आतंक का सामना

Updated at : 22 Jan 2016 6:23 AM (IST)
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आतंक का सामना

बीते साल की कई घटनाओं से यह साबित हो चुका है कि आतंकी जमात आइएसआइएस हिंसा के अपने राजनीतिक विचारों में अलकायदा का सहोदर है और हिंसा के अमल में अलकायदा से कहीं ज्यादा क्रूर और सक्षम है. अलकायदा की तरह आइएसआइएस का मंसूबा भी पूरी दुनिया पर इसलाम की मनमानी व्याख्या के आधार पर […]

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बीते साल की कई घटनाओं से यह साबित हो चुका है कि आतंकी जमात आइएसआइएस हिंसा के अपने राजनीतिक विचारों में अलकायदा का सहोदर है और हिंसा के अमल में अलकायदा से कहीं ज्यादा क्रूर और सक्षम है.
अलकायदा की तरह आइएसआइएस का मंसूबा भी पूरी दुनिया पर इसलाम की मनमानी व्याख्या के आधार पर एक ऐसा राज कायम करना है, जहां व्यक्ति और उसकी स्वतंत्रताओं के लिए कोई जगह नहीं है.
इसलिए, दुनिया का कोई भी शांतिप्रिय देश आइएसआइएस को इराक, सीरिया, तुर्की या फिर मध्यपूर्व की सरगर्म राजनीति का एक मोहरा या फिर ताकत के मामले में इसी इलाके तक सीमित मानने की भूल नहीं कर सकता. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समय-समय पर इस बात को अंतरराष्ट्रीय मंचों से उठाया है और देश के भीतर गृह मंत्रालय ने दक्षिण एशिया में इसके खतरे को भांपते हुए निगरानी और सुरक्षा का एक विशेष तंत्र बनाने की बात सोची है.
जाहिर है, यह विशेष तंत्र संघीय ढांचे में सिर्फ केंद्र की मर्जी से नहीं बन सकता और ना ही यह सोचा जा सकता है कि आइएसआइएस का खतरा किसी एक राज्य के लिए ज्यादा है और दूसरे के लिए कम, क्योंकि आतंकी संगठन एक विशाल भूगोल के भीतर फैले अपने रणनीतिक नेटवर्क को स्थापित करके ही हिंसा की किसी घटना को अंजाम दे पाते हैं.
इसीलिए आइएसआइएस के खतरे से निबटने के लिए केंद्र सरकार ने पहले बिहार सहित 12 राज्यों का एक समूह बनाया और खबर है कि अब इसमें पांच अन्य राज्यों को शामिल करने का निर्णय लिया गया है, जिसमें झारखंड भी है. बहरहाल, इस बात का भी ध्यान रखना जरूरी है कि इन आतंकी संगठनों के खतरे से निबटने का काम सरकार के स्तर पर ही रहे, समाज का कोई हिस्सा खुद आतंकवादियों से लड़ने के लिए अपने को हिंसा के औजारों और विचारों से लैस ना करे. पश्चिमी यूपी में हिंदू स्वाभिमान संगठन द्वारा ‘धर्म सेना’ के नाम से 15 हजार हथियारबंद लोगों को, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं, आइएसआइएस के मुकाबले के लिए तैयार करने की खबर इसी कारण हैरतअंगेज है.
उद्देश्य चाहे आतंकी जमातों से लड़ने का ही क्यों ना हो, समाज के किसी भी हिस्से के सैन्यीकरण की इजाजत नहीं दी जा सकती, क्योंकि हिंसा के साधनों पर एकमात्र और अंतिम अधिकार सिर्फ राज्यसत्ता का होता है. ‘हिंदू सेना’ का गठन करनेवाले मंच को यह ध्यान रखना चाहिए कि हिंसा की उनकी समझ और तालिबानी समझ में बहुत अंतर नहीं है. सरकार को चाहिए कि समय रहते ऐसे हथियारबंद सामाजिक दस्तों पर लगाम कसे.
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