मेरे घर के पीछे लाल चंदन है

Updated at : 02 Jan 2016 6:08 AM (IST)
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मेरे घर के पीछे लाल चंदन है

डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र वरिष्ठ साहित्यकार बीते साल का अंतिम सप्ताह कुछ ऐसा गुजरा कि मैं अपने सौभाग्य पर भी हैरान हूं. दरअसल, 25 दिसंबर को गुवाहाटी में मैथिल सांस्कृतिक समन्वय समिति के बहुचर्चित विद्यापति समारोह में था. उसके बाद 30 दिसंबर को देवघर विद्यापीठ के वार्षिकोत्सव में शामिल होना था और अगले दिन यानी वर्ष […]

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डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
वरिष्ठ साहित्यकार
बीते साल का अंतिम सप्ताह कुछ ऐसा गुजरा कि मैं अपने सौभाग्य पर भी हैरान हूं. दरअसल, 25 दिसंबर को गुवाहाटी में मैथिल सांस्कृतिक समन्वय समिति के बहुचर्चित विद्यापति समारोह में था. उसके बाद 30 दिसंबर को देवघर विद्यापीठ के वार्षिकोत्सव में शामिल होना था और अगले दिन यानी वर्ष के अंतिम दिन काशी में भाई धर्मेंद्र सिंह की काव्यगोष्ठी में रहना था.
एक सप्ताह में तीन महान तीर्थों का भ्रमण का मौका मिला. मैं तीनों जगह गया, मगर न तो गुवाहाटी में मां कामाख्या के मंदिर जाकर मत्था टेका, न देवघर में बाबा वैद्यनाथ के मंदिर जाकर जल चढ़ाया और न ही काशी में बाबा विश्वनाथ के स्वर्णिम दरबार में नये वर्ष के लिए कुछ मांगा ही. ऐसा नहीं कि देश की समकालीन विद्रूपताओं ने मुझे नास्तिक बना दिया. बल्कि, ज्यादा सही होगा कि ईश्वर के प्रति गाढ़ी आस्था ने मुझे यह मानने के लिए बाध्य कर दिया कि मंदिरवाले भगवान को मेरे सिवा और भक्तों की गुहार भी सुननी है, फिर बार-बार मेरी ही क्यों सुनें?
यह जरूरी नहीं कि जितनी बार गुवाहाटी जाऊं, मां कामाख्या के मंदिर जाकर हाजिरी लगाऊं ही. अन्य अतिथि दर्शन करने गये और मैं अनुज प्रेमकांत चौधरी के घर मित्रों के साथ विचार-विमर्श करता रहा.
घनिष्ठ बंधु सत्यानंद पाठक, जो पूर्वोत्तर के प्रतिष्ठित दैनिक पत्र ‘दैनिक पूर्वोदय’ के संपादक थे, इस बीच अचानक चल बसे. उनके घर जाकर शोक-संतप्त बच्चों को दुलारने में जो सुख मिला, वह निश्चय ही कामाख्या मंदिर जाकर न मिलता. इसीलिए महाकवि सूरदास कहते हैं -ऊधो, मन माने की बात. ऐसे ही देवघर में साहित्यकारों से मिलते-जुलते कैसे डेढ़ दिन बीत गये, पता ही नहीं चला. काशी में आकर तो मेरी स्थिति ‘गइल भैंस पानी में’ जैसी हो जाती है.
वहां महीने भर भी रह जाऊं, तब भी बाबा के मंदिर में जाकर दर्शन करने की फुरसत न मिले. मेरी दृढ़ धारणा है कि शुद्ध मन से किया गया हर कार्य वस्तुतः ईश्वर की ही आराधना है-यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्
इस बार देवघर में मेरे साथ राम उपदेश सिंह विद्यापीठ के गेस्ट हाउस में थे, जो कभी संपूर्ण संताल परगना के उपायुक्त रह चुके हैं. उनकी अनेक पुस्तकें छप चुकी थीं, जिनमें गीतांजलि और श्रीमद्भगवद्गीता के अलावा दुर्गासप्तशती का काव्यानुवाद उल्लेखनीय है. विद्यापीठ के समारोह के मुख्य अतिथि झारखंड राज्य के गृह सचिव श्री नृसिंह नारायण पांडेय हैं, जो राम उपदेश जी के कार्यकाल में उनके साथ रह चुके हैं. पांडेय जी सर्किट हाउस में रुके थे, मगर राम उपदेश जी से लंच पर मिलने आ गये और थोड़ी देर साहित्य की ऐसी चर्चा हुई कि मैं विस्मित रह गया. लॉन में धूप का आनंद लेते हुए साहित्य-संस्कृति की बातें करना अधिकारियों के भाग्य में भी कहां रहता है? इसे रमणीय बनाया डॉ प्रमोदिनी हांसदा ने, जो दुमका में हिंदी विभागाध्यक्ष हैं. उन्होंने बताया कि आदिवासी छात्राओं की विशेष रुचि हिंदी पढ़ने में है.
पूर्वोत्तर राज्यों से हिंदी पढ़ने आनेवालों में छात्राएं अधिक हैं. पांडेय जी अत्यंत अध्ययन-मननशील व्यक्ति हैं. जैसे ही राम उपदेश जी ने मेरा परिचय कराया, वे तपाक से बोले, मैं आपको बहुत पढ़ता रहा हूूं, रू-ब-रू होने का आज अवसर मिला है. बातों-बातों में ही संताल परगना के साहित्यकारों की बात चली. निष्कर्ष यह निकला कि रचनाशील व्यक्तियों के लिए संताल परगना की आदिम धरती बहुत उपयोगी रही है, जिससे प्रभावित होकर प्रो. माधवन जी जैसी विभूतियां दक्षिण भारत से यहां आकर बस गयीं. हिंदी नवगीत के पुरोधा ठाकुर प्रसाद सिंह भी इसी विद्यापीठ के प्रधानाचार्य थे और कुछ प्रसाद लेकर काशी लौटे थे.
एक दिन पहले शंकर मोहन जी के सौजन्य से मैंने सुकंठ कवि विश्वेश्वर दत्त द्वारी जी के घर पर गोपाल सिंह नेपाली के अनेक दुर्लभ गीत सुने थे. वहीं प्रोफेसर ताराचरण खबाड़े जी की सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘संताल परगना के साहित्यकार’ की भी चर्चा हुई. हिंदी साहित्य का इतिहास प्रारंभ में काशी-प्रयाग केंद्रित और बाद में दिल्ली-केंद्रित हो जाने के कारण इस क्षेत्र के अग्रगण्य हिंदी लेखन की बड़ी उपेक्षा हुई. कम लोगों को पता है कि भारतेंदु का जन्म इसी क्षेत्र के राजमहल में हुआ था. उनका बचपन इसी अंग क्षेत्र में बीता था, जिससे बांग्ला सीखने का उन्हें सुयोग मिला. हिंदी की सबसे पहले मुक्तछंद कविता लिखने का श्रेय भी यहीं के महेश नारायण को जाता है, जिन्होंने निराला से बहुत पहले 1881 में ‘स्वप्न’ शीर्षक से लंबी मुक्तछंद कविता लिखी थी.
यहां एक बड़े गांधीवादी साहित्यकार बुद्धिनाथ झा ‘कैरव’ से मिलने का एक अवसर बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के स्वर्ण जयंती कवि सम्मेलन में मुझे मिला था, मगर किसी कारणवश वे नहीं आ पाये और मेरा सपना अधूरा ही रह गया. देवघर जनपद के शंभुनाथ ‘मुकुल’ नाटककार और कवि के साथ-साथ प्रखर पत्रकार भी थे. नकेनवाद के 10 सूत्रीय घोषणापत्र को सर्वप्रथम उन्होंने ही अपने अखबार ‘प्रकाश’ में स्थान दिया था.आदिवासी साहित्य के शलाका-पुरुष डोमन साहु ‘समीर’ महत्वपूर्ण साहित्यकार थे, जिन्होंने एक ओर संताली को नागरी लिपि में समोने का पहला प्रयास किया. गोड्डा के रंजन सूरिदेव हिंदी पाठकों के बीच सदा लोकप्रिय रहे हैं. आज के प्रगतिशील समीक्षक और कवि खगेंद्र ठाकुर भी गोड्डा के ही मालिनी गांव के हैं.
ठाकुर प्रसाद जी के सान्निध्य से सृजन-रत होनेवाली प्रतिभाओं में दुर्गाप्रसाद खवाड़े का नाम अग्रणी है. देवघर के ही मेरे प्रिय कवि रामशंकर मिश्र ‘पंकज’ की समाज पर छाप इतनी गहरी है कि उनके जन्मदिन पर बाबा मंदिर के प्रांगण में गायकों की टोलियां जुटती हैं. उनकी एक गीत की पंक्ति ‘तुम ही बोलो इस बंजर में, कहां गीत के पेड़ लगाएं?’ आज और अर्थवती हो गयी है.
हिंदी की कोई विधा गोड्डा के डॉ श्याम सुंदर घोष का नाम लिए बिना पूरी नहीं हो सकती. संताली जीवन पर आधारित उनका खंडकाव्य ‘अरण्यायन’ शिल्प और कथ्य दोनों दृष्टियों से अद्भुत है. बनारस के मूर्धन्य कवि ज्ञानेंद्रपति भी गोड्डा जिले के ही हैं. हिंदी साहित्य के उन्नयन में जो स्थान उन्नाव जनपद का है, उससे काम गोड्डा जनपद का नहीं है.
देवघर से काशी लौटते समय मैं भी ठाकुर भाई की तरह उदास था और मेरे होठों पर उनका गीत लरज रहा था-‘मेरे घर के पीछे लाल चंदन है/आ जाना वंदन है.’
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