खुर्शीद के पैंतरे

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने पाकिस्तान में एक गोष्ठी में भारत सरकार की पाकिस्तान नीति की आलोचना की है. बतौर विपक्षी नेता, सरकार की आलोचना उनकी जिम्मेवारी भी है और लोकतांत्रिक राजनीति में यह जरूरी भी है. लेकिन, आलोचनाएं सही संदर्भ और स्थापित मर्यादाओं के दायरे में होनी चाहिए. […]
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने पाकिस्तान में एक गोष्ठी में भारत सरकार की पाकिस्तान नीति की आलोचना की है. बतौर विपक्षी नेता, सरकार की आलोचना उनकी जिम्मेवारी भी है और लोकतांत्रिक राजनीति में यह जरूरी भी है. लेकिन, आलोचनाएं सही संदर्भ और स्थापित मर्यादाओं के दायरे में होनी चाहिए. खुर्शीद अनुभवी नेता हैं और उन्हें अपने उत्तरदायित्व का बखूबी अहसास भी होगा, परंतु मोदी सरकार की पाकिस्तान से संबंधित नीतियों की उनकी आलोचना आंतरिक राजनीति से अधिक प्रेरित प्रतीत होती है.
उस बैठक में खुर्शीद देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता और वरिष्ठ कूटनीतिक की हैसियत से उपस्थित थे. इस लिहाज से वह देश का भी प्रतिनिधित्व कर रहे थे. मोदी सरकार की नीतियों से उन्हें और उनकी पार्टी को जो शिकायतें हैं, उनका उल्लेख वह भारत में कर सकते थे. पाकिस्तान में उन्हें भारत से जुड़ी पाकिस्तानी नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए थी. इसके विपरीत उन्होंने पाकिस्तान की सरकार के रवैये की खूब प्रशंसा की. खुर्शीद और कांग्रेस से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि यूपीए सरकार के दौर की तुलना में आज पाकिस्तान की नीतियों और भारत के प्रति उसके रुख में ऐसा क्या बदलाव आ गया, जिसके आधार पर उसकी प्रशंसा होनी चाहिए.
अगर पूर्व विदेश मंत्री सरकारी पहलों से इतने ही नाराज हैं, तो उन्होंने या उनकी पार्टी ने संसद या संसद से बाहर ठोस आलोचना क्यों नहीं रखीं? यह सब नहीं करते हुए पाकिस्तान की धरती पर भारत सरकार की आलोचना का उद्देश्य सुर्खियां बटोरने या सतही राजनीति करने के अलावा और क्या हो सकता है? देश से बाहर आंतरिक राजनीति पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयानों की आलोचना करनेवाली कांग्रेस खुर्शीद के बयान को स्वीकार कैसे कर सकती है? पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस या खुर्शीद ने विदेश नीति पर शायद ही कोई गंभीर बयान दिया है.
पाकिस्तान सरकार को शाबासी देते हुए खुर्शीद भूल गये कि आज भी पाकिस्तान-समर्थित आतंकी देश में घुसपैठ कर रहे हैं, नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर युद्धविराम का उल्लंघन लगातार हो रहा है, भारत के विरुद्ध आतंक फैलानेवाले गिरोहों को पाकिस्तान में आज भी छूट मिली हुई है. अफसोस की बात है कि सलमान खुर्शीद ने अपनी जिम्मेवारियों को दरकिनार कर राजनीतिक स्वार्थों को आगे रखा. आशा है कि वह और उनकी पार्टी अब ऐसी गलतियां करने से परहेज करेंगे.
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