पीछे छूट गया आंदोलन का मुद्दा

Published at :15 Nov 2013 4:01 AM (IST)
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पीछे छूट गया आंदोलन का मुद्दा

।। ऋतंभरा हेब्बर।।(एसो. प्रोफेसर, टीआइएसएस) झारखंड राज्य के तौर पर अपने अस्तित्व के 13 साल पूरे कर रहा है. लेकिन, जिन उम्मीदों के साथ राज्य का गठन किया गया था, वे इन 13 सालों में बिखरती दिख रही हैं. यहां आज तक कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पायी है. आखिर क्या वजह है […]

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।। ऋतंभरा हेब्बर।।
(एसो. प्रोफेसर, टीआइएसएस)

झारखंड राज्य के तौर पर अपने अस्तित्व के 13 साल पूरे कर रहा है. लेकिन, जिन उम्मीदों के साथ राज्य का गठन किया गया था, वे इन 13 सालों में बिखरती दिख रही हैं. यहां आज तक कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पायी है. आखिर क्या वजह है कि गठन के बाद से ही झारखंड विवादों और राजनीतिक अस्थिरता के बीच घिरा रहा है?

आखिर क्यों यह राज्य ऐसा नेतृत्व विकसित करने में असफल रहा, जो सही तौर पर लोगों की अगुवाई करने का दावा कर सके? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अलग राज्य के आंदोलन में शरीक कई लोग आज सत्ता की लड़ाई के केंद्र में हैं. अलग राज्य के आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले शिबू सोरेन जो 70 और 80 के दशक में काफी लोकप्रिय थे और जिनके एक इशारे पर लाखों आदिवासी जमा हो जाते थे, वे सरकार गठन के जोड़तोड़ तक सिमट कर रह गये. आदिवासी आंदोलन में चुनावी राजनीति कमजोर कड़ी बन गयी.

चुनावी राजनीति ने वहां के दलों के बीच वैचारिक भिन्नता को मिटा दिया. मौजूदा झारखंड ग्रेटर झारखंड की मांग से कोसों दूर है. ग्रेटर झारखंड में पश्चिम बंगाल, ओड़िशा के कुछ जिलों को शामिल करने की मांग शामिल रही है. लेकिन, चुनावी राजनीति ने इस मांग को काफी पीछे छोड़ दिया है. आज चुनावी राजनीति में आदिवासी आंदोलन का मुद्दा दलों के लिए महत्वपूर्ण नहीं रह गया है. झारखंड आंदोलन के शुरुआती दिनों से ही आंदोलन की राजनीति और चुनावी राजनीति में काफी अंतर रहा है. यही वजह है कि झारखंड के भविष्य की जब बात होती है तो आंदोलन में दूरदर्शिता की कमी इस पर भारी पड़ती दिखती है और यह चुनाव परिणामों को प्रभावित नहीं कर पाता है. हालांकि, झारखंड आंदोलन की कई उपलब्धियां रही हैं, लेकिन इन 13 सालों में ही कई उपलब्धियां नाकामियों पर भारी पड़ गयीं.

नक्सलवाद के उभार ने आदिवासियों के विरोध के तरीके को बदल दिया, जबकि किसी भी लोकतंत्र में आपसी संवाद का होना बेहद जरूरी होता है. महज 13 सालों में ही आठ मुख्यमंत्री बन गये. झारखंड की दुर्दशा के मुद्दे को मैं दूसरे नजरिये से देखती हूं. मैं यह नहीं मानती कि झारखंड की मौजूदा स्थिति के लिए सहानुभूति न रखने परदेस बसनेवाली सरकारें जिम्मेवार रही हैं, क्योंकि प्रमुख झारखंडी नेता भी जन उम्मीदों को पूरा करने में असफल साबित हुए हैं. प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के कारण हमेशा झारखंड की प्रशंसा होती है, लेकिन दुर्भाग्यवश यह स्थानीय आदिवासी लोगों के हाशिये पर पहुंचने का एक मुख्य कारण भी है. झारखंड का अधिकांश विकास देश के पूंजीपतियों के हितों को पूरा करने के लिए हुआ है और इस विकास से स्थानीय लोगों को काफी कम लाभ मिला है. झारखंड पर अधिकांश बहस विकास की संभावनाओं पर होती है, लेकिन इन बहसों में विकास की प्रक्रिया में लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन का सवाल नहीं उठाया जाता है.

मेरा मानना है कि झारखंड का मूल मसला लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को बहाल करना है न कि प्रचारित किया जा रहा कॉरपोरेट विकास का मौजूदा मॉडल. विकास के कारण आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन से बेदखल करने की प्रक्रिया चली, जिसने उन्हें काफी नुकसान पहुंचाया है. स्थानीय आदिवासी विकास के रास्ते का निर्णय करने के अधिकार की मांग कर रहे हैं और यह केवल झारखंड के लिए ही नहीं बल्कि देश के सभी आदिवासी इलाकों में शासन के तरीके में बदलाव से संभव है. आदिवासी इलाकों में विकास के मॉडल पर संवदेनशील रवैया अपनाने की जरूरत है.

साथ ही इस बात पर भी गौर करने की जरूरत है कि मौजूदा विकास मॉडल कैसे स्थानीय आदिवासियों के मूलभूत राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों का हनन कर रहा है. दुर्भाग्यवश, पिछले एक दशक में आदिवासी राजनीति की स्थिति और खराब हुई है. झारखंड में सरकार की नीतियों को लेकर स्थानीय स्तर पर कई जगह विरोध हो रहे हैं, लेकिन जनादेश के अभाव के कारण सरकार इन समस्याओं का समाधान करने में अक्षम है. झारखंड की सबसे बड़ी समस्या है कि राजनीतिक दल लोगों के संघर्ष से दूर होते जा रहे हैं. राजनीतिक दलों के लिए विकास का मतलब सिर्फ बड़े उद्योग लगाने और निजी पूंजी को आकर्षित करने तक सिमट कर रह गया है. यही राज्य में राजनीतिक तनाव का सबसे बड़ा मुद्दा है. कंपनियों द्वारा जमीन अधिग्रहण का व्यापक विरोध ग्राम सभाएं कर रही हैं. ऐसा लगता है कि राजनीतिक दल और लोगों के बीच संवाद खत्म हो गया है. झारखंड की सबसे बड़ी विडंबना अवसरवादी राजनीति का प्रभावी होना है. स्थानीय लोगों के सशक्तीकरण से ही राज्य के हालात बदलेंगे.

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