भारत की नौशक्ति का सागर-मंथन
Updated at : 05 Feb 2016 6:42 AM (IST)
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तरुण विजय राज्यसभा सांसद, भाजपा आगामी सात फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की समुद्री विरासत पर लिखित एक महत्वपूर्ण पुस्तक का लोकार्पण करेंगे. वे दुनिया को यह बता रहे होंगे कि भारत सदा से समुद्री शक्ति वाला ऐसा देश रहा है, जिसके लोगों ने दुनिया के ओर-छोर को नियंत्रण करके नापा है. चार से […]
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तरुण विजय
राज्यसभा सांसद, भाजपा
आगामी सात फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की समुद्री विरासत पर लिखित एक महत्वपूर्ण पुस्तक का लोकार्पण करेंगे. वे दुनिया को यह बता रहे होंगे कि भारत सदा से समुद्री शक्ति वाला ऐसा देश रहा है, जिसके लोगों ने दुनिया के ओर-छोर को नियंत्रण करके नापा है.
चार से आठ फरवरी तक विशाखापत्तनम के सागर क्षेत्र में विश्व के सबसे बड़े नौसैनिक शक्ति के समीक्षा उत्सव का आयोजन होन जा रहा है. वास्तव में यह आयोजन भारत की समुद्री शक्ति को दिखाने का एक बड़ा अवसर बन गया है. इस आयोजन में करीब 50 देशों की नौसेनाएं भाग ले रही हैं. यही नहीं, इस समीक्षा उत्सव में भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ-साथ 25 देशों के नौसेना अध्यक्ष भी उपस्थत रहेंगे. यह इस बात का भी द्योतक है कि देर से ही सही, लेकिन अंतत: हमने सेना के अप्रतिम महत्व को पहचाना है. वरना, अब तक सेना का मतलब सिर्फ थल सेना, या बहुत हुआ तो वायु सेना को समझा जाता था.
यह तथ्य प्राय: आंखों से ओझल ही रहा है कि हड़प्पा और लोथल के व्यापारियों का समुद्रीय मार्ग से मध्य पूर्व, अफ्रीका तथा यूरोप तक साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व होनेवाला व्यापार था.
यानी एक ओर भारतीय समुद्री गाथा है, तो दूसरी ओर दो हजार वर्ष पूर्व दक्षिण के चोल सम्राटों का कंबोडिया, लाओ और इंडोनेशिया तक फैला साम्राज्य लहरों पर शासन करने की एक दूसरी भारतीय यशोकथा है. भारत वैसे भी इस वर्ष सम्राट राजेंद्र चोल की दो हजारवीं जयंती मना रहा है, जिनके सैनिकों से समूचा पूर्वी एशिया क्षेत्र सदियों से प्रभावित रहा है.
खैबर के दर्रों से होनेवाले लगातार विदेशी हमलों के दौरान भारतीय शासकों की गतिविधियां थल सेना में ही केंद्रित होती रहीं, परंतु क्षत्रपति शिवाजी ने नौसेना के महत्व को पहचाना और कान्हों जी आंद्रे के नेतृत्व में एक सशक्त नौसेना खड़ी की.
अब वैश्विक परिदृश्य कुछ इस कदर बदला है कि भविष्य के युद्ध और रक्षा संबंधी मुद्दे सागर क्षेत्र पर प्रभुत्व के सवाल पर सिमटते जा रहे हैं और वैश्विक घटनाओं का केंद्र अब पूर्व एशिया का सागर क्षेत्र बन गया है. किसी भी दृष्टि से भविष्य उसका है, जिसका जल पर प्रभुत्व है. केवल मलक्का जल डमरू मध्य से चीन की अस्सी प्रतिशत तेल आपूर्ति होती है. इस छोटे से संकरे जलमार्ग से चीन पहुंचनेवाले सामान का मूल्य प्रतिदिन चार हजार करोड़ रुपये आंका गया है.
भारत का भी 90 प्रतिशत व्यापार जलमार्ग से हाेता है. लेकिन, वर्तमान स्थिति यह है कि चीन की नौसेना तीन सौ समुद्री जहाजों वाली है, जबकि भारत की नौसेना के पास 137 समुद्री जहाज हैं. एशिया में सबसे बड़ी नौसेना चीन की ही मानी जाती है, जिसके पास 62 पनडुब्बियां हैं, जिनमें से चार पनडुब्बियां तो परमाणु प्रक्षेपास्त्र के वार करने में सक्षम हैं.
इस परिस्थिति में भारत पर केवल यही जिम्मेवारी नहीं है कि वह अपने जल क्षेत्र की रक्षा करे, बल्कि दक्षिण चीन सागर एवं प्रशांत महासागर क्षेत्र तक उसे अपना दबदबा बनाना होगा. अब वह समय आ गया है कि हम न सिर्फ इस बात से संतोष कर लें कि दुनिया के सबसे बड़े महासागर का नाम हमारे देश के नाम पर हिंद महासागर रखा गया है, बल्कि अब हिंद महासागर को हिंदुस्तान के प्रभुत्व वाले महासागर का रूप देने के लिए नौसेना को उससे जोड़ना भी होगा.
इस दिशा में पहली बार भारत की नौसेना की मजबूती के लिए बड़े कदम उठाये जा रहे हैं और लक्ष्य तय किया गया है कि साल 2030 तक शत-प्रतिशत युद्धपोत भारत में ही बनने लगेंगे. इसके साथ ही 2022 तक दो विमानवाही युद्धपोत, तीन परमाणु शक्ति-संपन्न पंडुब्बियां, तथा 2030 तक सौ नये युद्धपोत भारत के समुद्री बेड़े में शामिल करने का लक्ष्य है. इस दिशा में भारत का जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ महत्वाकांक्षी नौसैनिक सहयोग हो रहा है.
वर्तमान अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक समीक्षा आयोजन में सौ से ज्यादा युद्धपोत भाग ले रहे हैं और यह अद्भुत नजारा है कि अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और चीन के नौसैनिक बेड़े भारत के राष्ट्रपति को सलामी देते हुए भारत के नये प्रभुत्व की समुद्री गाथा रचने जा रहे हैं.
भारत की कुल समुद्री सीमा पंद्रह हजार किलोमीटर से अधिक है. लेकिन, भूराजनीतिक परिस्थितयां कह रही हैं कि भारतीय नौसेना को केवल जलक्षेत्र की रक्षा करने तक ही सीमित नहीं रहना होगा. भारत के हितों की रक्षा के लिए नौसेना के प्रभुत्व का दायरा चीन की दखल से बड़ा और भारी होना ही होगा.
अगर भारत के उत्तर-पश्चिम में खैबर का दर्रा आक्रमणकारियों के लिए आसान रास्ता बना, जहां से आनेवाले घुड़सवारों ने सोमनाथ तक और उसके आगे दक्कन इलाकों में विध्वंस किया, तो यह सोचते हुए डर लगता है कि क्या हम भारत की पूर्वी समुद्री-सीमा को नये खैबर में तब्दील होने देंगे?
वर्तमान परिस्थिति जहां हमारी कमजोरियों की ओर इंगित करती है, वहीं यह भी संकेत देती है कि शक्ति-संवर्धन का काम पूरे जोर से शुरू हो चुका है. रक्षा क्षेत्र में निजी पूंजी निवेश के एक उदाहरण के रूप में अनिल अंबानी उद्योग समूह ने नौसैनिक जहाज निर्मित करने की संरचना के लिए 50 अरब रुपये के निवेश की घोषणा की है.
इसी प्रकार जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया का लोकतांत्रिक ित्रकोण भारत की नौसैनिक शक्ति बढ़ाने के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सहयोग दे रहा है. यह सागर-मंथन जहां सैन्य क्षेत्र में नये और दमदार उदय की घोषणा कर रहा है, वहीं नौसेना अध्यक्ष एडमिरल रॉबिन धवन के लिए यह जीवन का सर्वश्रेष्ठ क्षण है, जब समुद्री क्षेत्र में भारत की शक्ति का नया अध्याय उनके कार्यकाल में लिखा जा रहा है.
इस परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गत वर्ष हुई हिंद महासागरीय देशों की यात्रा ने सकारात्मक माहौल बनाने में मदद की. ये सभी देश चीन की उभरती चुनौती के सामने भारत की सक्रिय उपस्थिति से शक्ति पाते हैं. इसलिए भारत को सिर्फ भारत के लिए ही नहीं, बल्कि अपने मित्र देशों को सुरक्षा देने के लिए भी नौसेना को प्रथम पंक्ति में ला खड़ा करना होगा.
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