सर्दी का मौसम और सर्द जिंदगी

Updated at : 05 Feb 2016 6:36 AM (IST)
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सर्दी का मौसम और सर्द जिंदगी

नासिरुद्दीन वरिष्ठ पत्रकार सर्दी का उतार-चढ़ाव चल रहा है. सर्दी बढ़ी तो खबर. सर्दी नहीं पड़ रही, वह भी खबर. मौसम है ही ऐसी चीज. मौसम का बदलता मिजाज हमारी जिंदगी का भी मिजाज बदल देता है.इसलिए सर्दी का रिश्ता अलग-अलग जिंदगियों से अलग-अलग है. पिछले दिनों मैं एक ऐसी जगह था, जहां अपने खाने […]

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नासिरुद्दीन

वरिष्ठ पत्रकार

सर्दी का उतार-चढ़ाव चल रहा है. सर्दी बढ़ी तो खबर. सर्दी नहीं पड़ रही, वह भी खबर. मौसम है ही ऐसी चीज. मौसम का बदलता मिजाज हमारी जिंदगी का भी मिजाज बदल देता है.इसलिए सर्दी का रिश्ता अलग-अलग जिंदगियों से अलग-अलग है.

पिछले दिनों मैं एक ऐसी जगह था, जहां अपने खाने का बर्तन हमें खुद धोना पड़ता था. उस दिन जबरदस्त कोहरा था. ठंडी हवा भी चल रही थी. मौसम करवट ले चुका था. गरमा-गरम नाश्ते के बाद प्लेट धोने के लिए नल खोला. हाथ लगाया. पानी लगते ही हाथ अचनाक छिटक कर हट गया. ऐसा लगा मानो हाथ कट कर अलग हो गया.

जी. पानी से भी हाथ कटता है.

अगर कभी सर्द पानी में हाथ लगाया हो, तो अंदाजा होगा. मेरी बात पर यकीन न हो रहा हो, तो अपने घर की उस महिला से पूछ लीजिए, जो सुबह-सवेरे उठ कर चूल्हा-चौका में लग जाती हैं और जिनका कोई मददगार भी नहीं होता. मुझे वे दिन याद आ गये, जब अम्मी बर्तन धोती थीं और हाथ से कपड़े भी. ठंड में इनके भी हाथ कटते होंगे. …लेकिन इनके हाथ हटते नहीं थे. वे जुटे रहते थे. हम पहाड़ की जिंदगी का अंदाजा लगा सकते हैं. ऐसी मध्यमवर्गीय अम्मियों या स्त्रियों के घर के ज्यादातर मर्दों को पानी से ‘हाथ कटने’ का ऐसा तजुर्बा नहीं होगा. अगर होगा तो ये उनकी जिंदगी का हिस्सा नहीं है.

वैसे, अगर मर्दों को लग रहा हो कि खामख्वाह औरतों की तरफदारी की जा रही है, तो वे एक काम कर सकते हैं. वे भर जाड़ा बर्तन धोने या कपड़ा धोने या पोछा लगाने की जिम्मेवारी ले सकते हैं. मदद की मदद हो जायेगी और पानी से हाथ कैसे कटता है, इसका भी पता चल जायेगा. कुछ दिनों में आदत पड़ जायेगी, तो गर्मी में भी काम आयेगा.

खैर! सर्दी पूर्वी और उत्तरी भारत पर अपना करम सबसे ज्यादा दिखाती है. इस भारत की ज्यादातर आबादी के लिए जाड़ा वह नहीं है, जो हमारे लिए है. दिल्ली, उत्तरी बंगाल, बिहार और झारखंड की सड़कों और गांवों में जाड़े की शक्ल कुछ और ही नजर आती है- एक कपड़े में लिपटे तन, पैर नंगे, पेट का हाल बताते चेहरे, पेट में घुसे घुटने और जाड़े को पकड़ती मुट्ठियां. जाड़ा असलियत में वंचित मुखालिफ मौसम है. इसलिए ठंड से मौत की खबर भी यहीं से आती है.

अगर ये सब कुछ ज्यादा लग रहा हो, तो शाम में काम से लौटते मजदूरों, उनके साथ चल रही महिलाओं और गमछे से कसे छोटे बच्चे-बच्चियों को देखा जा सकता है. ध्यान रहे, हमने अभी सड़क किनारे पड़े लोगों की बात नहीं की है.

हालांकि, यह कोई नयी बात नहीं है. समाज की यह बदसूरत तस्वीर है. इसलिए ठंड खबर तो बनती है, लेकिन उसकी तस्वीर खूबसूरत होती है. इसमें बुराई भी नहीं, कुछ लोगों के लिए ठंड खूबसूरत है ही. अगर पेट में अन्न की गर्माहट हो, खाने को तिलकुट हो, तन ढांकने को कई तह कपड़ा हो, पैरों में मोजा और जूता हो, ओढ़ने को रूई वालीरजाई या मोटी कंबल हो और बिना किसी दरार या फांक के घर और बैठे-बैठे खाने को मिलता रहे, तो यकीन जानिए, जाड़ा खूबसूरत मौसम है. है न?

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