बस का सफर या बेबस सफर!

Updated at : 13 Nov 2015 5:48 AM (IST)
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बस का सफर या बेबस सफर!

व्यालोक स्वतंत्र टिप्पणीकार वह किसी दंगाग्रस्त क्षेत्र सा दिखता है. या फिर, यहां पहुंचते ही आपको किसी युद्ध के मैदान की याद आयेगी. यलगार के से नारे और चौतरफा शोर में आपकी बुद्धि कुंद हो जायेगी. चौतरफा उड़ती धूल के धुंध से आपको भान होगा कि हल्दीघाटी के मैदान में मानो राणा प्रताप ही अपनी […]

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व्यालोक

स्वतंत्र टिप्पणीकार

वह किसी दंगाग्रस्त क्षेत्र सा दिखता है. या फिर, यहां पहुंचते ही आपको किसी युद्ध के मैदान की याद आयेगी. यलगार के से नारे और चौतरफा शोर में आपकी बुद्धि कुंद हो जायेगी. चौतरफा उड़ती धूल के धुंध से आपको भान होगा कि हल्दीघाटी के मैदान में मानो राणा प्रताप ही अपनी सेना का नेतृत्व कर जमीन-आसमान को धूल से एक कर देना चाहते हों. हालांकि, यह साल 2015 है.

यह दृश्य आपको बिहार के किसी भी शहर या कस्बे के बस-स्टैंड पर मिल सकता है. पटना भी इससे अछूता नहीं है. बिहार में सड़कों का हाल भले ही थोड़ा-बहुत सुधर गया है, सार्वजनिक परिवहन के मामले में अभी हालत खस्ता ही है. यहां की सरकारों ने बहुत पहले ही यातायात और परिवहन को पारग्रहीय समस्या मान कर उससे अपना पल्ला झाड़ लिया था.

इसके बाद यह सेक्टर बेरोक-टोक निजी हाथों में फल-फूल रहा है और यात्रियों को जीते-जी ही तमाम ग्रहों-नक्षत्रों की सैर कराने की ‘सेवा’ मुहैया करा रहा है. दीपावली-छठ जैसे पर्व के मौके पर जब, प्रवासी बिहारियों का भारी मात्रा में ‘स्वदेश’ लौटना होता है, तब इस दृश्य का बेहद आमहफम होना तय ही मान लीजिए.

मान लीजिए आप किसी महानगर से पटना स्टेशन पर उतरे. आपका घर यहां से 50-100 किमी दूर किसी इलाके में है. घर तक जाने का एकमात्र विकल्प आपके लिए अगर बस की यात्रा है, तो वह मीठापुर बस-स्टैंड ही मुहैया करा सकता है. वहां तक जाने के लिए आपको ऑटो में सफर करना होगा, जिसमें छह की जगह होने पर आठ से दस यात्री बिठाये जाते हैं.

सारी चिल्लपों और गपड़चौथ से जूझते हुए यदि आप बिना घायल हुए और सुरक्षित बस स्टैंड पहुंच गये, तो खुशनसीब हैं. मीठापुर बस स्टैंड वर्षों जमा हुए कूड़े के ढेर पर बसा है. इसलिए, स्टेशन से वहां तक की ऐतिहासिक यात्रा पूरी कर जैसे ही आप अपने टेंपो से उतरेंगे, तो खतरनाक बदबू आपका स्वागत करेगी. उसके बाद तो, वही दृश्य होगा जो ऊपर बताया गया है. पांच-छह बसें, दर्जनों टेंपो और बीसियों आदमी एक साथ अपना हॉर्न, गला और न जाने क्या-क्या फाड़ कर परस्पर संवाद करने की कोशिश कर रहे होंगे.

बसों के जो संवाहक होंगे, वे यात्रियों को जबरन अपनी बस में ठूंसने की कोशिश कर रहे होंगे और यदि आप किसी ग्रामीण वेषभूषा में अकलू या रमुआ जैसे दिख रहे हैं, तो भले ही आपको नवादा जाना हो, वे आपको छपरा जानेवाली बस में बिठा लेंगे. अकसर ऐसा होता है कि दीन-हीन यात्री गिड़गिड़ाता रहता है, लेकिन दो-तीन किमी उसे जबरन बस की यात्रा करा ही दी जाती है. जब किसी तरह चीख-पुकार के बीच वह अपनी मंजिल बता पाता है, तो उसे गालियों का प्रसाद देकर नीचे फेंक दिया जाता है.

पुरुष यात्रियों के लिए तो ‘सबै भूमि गोपाल की’ की तर्ज पर पूरा बस-अड्डा ही टॉयलेट होता है, लेकिन महिला यात्रियों को एक अदद बुनियादी सुविधा के लिए भी तरसना पड़ता है. जब राजधानी पटना में सार्वजनिक परिवहन के सबसे बड़े साधन का यह हाल है, तो बाकी शहरों और कस्बों की हालत आप खुद ही सोच लीजिए.

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