भ्रष्टाचार का सच

Updated at : 04 Feb 2016 6:17 AM (IST)
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भ्रष्टाचार का सच

कुछ सच कल्पना से परे या हैरतअंगेज होते हैं. बॉम्बे हाइकोर्ट की नागपुर बेंच का यह कहना भी ऐसा ही सच है, कि लोग अब भ्रष्टाचार की महामारी के खिलाफ उठ खड़े हों और अगर सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम कसने में नाकाम रहती है तो फिर असहयोग-आंदोलन की तर्ज पर टैक्स चुकाने से मना कर […]

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कुछ सच कल्पना से परे या हैरतअंगेज होते हैं. बॉम्बे हाइकोर्ट की नागपुर बेंच का यह कहना भी ऐसा ही सच है, कि लोग अब भ्रष्टाचार की महामारी के खिलाफ उठ खड़े हों और अगर सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम कसने में नाकाम रहती है तो फिर असहयोग-आंदोलन की तर्ज पर टैक्स चुकाने से मना कर दें.

अदालत की जिम्मेवारी इंसाफ करने की होती है, ताकि राज-समाज में विधि व्यवस्था बनाये रखने में मदद मिले. किसे पता था कि भ्रष्टाचार को लेकर हालात इतने बेकाबू हो उठेंगे, कि खुद अदालत को कहना पड़ेगा कि लोग उस सरकार से ही असहयोग करें, जिसका जिम्मा लोकतंत्र के भीतर विधि-व्यवस्था बहाल रखने का होता है.

हालांकि, नागपुर बेंच की इस टिप्पणी में तात्कालिक तौर पर भले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में नाकाम शासन-प्रशासन के प्रति हताशा का स्वर सुनाई दे, परंतु हमें स्वीकार करना चाहिए कि यह स्वर आजादी के आंदोलन के भीतर से जागी नैतिकता की भावभूमि पर प्रतिष्ठित है. आजादी के आंदोलन के ‘बापू’ ने आखिर यही तो सिखाया था नया राष्ट्र रचने के लिए उठ खड़े होनेवाले लोगों को कि लोकरक्षा ही शासन की वैधता की एकमात्र कसौटी है और जो शासन इस दायित्व से कन्नी काट रहा हो, उसकी वैधता को प्रश्नांकित करने के लिए उससे असहयोग ही एकमात्र जायज रास्ता है.

अगर लोकतंत्र के भीतर ‘लोक’ की संरक्षा उस राजकोष से होना है, जिसकी एक-एक पाई पर जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई की छाप है, तो फिर अदालत का यह कहना सचमुच देश की आजादी के आंदोलन के परवर्ती विस्तार के हिस्से के रूप में देखा जायेगा कि जिस शासन के राजकोष में स्वयं उसके पहरेदार सेंधमारी कर रहे हों, वहां जनता राजकोष में योगदान देने यानी टैक्स चुकाने से इनकार कर दे.

बॉम्बे हाईकोर्ट की यह टिप्पणी अगर अपनी प्रकृति में उतनी ही मूलगामी जान पड़ रही है, जितनी कुछ दिन पहले यूपी के हाइकोर्ट की वह टिप्पणी जिसमें कहा गया था कि विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के हर स्तर पर काम करनेवाले लोगों के बच्चे समाज के शेष तबके के बच्चों के साथ एक जैसे सरकारी स्कूलों में पढ़ें, तो इसकी वजह अदालत के सामने पेश मामले की विचित्रता में भी खोजी जानी चाहिए.

अदालत ने महाराष्ट्र सरकार और बैंक ऑफ महाराष्ट्र, दोनों को अनुसूचित जाति में शुमार मातंग समुदाय के कल्याण के लिए बने अन्नाभाऊ साठे विकास महामंडल में हुए 385 करोड़ रुपये के गबन के मामले में फटकार लगाते वक्त नागरिकों से निर्बाध भ्रष्टाचार वाली सरकार से असहयोग करने की बात कही है.

कोर्ट ने दर्ज किया कि इस मामले में ‘महामंडल’ के प्रबंध निदेशक ने इलाके के विधायक को बैंक के अधिकारियों से मिलीभगत कर महामंडल का अध्यक्ष बनाया और फिर तीनों ने मिल कर झूठे कर्ज, सब्सिडी, अनुग्रह राशि और खर्च आदि के फर्जी ब्यौरों के जरिये करोड़ों का गबन किया. गबन का यह मामला इस बात की नजीर है कि किस तरह राजनीति (विधायक), अर्थनीति (बैंक) और जन-कल्याण को मूर्तमान करने के लिए बनी संस्था (महामंडल) के प्रशासनिक-ढांचे के शीर्ष पदों पर बैठे लोग एक साथ मिल कर वंचित समुदाय (मातंग) के उत्थान के विचार को, जो कि भारतीय राष्ट्रीयता का मूल विचार भी है, निजी स्वार्थ-साधन का औजार बना रहे हैं.

गौर करें, तो देश आजादी के बाद से अनेक नागरिक आंदोलनों और विधायी उपायों के बावजूद राजनीति, अर्थनीति और समाज-कल्याण की संस्थाओं के शीर्ष पर मौजूद लोगों के बीच राजकोष को हड़पने के मामले चल रही मिलीभगत को तोड़ने या कमजोर करने में लगभग विफल रहा है.

1947 में बने भ्रष्टाचार निरोधक कानून से लेकर 1960 के दशक में संथानम समिति की सिफारिश पर बने केंद्रीय सतर्कता आयोग और राज्यों में मौजूद लोकायुक्त नामक संस्था से लेकर पदस्थापन की प्रतीक्षा में खाली पड़े लोकपाल के पद तक, इस देश ने भ्रष्टाचार विरोधी कानूनी उपायों और नागरिक-संघर्षों का एक लंबा दौर देखा है.

इस लंबे दौर पर स्वयं महात्मा गांधी लेकर जेपी नारायण और अन्ना हजारे तक की अगुवाई में हुए जन-आंदोलन की छाप है. बीते बीस सालों में इस संघर्ष ने शासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और जन-भागीदारी की धारणाओं के भीतर बहुविध रूप धारण किये हैं.

इसके एक छोर पर जनअधिकारिता संबंधी आंदोलन हैं, तो दूसरी तरफ आधार-कार्ड जैसे कुछ सूचना प्रौद्योगिकी परक पहल. दो मोर्चे पर जारी सक्रियता के बावजूद सार्वजनिक नैतिकता को ठेंगा दिखानेवाले भ्रष्टाचार का महादैत्य अगर शासन के अंकुश में नहीं आ रहा और अदालत को निराशा के स्वर में ‘असहयोग-आंदोलन’ की याद दिलानी पड़ रही है, तो यही माना जायेगा कि एक समाज के रूप में हम सब अपनी विरासत और भविष्य, दोनों को असफल करने के रास्ते पर हैं.

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