भीड़ का अन्याय

Updated at : 05 Feb 2016 6:37 AM (IST)
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भीड़ का अन्याय

‘झर गयी पूंछ रोमांत झरे पशुता का झरना बाकी है; बाहर-बाहर तन संवर चुका, मन अभी संवरना बाकी है!’ राष्ट्रकवि दिनकर की यह पंक्ति बेंगलुरु के आचार्य कॉलेज में बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए आये तंजानिया के छात्रों के साथ स्थानीय भीड़ के हिंसक व्यवहार की व्याख्या के लिए ठीक जान पड़ती है. यह […]

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‘झर गयी पूंछ रोमांत झरे पशुता का झरना बाकी है; बाहर-बाहर तन संवर चुका, मन अभी संवरना बाकी है!’ राष्ट्रकवि दिनकर की यह पंक्ति बेंगलुरु के आचार्य कॉलेज में बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए आये तंजानिया के छात्रों के साथ स्थानीय भीड़ के हिंसक व्यवहार की व्याख्या के लिए ठीक जान पड़ती है.
यह बात समझ में आती है कि अगर गाड़ी चलाने में एक सूडानी छात्र की लापरवाही बेंगलुरु की फुटपाथ पर एक बुजुर्ग स्त्री की मौत का कारण बनी, तो रोष में भीड़ ने उसके साथ हिंसक बरताव किया. सड़क-दुर्घटना की स्थिति में ड्राइवर की लापरवाही पर भीड़ के हिंसक होने की घटनाएं भारत में आम हैं. लेकिन, कुछ देर बाद इसी भीड़ द्वारा किया गया बरताव समझ को झटका देनेवाला है.
यह कैसा न्याय-बोध है, जिसमें भीड़ का गुस्सा आधा-पौन घंटा गुजरने पर भी शांत नहीं होता और वह प्रतिशोध की भावना से हर उस व्यक्ति पर हमलावर हो उठती है, जो उसे विदेशी जान पड़े? यह भीड़ अपने प्रतिशोध-भाव में भूल जाती है कि बुजुर्ग स्त्री की जान का जाना जितना पीड़ादायी है, उतना ही दुखदायी है विदेशी (तंजानियाई) मूल की एक छात्रा को रोष का निशाना बनाना.
भीड़ द्वारा तंजानियाई मूल की छात्रा के साथ किये हिंसक बरताव को कानून-व्यवस्था की नाकामी मानना, राज्य-प्रशासन को दोषी ठहराना या मामले को सनसनीखेज बनाने की मंशा से इसे ‘रंगभेदी हिंसा’ बताना इस घटना की प्रवृत्ति को समझने में मददगार नहीं है. मामला रंगभेद का होता तो विदेशी छात्रों का यहां पढ़ाई कर पाना संभव नहीं होता. बात कानून-व्यवस्था के असफल रहने तक भी सीमित नहीं है, क्योंकि बेंगलुरु हाल में पूर्वोत्तर के छात्रों के लिए भी प्रतिशोधी-भावों को जाहिर कर चुका है.
दरअसल, इस हिंसक व्यवहार के पीछे है स्थानीय मानस के भीतर जन्म लेनेवाली अस्मितापरक संकीर्णता. बीसवीं सदी के तीसरे दशक से आठवें दशक तक सेहतमंद आबोहवा और मेहमानवाजी की मीठी तहजीब के कारण गार्डन सिटी के उपनाम से मशहूर यह शहर आज ‘सिलिकन वैली ऑफ इंडिया’ है. पिछली तहजीबों को तिलांजलि देकर बेंगलुरु की ब्रांडिंग में अब यह बताया जाता है कि मुंबई, दिल्ली और कोलकाता के बाद देश की जीडीपी में सबसे ज्यादा योगदान इसी शहर का है.
शहर समृद्ध तो हुआ है, लेकिन यह समृद्धि अपने भीतर विभिन्नताओं को समेट कर चलने का संस्कार विकसित नहीं कर पायी. शहर बढ़ा, लेकिन इस बढ़वार में अपनी पुरानी रिवायत भूल गया है. इसलिए बेंगलुरु के सामने नयी चुनौती समृद्धि के बीच अपने पुराने संस्कार को बचाये रखने की है.
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