अर्धसत्यों के साथ मोदी के प्रयोग

।। अजय सिंह ।। मैनेजिंग एडिटर गवर्नेस नाऊ चूंकि मोदी लोगों के बीच अनुगूंज पैदा करने में सक्षम एक सशक्त रूपक खड़ा करने के लिए तथ्यों के संग कल्पना को चतुराई से मिलाते हैं, इसलिए वह इस प्रक्रिया में इतिहास का कम से कम उपयोग करना चाहते हैं. राजनीति एक अरेखीय समीकरण है. यह परंपरागत […]
।। अजय सिंह ।।
मैनेजिंग एडिटर
गवर्नेस नाऊ
चूंकि मोदी लोगों के बीच अनुगूंज पैदा करने में सक्षम एक सशक्त रूपक खड़ा करने के लिए तथ्यों के संग कल्पना को चतुराई से मिलाते हैं, इसलिए वह इस प्रक्रिया में इतिहास का कम से कम उपयोग करना चाहते हैं.
राजनीति एक अरेखीय समीकरण है. यह परंपरागत जानकारियों की अनदेखी करती है. लेकिन, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी किसी गणितीय समीकरण से भी ज्यादा जटिल पहेली बन गये हैं. अतीत की उनकी छवि के विपरीत मौजूदा दौर के उनके भाषणों–बयानों से यह पहेली और जटिल हो गयी है.
31 अक्तूबर को गुजरात के केवड़िया में नर्मदा बांध पर जो प्रदर्शन हुआ, उससे यह सबसे ज्यादा स्पष्ट होता है. इस दिन मोदी और लालकृष्ण आडवाणी ने आजादी के बाद भारत को एकसूत्र में बांधनेवाले देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की, विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा की आधारशिला रखी. यह प्रतिमा न्यूयॉर्क स्थित ‘स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी’ से लगभग दोगुने आकार की होगी. सरदार सरोवर बांध के किनारे बननेवाली इस प्रतिमा का नाम ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ रखा गया है.
प्रतिमा के सहारे जिस शब्दावली और मुहावरे में राजनीतिक रूपक बुना गया है, वह स्वतंत्र भारत के अब तक के चुनावी इतिहास में अनोखा है. इस परियोजना के सहारे सरदार पटेल को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तथा नेहरू–गांधी परिवार के राजनीतिक वर्चस्व के एक प्रतिपक्ष–आदर्श के रूप में खड़ा करने का प्रयास लगातार किया जा रहा है.
देश की राजनीति में पटेल बनाम नेहरू की बहस पहली बार नहीं हो रही है. ऐसी बहस आजादी मिलने के समय से ही सतह के नीचे चली आ रही है. यहां तक कि महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी ने सरदार पटेल की जीवनी में भी इस बात को रेखांकित किया कि राष्ट्रनिर्माण में पटेल के योगदान और उनकी विरासत को भुला दिया गया.
‘सरदार : ए लाइफ’ की भूमिका में उन्होंने लिखा, ‘भारत का प्रथम प्रधानमंत्री चुनने के मौके पर गांधी ने पटेल के प्रति अन्याय किया या नहीं, लेकिन यह प्रश्न बार–बार उठता रहा है.
मेरी पड़ताल में सामने आया इसका जवाब, इन पृष्ठों में मिलेगा. कुछ लोगों का यह विचार कि गांधी वल्लभभाई के प्रति निष्पक्ष नहीं थे, यही पटेल की जीवनी लिखने का कारण बना.’
लेकिन, पहले कभी किसी राजनीतिज्ञ ने पटेल को नेहरू के प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रक्षेपित करने की ऐसी खुल्लमखुल्ला कोशिश नहीं की थी, जैसा एक उभरते राष्ट्रीय राजनीतिक सितारे और देश के सर्वोच्च राजनीतिक कार्यालय के दावेदार द्वारा किया जा रहा है.
यह इसलिए कि इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि कुछ संवेदनशील मद्दों पर भिन्न मत रखने के बावजूद सरदार और नेहरू स्वाधीनता संघर्ष में अभिन्न साथी तथा महात्मा गांधी के अनुयायी थे.
वे राष्ट्र के प्रति एक दूसरे की कर्तव्य–भावना की सराहना करते थे. यही कारण है कि मोदी का जोर–शोर के साथ किया जा रहा दावा कि पटेल, नेहरू की तुलना में भारत को एक अलग राह पर बेहतर ढंग से ले जाते, किसी के गले नहीं उतरता. इतिहास को लेकर मोदी अर्धसत्य बोलते हैं, क्योंकि वह जानते हैं कि राजनीति का संबंध विद्वता से कम और ‘मौके’ को पकड़ने से ज्यादा है.
जब अहमदाबाद में सरदार पटेल स्मारक भवन के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने मनमोहन सिंह की मौजूदगी में नेहरू के प्रतिपक्ष आदर्श के रूप में सरदार का समर्थन किया, तब उन्होंने हूबहू वही किया. उन्होंने कहा कि यह अफसोस का विषय है कि सरदार पटेल पहले प्रधानमंत्री नहीं बनाये गये. ‘यदि वे पहले प्रधानमंत्री बने होते, तो भारत का विकास अलग रास्ते और बेहतर तरीके से हुआ होता’, यह कह कर उन्होंने प्रधानमंत्री को मुश्किल में डाल दिया, जिन्हें व्यापक तौर पर नेहरू–गांधी शासन के एक अंग के रूप में ही देखा जाता है.
नेहरू–गांधी शासन के विरुद्ध पटेल को रखना, दरअसल कांग्रेस तथा उसके शासन के विरुद्ध अपना रूपक खड़ा करने के लिए सजगतापूर्वक तैयार की गयी रणनीति है. चूंकि मोदी लोगों के बीच अनुगूंज पैदा करने में सक्षम एक सशक्त रूपक खड़ा करने के लिए तथ्यों के संग कल्पना को चतुराई से मिलाते हैं, इसलिए वह इस प्रक्रिया में इतिहास का कम से कम उपयोग करना चाहते हैं.
मोदी ने वंशवाद का प्रतीक बन चुके कांग्रेस शासन के विरुद्ध लोगों के आक्रोश से गंठजोड़ कर, इतिहास के उस भूमिगत विमर्श को पुनर्जीवित कर दिया है, जो मानता आया है कि पटेल के साथ गलत हुआ था. ऐतिहासिक तथ्यों को दरकिनार कर तथा एक सुसुप्त राजनीतिक विमर्श को हवा देने के मकसद से अर्धसत्यों के सहारे मोदी भारत को सोचने पर विवश कर रहे हैं : ‘ठीक है कि उन पर नेहरू को तरजीह दी गयी, क्योंकि नेहरू की शख्सीयत बड़ी थी और वे प्रधानमंत्री बनने के सर्वथा योग्य भी थे, लेकिन नेहरू–गांधी की पीढ़ियों ने सरदार को गुमनामी के अंधेरे में क्यों धकेल दिया? क्या एकीकृत भारत में एक गौरवपूर्ण स्थायी स्थान के हकदार वे नहीं थे?’
और इसमें यदि वे यहां–वहां थोड़ा जोड़ भी रहे हैं, तो भी वे कांग्रेस के प्रति वर्तमान आक्रोश को एक ऐतिहासिक संदर्भ दे रहे हैं. लोगों को बता रहे हैं कि हर व्यक्ति और हर बात की कीमत पर यह दल सिर्फ एक परिवार के लिए रहा है. पटेल कांग्रेसी थे और महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध के लिए जिम्मेवार थे, इस इतिहास में बिना किसी कटौती के पटेल की 183 मीटर ऊंची प्रतिमा बनाने की उनकी परियोजना, विशेष तौर पर भारत की नेहरूवादी अवधारणा से एक मुठभेड़ है.
आरएसएस दीक्षित मोदी ने पटेल का चुनाव अपना खुद का एक मजबूत और करिश्माई रूपक तैयार करने के लिए किया है. उन्होंने संघ परिवार के स्थायी आदर्शो को क्यों नहीं चुना? अव्वल, तो इसलिए कि यदि वे ऐसा करते, तो उससे स्थानीय सुर्खियां भी नहीं बनतीं. दूसरे, वे कांग्रेस को इस तरह न धमका पाते जितना कि उसी के उपेक्षित जखीरे से एक जंग लगे आदर्श को छीन कर किया है.
खासकर तब, जब मतदाता सेकुलरिज्म और राष्ट्रवाद पर वैकल्पिक विमर्शो को सुनने को उत्सुक दिख रहा हो. और अंतत:, जो लोग ऐसे प्रश्न उठाते हैं, वे आजादी के बाद के दौर में नेहरू से पिछड़ गये दक्षिणपंथी रुझानवाले कांग्रेसी नेताओं की विरासतों को लेकर संघ परिवार के सुसंगत प्रयासों को भूल गये लगते हैं.
भाजपा की राजनीतिक स्थिति को लेकर एक प्रश्न पर लालकृष्ण आडवाणी ने एक बार कहा था कि, भाजपा कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करनेवाले सरदार पटेल, पुरुषोत्तम दास टंडन और राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं की धारा की जायज उत्तराधिकारी पार्टी बन सकती है. उन्होंने यह कबूल किया था कि पार्टी के पास ऐसे सशक्त आदर्शो का अभाव है, जिनका व्यक्तित्व नेहरूवादी वर्चस्व के मुकाबले प्रतिरूपक खड़ा कर सके. इसलिए मोदी द्वारा पटेल का चयन स्वाभाविक ही है.
(अनुवाद : कुमार विजय)
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