मिले, बतियाये और चले गये...

Updated at : 09 Jan 2016 6:31 AM (IST)
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मिले, बतियाये और चले गये...

डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार वर्ष : 2217, स्थान : भारत की राजधानी, जिसका नाम बहुत दिन हुए तत्कालीन सत्ताधारी दल ने दिल्ली से बदल कर इंद्रप्रस्थ कर दिया था और जिसके कारण वहां के सभी पुरुष अपने को इंद्र और स्त्रियों को अप्सराएं समझने लगे थे. हालांकि स्त्रियाें को इसका खमियाजा भुगतना पड़ता था. […]

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डॉ सुरेश कांत

वरिष्ठ व्यंग्यकार

वर्ष : 2217, स्थान : भारत की राजधानी, जिसका नाम बहुत दिन हुए तत्कालीन सत्ताधारी दल ने दिल्ली से बदल कर इंद्रप्रस्थ कर दिया था और जिसके कारण वहां के सभी पुरुष अपने को इंद्र और स्त्रियों को अप्सराएं समझने लगे थे. हालांकि स्त्रियाें को इसका खमियाजा भुगतना पड़ता था. पुलिस की नाक ही नहीं, बल्कि आंख-कान आदि सबके नीचे से कोई भी उन्हें कार आदि में घसीट ले जाता था और बता देता था कि उनकी निगाह में वे क्या हैं.

घटना-स्थल : प्रसिद्ध सरकारी होटल की 1187वीं मंजिल.

भारत-पाक समस्या के समाधान के लिए विदेश सचिव स्तरीय वार्ता के 224वें सत्र में भारतीय प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की प्रतीक्षा कर रहा है, जो शीघ्र ही प्रवेश करता है.

भारतीय विदेश सचिव (भाविस) : स्वागत है. हमारे एयरबेस पर हमला करवा कर भी बेशर्मी से चले आ रहे हैं मेरे अजीज दोस्त!

पाकिस्तानी विदेश सचिव (पाविस) : अरे भाई, कहते हैं न कि तुमने बुलाया और हम चले आये रे… लेकिन मियां, चेहरे पर तो तुम्हारे भी कोई शिकन नजर नहीं आती हमारे हमले की?

भाविस : हां, कह तो आप सही रहे हैं. ढाई सौ साल से हम ऐसे ही मिल रहे हैं, मिलते रहेंगे. बिना किसी नतीजे के… युग-युग से ये गीत मिलन के गाते रहे हैं, गाते रहेंगे…

पाविस : हां, किसने कहा था कि आदमी आते रहें, औरतें जाती रहें; मैं सदा चलता रहूंगा? (अपने सहयोगी की ओर देखता है.)

भाविस : वे हमारे यहां के कैलाश अगरवाल उर्फ मामा थे.

पाविस (सहयोगी द्वारा कान में कुछ बताये जाने पर) : अरे नहीं, वे हमारे यहां के आसिफ जरदारी उर्फ चाचा थे.

भाविस (टालने की मुद्रा में) : छोड़िए, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हकीकत यह है कि हम निरंतर चले आ रहे हैं.

पाविस : लेकिन कुछ भी हो, कश्मीर का कब्जा न छोड़ने की तुम्हारी जिद को देखते हुए, इस शांतिभोजमय शांति-प्रक्रिया की बदौलत ही हम दोनों के देश अभी तक बचे हुए हैं.

भाविस : अ…अ… अब क्या कश्मीर-मुद्दे को कुरेदना जरूरी है, हर बार?

पाविस : हां, यह कंपलसरी, मैंडेटरी और इंपल्सरी है. भला कश्मीर-मुद्दे के बिना ढाई सौ साल से हमारे मिलने की कोई जरूरत थी?

भाविस : ओह, बकौल भारतीय प्रधानमंत्री शांति अविभाज्य है, और बकौल भारतीय गृह मंत्री कश्मीर अविभाज्य है.

पाविस : और बकौल वजीरे-आजम पाकिस्तान जब तक कश्मीर विजिबल यानी दृश्य है, शांति इनविजिबल यानी अदृश्य है.

भाविस : तो क्या मैं समझूं कि हमेशा की तरह हम एमटीडी यानी एग्री टु डिसएग्री अर्थात असहमत होने पर सहमत हैं?

पाविस : यानी कि उज्बेक कवि दोस्तम के शब्दों में- हमेशा की तरह वे मिले, बतियाये और चले गये?

भाविस : तो फिर चलें?

पाविस : ठीक है, फिर मिलेंगे.

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