प्रतीकात्मक राजनीति का दिखावा

Updated at : 26 Dec 2015 4:26 AM (IST)
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प्रतीकात्मक राजनीति का दिखावा

विश्वनाथ सचदेव वरिष्ठ पत्रकार देश के शीर्षस्थ पुलिस अधिकारियों का तीन दिवसीय सम्मेलन इस बार गुजरात के कच्छ में हुआ था. यह पहली बार था, जब देश का प्रधानमंत्री पूरे समय इस तरह के सम्मेलन में उपस्थित रहा. पहली बार ऐसे सम्मेलन के लिए ‘तंबू नगरी’ बसायी गयी थी. संभवतः पहली बार ऐसे सम्मेलन में […]

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विश्वनाथ सचदेव

वरिष्ठ पत्रकार

देश के शीर्षस्थ पुलिस अधिकारियों का तीन दिवसीय सम्मेलन इस बार गुजरात के कच्छ में हुआ था. यह पहली बार था, जब देश का प्रधानमंत्री पूरे समय इस तरह के सम्मेलन में उपस्थित रहा. पहली बार ऐसे सम्मेलन के लिए ‘तंबू नगरी’ बसायी गयी थी. संभवतः पहली बार ऐसे सम्मेलन में पुलिस अधिकारियों के परिवारों ने भी भागीदारी की. पहली बार है, जब प्रधानमंत्री और उनके वरिष्ठ सहयोगियों के लिए बनाये गये ‘आलीशान दरबारी टेंट’ किराये पर भी मिल सकेंगे. ये अलीशान टेंट पूरी तरह से सुख-सुविधाओं से सज्जित किये गये थे.

एक तंबू की लागत थी लगभग 31 लाख रुपये. एक तंबू का चित्र छपा है अखबार में. चित्र में तंबू के बाहर शतरंज की बिसात-सी बिछी दिख रही है. इसके पीछे क्या धारणा रही होगी, पता नहीं, पर इसे देख कर अनायास राजनीति की बिसात याद आ जाती है. यह विचार भी मन में कौंध जाता है कि हर चीज का राजनीतिक नफा-नुकसान क्यों महत्वपूर्ण बन जाता है. देश के वरिष्ठतम पुलिस अधिकारियों के इस सम्मेलन में स्वाभाविक है कुछ महत्वपूर्ण निर्णय भी लिये गये होंगे, जिनसे जनता को अवगत कराया जाना चाहिए, पर विडंबना है कि यह सम्मेलन चर्चा में इसलिए है कि वहां प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों के लिए राजसी टेंट लगाये गये थे. ग्यारह टेंट बने थे और इन पर लाखों रुपये खर्च हुए थे.

अब इन टेंटों को सैलानियों को किराये पर दिये जायेंगे. पर्यटन विभाग के इस फैसले का समर्थन तो किया ही जाना चाहिए. आखिर इतना खर्चा हुआ है, तो कुछ तो वसूली हो. लेकिन, आशंका यह है कि सरकारी अफसर और मंत्रीगण ही कहीं ‘किरायेदार’ न बने रहेöं, तब तो पैसा सरकारी विभागों में ही आता-जाता रहेगा.

बहरहाल, इन राजसी तंबुओं को लेकर चर्चा हमारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री के ‘कुछ हट के’ करने के हठ के संदर्भ में भी हो रही है. आप चाहें तो इसे दिखावा भी कह सकते हैं. वैसे, यह सम्मेलन राष्ट्रीय राजधानी में या सुविधाओं वाले किसी भी बड़े शहर में किया जा सकता था.

ऐसा होता भी रहा है. पहले के इन सम्मेलनों में किये गये निर्णयों की ही चर्चा होती थी, पर इस बार चर्चा तंबुओं की हो रही है! तंबुओं की बात सुन कर प्रधानमंत्री का वह सूट याद आता है, जो उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा की एक भारत-यात्रा के दौरान पहना था.

पता नहीं कितना महंगा था वह, पर चर्चा रही कि दस लाख रुपये का सूट था वह, जो बाद में करोड़ों में नीलाम हुआ! राष्ट्रपति ओबामा की उस यात्रा के दौरान महत्त्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव डालनेवाले निर्णय भी हुए थे. ऐसा नहीं है कि इन निर्णयों के बारे में कुछ भी बात नहीं हुई, पर सब जानते हैं कि आज भी प्रधानमंत्री के उस सूट की चर्चा होती है. राहुल गांधी ने तो उसी को आधार बना कर ‘सूट-बूट की सरकार’ वाला नारा दिया था!

सवाल है कि मुख्य बिंदुओं से ध्यान हटाने के मौके ही क्यों दिये जाते हैं? न तो प्रधानमंत्री का तंबू में जाकर रहना गलत था और न ही व्यक्तिगत रूप से शुभकामना संदेश भेजना. दोनों बातों का प्रतीकात्मक महत्त्व है, पर प्रतीकों के कई-कई अर्थ निकाले जा सकते हैं.

राजनीति में प्रतीकों का निश्चित महत्त्व होता है, लेकिन सिर्फ प्रतीकों से बात नहीं बनती. प्रतीकों के साथ एक आस्था और मौलिक सोच जुड़ा होना चाहिए, तब उनका प्रभाव पड़ता है. लेकिन सवाल है कि लाखों के तंबू में रह कर देश का प्रधानमंत्री आखिर क्या संदेश पहुंचाना चाहता है?

आजकल मुबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन चलाये जाने की चर्चा है. बुलेट ट्रेन का अपना महत्त्व है. उसे प्रगति के प्रतीक के रूप में जनता के सामने रखने का राजनीतिक अर्थ भी समझा जा सकता है, पर सवाल प्राथमिकता का है. आनेवाले कल की जरूरतों पर ध्यान देना गलत नहीं है, पर इस प्रक्रिया में यदि यह संदेश जाता है कि आज की जरूरतों की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा, तो राजनीतिक दृष्टि से इस तरह काम करने में कोई समझदारी नहीं है.

आज की प्राथमिकता आम यात्री को रेल उपलब्ध कराने की है. हवाई-यात्रा के बराबर किराया देकर बुलेट ट्रेन में जानेवाले ‘कुछ’ की तुलना में वे ‘बहुत सारे’ अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, जिन्हें रेल-आरक्षण के लिए महीनों पहले लंबी कतारें लगानी पड़ती हैं.

इसलिए, जरूरी है हमारी प्राथमिकताएं सही हों, हमारे प्रतीकात्मक कदम सही दिशा में उठते दिखें. सूट या शाही तंबू वाले प्रतीकों के सहारे की जानेवाली राजनीति में किसी मोहरे की चाल तय नहीं होती. राजनीति की ऐसी बिसात पर कोई भी मोहरा कैसे भी चलने लगता है. हालांकि हमारे प्रधानमंत्री एक कुशल खिलाड़ी हैं. उन्हें मोहरों वाली राजनीति के सही और सटीक प्रतीकों का सहारा लेना होगाö. कुछ ठोस करना होगा और जल्दी करना होगा.

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