क्या कोई दलित हमारा दोस्त है?

नासिरुद्दीन वरिष्ठ पत्रकार हैदराबाद विश्वविद्यालय का दलित छात्र रोहित वेमूला तेलंगाना/आंध्र प्रदेश की सीमा से परे और पार पहुंच गया है. पहुंचा जरूर, लेकिन मौत के बाद. उसकी मौत से उठे मुद्दे बहस का मौजू बने हैं. इनमें सबसे बड़ी बहस है, क्या दलितों की जिंदगी आज 2016 में भी मुश्किल और भेदभाव से भरी […]
नासिरुद्दीन
वरिष्ठ पत्रकार
हैदराबाद विश्वविद्यालय का दलित छात्र रोहित वेमूला तेलंगाना/आंध्र प्रदेश की सीमा से परे और पार पहुंच गया है. पहुंचा जरूर, लेकिन मौत के बाद. उसकी मौत से उठे मुद्दे बहस का मौजू बने हैं. इनमें सबसे बड़ी बहस है, क्या दलितों की जिंदगी आज 2016 में भी मुश्किल और भेदभाव से भरी है?
इस बहस में दम है या नहीं, इसे नापने का पैमाना क्या होगा? चलिए हम खुद से कुछ सवाल करते हैं. ये सवाल सिर्फ गैरदलित हिंदू के लिए ही नहीं, बल्कि मुसलमान, सिख, ईसाई सब समाजों के लिए हैं. इनके जवाब कुछ हद तक दलित जीवन पर रोशनी डाल सकते हैं. तो आइए जवाब तलाशें…
क्या हमारी किसी दलित से दोस्ती है? क्या हमारे परिवार की दोस्ती किसी दलित परिवार से है? क्या हमारा परिवार दलित दोस्त के घर आता-जाता और खाता-पीता है? हमारे घर की लड़की/लड़का, किसी दलित लड़का/ लड़की से शादी करना चाहे, तो क्या हम राजी होंगे?
क्या सामाजिक इंसाफ और बराबरी के लिए आरक्षण जरूरी है? क्या हमने जातियों से जुड़ीं गालियों/मुहावरों का इस्तेमाल बंद कर दिया है? क्या गांव-मोहल्ले, स्कूल-कॉलेज, दफ्तर में दलितों के साथ भेदभाव खत्म हो गया है?
क्या हम मानते हैं कि दलित भी हमारी ही तरह मेधावी होते हैं. वे सब कुछ कर सकते हैं, जो गैरदलित करते हैं?
अगर हमारे पास किराये के लिए कमरा है, तो क्या हम किसी दलित को अपना कमरा किराये पर देंगे? क्या किसी दलित की छाया पड़ने या घोड़ी पर बारात निकालने से किसी को अब कोई फर्क नहीं पड़ता है?
क्या दलित स्त्रियों को हम अपनी जाति की स्त्रियों की ही तरह इज्जत देते हैं? क्या हमारी रिश्तेदारियां दूसरी जातियों में हैं? क्या बिना आरक्षण के भी ढेरों दलित विद्यार्थी पढ़ाई में आगे हैं?
क्या हम अपनी रसोई में दलित को आने या अपना बरतन इस्तेमाल करने देते हैं? क्या हम उद्योगजगत, राजनीति, पत्रकारिता, कला या अन्य किसी भी क्षेत्र में शीर्ष पदों पर बैठ पांच दलितों का नाम बता सकते हैं?
अब हमारा और हमारे समाज का जवाब क्या है? क्या ‘हां’ है? अगर ‘हां’ है, तो यकीनन वे सारे लोग गलत हैं, जो रोहित की मौत के बाद दलितों के साथ भेदभाव को बड़ी बहस बना रहे हैं. हालांकि, इनमें से कुछ भी सवाल का जवाब अगर ‘नहीं’ है या हम सवालों से सहमत नहीं हैं, तो… तो रोहित के जरिये उठती बहस के बारे में हमें जरूर सोचना चाहिए. हमें सोचना चाहिए कि अगर हम किसी दलित या पसमांदा घर में पैदा होते, तब किस-किस पड़ाव पर और कहां-कहां हमारे साथ क्या-क्या होता?
जैसे-जैसे दलित टोलों-गांवों से बाहर फैल रहे हैं, वैसे-वैसे नफरत भी नये-नये रूपों में अब गांव-घर की सीमा से निकल कर जगह-जगह फैल रही है. अगर हम यह समझ सकते हैं, तो हमें वह मानसिक प्रताड़ना, कशमकश, नफरत भरे हालात जरूर समझ में आयेंगे, जिनसे रोहित की जिंदगी गुजरी होगी. रोहित तो गुजर गया है, मगर उस जैसे करोड़ों हर रोज नफरत भरे हालात से गुजर रहे हैं.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए




