दूध ये लोग कैसे खाते हैं, क्योंकि बाकी देशवासी तो दूध पीते हैं? शायद बंगाली ही इस मामले में उनका साथ देते होंगे, क्योंकि वे भी दूध-पानी-बीड़ी आदि खाते ही हैं, पीते नहीं.
पता नहीं कि जब हरियाणा स्वतंत्र होकर अलग देस नहीं बना था और पंजाब राज्य में ही शामिल था, तब खाने-पीने के मामले में उनकी क्या स्थिति थी?
तब भी उनका दूध-दही का ही खाणा था, या साथ में कुछ पीना-पिलाना भी चलता था? सुना है कि जब पंजाब से हरियाणा अलग हुआ, तो हरियाणवी लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. रिवाड़ी के एक लड़के ने अपनी दादी को यह खुशखबरी सुनाते हुए कहा कि दादी, रिवाड़ी अब पंजाब मैं कोन्या रहा, हरियाणा मैं आग्या, तो वा बोल्ली कि अच्छा हुया बेट्टा, वहां मनै ठंड भी भौत लाग्गै थी!
चूंकि हरियाणा में दूध इफरात में होता था, इसलिए वहां के लोग पीने से बचे दूध का इस्तेमाल नवजात बच्चियों को डुबा कर मारने के लिए भी करते थे. शायद इस खयाल से कि बच्ची दूध में सांस घुटने से तो जरूर मर जाये, पर बेचारी भूखी न मरे. उनकी इस मामता (ममता) का ही परिणाम था कि कन्याओं का अनुपात वहां हजार लड़कों के मुकाबले आठ सौ के आसपास जा पहुंचा था.
इधर बाप नवजात कन्या को दूध से सराबोर करता था, उधर मां का दिल रोता था कि ना आना इस देस मेरी लाडो! लेकिन भाया, ये मैं क्या सुन रहा हूं?
हरियाणा ने लिंग-अनुपात सुधार कर दस सालों में पहली बार दिसंबर 2015 में लड़कियों का अनुपात प्रति एक हजार लड़कों के मुकाबले 900 के पार पहुंचा दिया है? क्या कर रहे हो भाया? कुछ तो सोचो कि मर्दों की मूंछों का क्या होगा? उस फालतू दूध का क्या होगा और क्या होगा मां के तड़पते दिल से निकलनेवाले उस लोकगीत का? लेकिन कुछ भी हो, तुम तो आ ही जाना इस देस मेरी लाडो, और आती ही रहना!
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