अमित शाह की अग्नि-परीक्षा

Updated at : 28 Jan 2016 1:42 AM (IST)
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अमित शाह की अग्नि-परीक्षा

अनुज कुमार सिन्हा वरिष्ठ संपादक प्रभात खबर बिहार विधानसभा चुनाव के बाद लगभग परदे के पीछे रहे अमित शाह पुन: चर्चा में आ गये हैं. नयी जिम्मेवारी के साथ. भाजपा ने उन्हीं पर विश्वास करते हुए पुन: उन्हें पार्टी अध्यक्ष चुना है. यह तय माना भी जा रहा था कि अमित शाह की अगुवाई में […]

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अनुज कुमार सिन्हा
वरिष्ठ संपादक
प्रभात खबर
बिहार विधानसभा चुनाव के बाद लगभग परदे के पीछे रहे अमित शाह पुन: चर्चा में आ गये हैं. नयी जिम्मेवारी के साथ. भाजपा ने उन्हीं पर विश्वास करते हुए पुन: उन्हें पार्टी अध्यक्ष चुना है. यह तय माना भी जा रहा था कि अमित शाह की अगुवाई में ही भाजपा तीन प्रमुख राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनाव में भाग्य आजमायेगी. जिस अमित शाह ने लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा को अप्रत्याशित जीत दिलायी थी, उसी अमित शाह पर पार्टी ने फिर भरोसा किया है, लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव के लिए.
बिहार चुनाव के दौरान और उसके ठीक बाद भाजपा में अंदरूनी विवाद बढ़ा था और पार्टी के कई नेताओं ने (इनमें वरिष्ठ नेता भी शामिल थे), सवाल भी उठाये थे. जिस अमित शाह के खिलाफ पहले कोई खुल कर बोलता नहीं था, उसी अमित शाह के खिलाफ हमले हुए.
बहाना था बिहार चुनाव. जिस तरीके से बिहार में भाजपा की हार हुई, उसके बाद अमित शाह और उनकी टीम के काम करने के तरीके और स्थानीय नेताओं को दरकिनार करने के भी आरोप लगे. यह भी बात उठी थी कि ये नेता जमीनी हकीकत को पहचान नहीं सके और इसी का नतीजा बिहार चुनाव परिणाम था. अब यही चुनौती भाजपा को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मिलनेवाली है. पार्टी के पास कोई और विकल्प नहीं दिखा, इसलिए इस बार भी बड़ी जिम्मेवारी अमित शाह के ही माथे पर है.
इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकसभा चुनाव में यूपी (जिसकी जिम्मेवारी अमित शाह को दी गयी थी, उस समय वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं थे) में लोकसभा की 80 में से 73 सीटों पर भाजपा विजयी रही थी.
इतनी सीट की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. इसका पूरा श्रेय अमित शाह को ही गया था और उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बना कर एक तरीके से पुरस्कृत भी किया गया. अमित शाह एक कुशल रणनीतिकार रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं. उनकी ही अगुवाई में भाजपा ने महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा और झारखंड के चुनाव में सफलता पायी, लेकिन दिल्ली और बिहार में हार का सामना करना पड़ा. अब आनेवाले दिनों में यूपी के अलावा तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं.
यूपी में भाजपा का पहले से जनाधार रहा है (भले ही भाजपा लंबे समय से वहां सत्ता से बाहर रही हो), पश्चिम बंगाल में भाजपा की पकड़ बढ़ी है (लेकिन अभी तक निर्णायक नहीं दिखती), जबकि तमिलनाडु में भाजपा जनाधार खोज रही है, इसलिए वहां कोई बड़ा चमत्कार अमित शाह नहीं कर सकते हैं. सारी निगाहें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर है और इस चुनाव का परिणाम ही बिहार चुनाव में मिली हार की भरपाई भी कर सकता है.
ऐसी बात नहीं है कि लोकसभा चुनाव में जितनी सीट मिली थी, उसके आधार पर भाजपा के लिए काम आसान होगा. सीटें तो बिहार में भी मिली थीं. लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव के मुद्दे अलग-अलग होते हैं. यूपी में भी होंगे, जहां जमीनी हकीकत समाजवादी पार्टी और बसपा के पक्ष में ज्यादा रही है. लंबे समय से भाजपा यूपी में सत्ता में नहीं रही है.
1989 के पहले यूपी में जहां कांग्रेस का एकाधिकार हुआ करता था, लेकिन उसके बाद से वहां कांग्रेस गोल हो गयी. अयोध्या प्रकरण ने भाजपा को यूपी में जनाधार खड़ा करने में मदद की और इसी का परिणाम था कि 1989 में भाजपा को 221 सीटें और 1993 में 177 सीटें मिली. लेकिन, इसके बाद भाजपा पिछड़ती गयी और इस स्थान पर समाजवादी पार्टी और बसपा ने कब्जा कर लिया. 2002 में राजनाथ सिंह भाजपा के अंतिम मुख्यमंत्री थे, उसके बाद से भाजपा सत्ता से बाहर है. 2007 में उसे सिर्फ 51 और 2012 में 80 सीटें मिली थीं. 2007 में बसपा ने 206 सीट और 2012 में समाजवादी पार्टी ने 224 सीटें लाकर यह बता दिया कि राष्ट्रीय पार्टियों के लिए यूपी में जगह नहीं के बराबर है.
(2007 में कांग्रेस को यूपी में 22 और 2012 में 28 सीटें मिली थीं). यूपी में दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों (भाजपा और कांग्रेस) पर समाजवादी पार्टी और बसपा भारी रही हैं. अमित शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती समाजवादी पार्टी और बसपा के ठोस वोट बैंक में सेंध लगाना है.
यह काम आसान नहीं होगा. बिहार चुनाव में भाजपा न तो जदयू के वोट बैंक में सेंध मार सकी थी और न ही राजद के. संभव है कि यूपी में विपक्ष का नया समीकरण बने और भाजपा को उस नये गंठबंधन से सामना करना पड़े. अगर भविष्य के इन चुनावों में अमित शाह की अगुवाई में भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन किया, तो यहीं से अमित शाह और मजबूत होकर निकलेंगे. अगर नहीं, तो उनके विरोध में आवाजें भी उठेंगी.
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