उपेक्षित हैं नायकों की शहादतें!

Updated at : 18 Dec 2015 11:39 PM (IST)
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उपेक्षित हैं नायकों की शहादतें!

कृष्ण प्रताप सिंह वरिष्ठ पत्रकार स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान अंगरेज सरकार ने 1927 में 19 दिसंबर को यानी आज के ही दिन ऐतिहासिक ‘काकोरी कांड’ के तीन नायकों-रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, अशफाकउल्लाह खां और रोशन सिंह को क्रमशः गोरखपुर, फैजाबाद और इलाहाबाद की जेलों में शहीद कर डाला था. चौथे नायक राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को लेकर उसे अंदेशा […]

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कृष्ण प्रताप सिंह
वरिष्ठ पत्रकार
स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान अंगरेज सरकार ने 1927 में 19 दिसंबर को यानी आज के ही दिन ऐतिहासिक ‘काकोरी कांड’ के तीन नायकों-रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, अशफाकउल्लाह खां और रोशन सिंह को क्रमशः गोरखपुर, फैजाबाद और इलाहाबाद की जेलों में शहीद कर डाला था.
चौथे नायक राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को लेकर उसे अंदेशा था कि क्रांतिकारी हमला करके उन्हें छुड़ा ले जायेंगे, इसलिए उसने फांसी की तारीख से दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही गोंडा जेल में उनकी जान ले ली थी. इन क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता संघर्ष के लिए धन जुटाने हेतु 1925 में नौ अगस्त को ट्रेन से ले जाया जा रहा सरकारी खजाना लखनऊ के निकट स्थित काकोरी रेलवे स्टेशन के पास लूट लिया था.
उनका मानना था कि अंगरेजों ने जनता का शोषण करके जो धन सरकारी खजाने में इकट्ठा कर रखा है, वह जनता का ही है और आजादी के संघर्ष में इस्तेमाल उसका सबसे अच्छा उपयोग है.
ये शहीद इस अर्थ में बहुत अभागे हैं कि आजादी मिलने के दशकों बाद तक किसी को उनके शहादत स्थलों की याद नहीं आयी.
न ही उनकी स्मृतियों को संजोने की जरूरत महसूस हुई. फैजाबाद जेल स्थित अशफाक का शहादत स्थल 1967 तक गुमनामी में खोया रहा और जानें कब तक खोया रहता, अगर कुछ स्वतंत्रता सेनानी जेल प्रशासन से अपनी श्रद्धा के फूल चढ़ाने के लिए वहां जाने देने की इजाजत नहीं मांगते. तब से स्वतंत्रता सेनानी वहां हर 19 दिसंबर को मेला लगाने लगे.
बाद में ‘बिस्मिल’, लाहिड़ी व रोशन सिंह की शहादत वाली जेलों में भी श्रद्धांजलि सभाएं या मेले आयोजित करके उन्हें याद किया जाने लगा था. लेकिन अब इसके घटते जोश व जज्बे के कारण इन नायकों की यादें फिर से धुंधलाने लगी हैं. तिस पर सरकारी कृतघ्नता का आलम यह है कि सरफरोशी की तमन्ना से बाजु-ए-कातिल का जोर देखनेवाले ‘बिस्मिल’ की याद में गोरखपुर जेल में उनकी प्रतिमा के समक्ष होनेवाला श्रद्धांजलि समारोह जेल के अधिकारियों, कुछ वामपंथी छात्र संगठनों व स्थानीय लोगों की सदाशयता पर निर्भर है.
गोंडा जेल में राजेंद्रनाथ लाहिड़ी की प्रतिमा स्थापित है, जबकि शहादत के बाद जहां उनका पार्थिव शरीर रखा गया और जिस बूचड़ घाट पर उनकी अंत्येष्ठि की गयी थी, वहां स्मारक, पार्क व समाधि आदि निर्मित हैं.
लेकिन उनकी प्रतिमा को शहादत यानी 17 दिसंबर के दिन भी ठीक से दो फूल नसीब नहीं होते. उनके नाम पर बने उद्यान की तो ऐसी दुर्दशा है कि किसी भी सहृदय की आंख से आंसू निकल पड़ें. लेकिन सत्ताएं हैं कि उनकी आंखों में नम होने भर को भी पानी नहीं बचा है.
रोशन सिंह को इलाहाबाद की मलाका जेल में शहादत दी गयी थी, जिसे अब नैनी केंद्रीय कारागार में समाहित कर दिया गया है और उसके भवन में पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की मां स्वरूपरानी के नाम से मेडिकल काॅलेज संचालित है. इस काॅलेज के एक कोने में रोशन की प्रतिमा लगा कर उनके प्रति कर्तव्यों की इतिश्री कर ली गयी है. यह प्रतिमा भी श्रद्धा के फूलों के लिए तरसती रहती है.
फैजाबाद जेल में अशफाक के शहादत स्थल पर लगनेवाला मेला एक वक्त इस अंचल के लिए श्रद्धांजलि पर्व सरीखा हुआ करता था.
लेकिन कुछ साल पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिषद् यह कह कर उसके आयोजन से विरत हो गयी कि स्वतंत्रता सेनानियों की संख्या अब इतनी कम रह गयी है कि वे अपनी पेंशन से मेले का खर्च नहीं उठा सकते. सरकार, सांसद या विधायक इसके लिए एक धेला तक नहीं देते और वहां आकर बार-बार झूठी घोषणाएं करते हैं.
अब जेल प्रशासन एक स्थानीय सपा नेता द्वारा अशफाक के नाम पर गठित किये गये ट्रस्ट के साथ मिल कर वहां ‘भव्य’ श्रद्धांजलि समारोह आयोजित करता है, तो उसमें अशफाक को श्रद्धांजलि देने और उन्हें याद ताजा करने से ज्यादा जोर ट्रस्ट द्वारा दिये जानेवाले कथित ‘माटीरतन’ सम्मान के प्रचार-प्रसार पर होता है. इसीलिए कुछ प्रतिबद्ध लोग कहते हैं कि इस तरह दलीय स्वार्थों के कीचड़ से लथपथ करके अशफाक को याद करने से उन्हें भुला देना ही बेहतर होगा.
लेकिन क्या कीजिएगा, जिले के एक विधान परिषद् सदस्य ने, जो अब भूतपूर्व हो चुके हैं, अपनी विधायक निधि से अशफाक के शहादतस्थल का सुंदरीकरण कराया, तो उसके प्रवेशद्वार का नाम अपने दल के नेता के नाम पर करके अशफाक को उनकी शहादत की जगह पर भी ‘छोटा’ कर दिया!
फैजाबाद, गोंडा, गोरखपुर और इलाहाबाद जिलों में यह मांग प्रायः उठती रहती है कि इन शहीदों के शहादत दिवसों पर सार्वजनिक छुट्टी की जाये. मगर इसकी लगातार अनसुनी की जा रही है.
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