संवाद की जरूरत

Updated at : 30 Oct 2015 12:27 AM (IST)
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संवाद की जरूरत

शुरुआत साहित्यकारों के पुरस्कार लौटाने से हुई और सिलसिला चल निकला. पुरस्कार लौटानेवाले बुद्धिजीवियों की कतार में अब फिल्मकार और वैज्ञानिक भी शामिल हो गये हैं. बुधवार को अपने राष्ट्रीय पुरस्कार वापस करनेवाले 12 फिल्मकारों में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त डाक्यूमेंट्री निर्माता आनंद पटवर्धन और सिनेमा के भीतर नवाचार के लिए विख्यात दिबाकर बनर्जी जैसे नाम […]

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शुरुआत साहित्यकारों के पुरस्कार लौटाने से हुई और सिलसिला चल निकला. पुरस्कार लौटानेवाले बुद्धिजीवियों की कतार में अब फिल्मकार और वैज्ञानिक भी शामिल हो गये हैं. बुधवार को अपने राष्ट्रीय पुरस्कार वापस करनेवाले 12 फिल्मकारों में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त डाक्यूमेंट्री निर्माता आनंद पटवर्धन और सिनेमा के भीतर नवाचार के लिए विख्यात दिबाकर बनर्जी जैसे नाम शामिल हैं. उन्होंने भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआइआइ) के आंदोलनरत छात्रों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए अपने पुरस्कार लौटाये हैं.

हालांकि एफटीआइआइ में नये प्रधान के रूप में गजेंद्र चौहान की नियुक्ति का विरोध कर रहे छात्रों ने अपना आंदोलन वापस ले लिया है, पर इसे सरकार की जीत के रूप में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि छात्रों ने स्पष्ट किया है कि चौहान की नियुक्ति का विरोध जारी रहेगा. फिल्मकारों के पुरस्कार लौटाने से छात्रों के विरोध को बल मिलेगा. साहित्यकार और फिल्मकारों के बाद, मॉल्यिक्यूलर बायोलॉजी के क्षेत्र में अपने काम से प्रतिष्ठा पानेवाले एवं पद्म पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक पुष्प मित्र भार्गव ने भी गुरुवार को घोषणा की कि सार्वजनिक जीवन में फैलती कट्टरता और हठधर्मिता से नाखुश होकर अपना अवार्ड लौटा रहे हैं. देश-दुनिया में गुणवंत और कलावंत के सम्मान की परिपाटी रही है.

सरकार की कोशिश रहती है कि उसके काम बुद्धिजीवियों और कला-साधकों के बीच भी सराहे जायें, क्योंकि लोक-प्रतिष्ठा सिर्फ राजनेताओं को नहीं, बुद्धिजीवियों व कलाकारों को भी प्राप्त होती है. समाज बुद्धिजीवियों को भी लोक-मर्यादा का रक्षक मानता रहा है. लेकिन, एक तरफ पुरस्कार वापसी का सिलसिला आगे बढ़ रहा है, दूसरी तरफ सरकार ऐसे संकेत नहीं दे रही है जिससे लगे कि उसे बुद्धिजीवियों के मन में चल रहे प्रश्नों की कोई चिंता है. साहित्य अकादमी ने बहुत देर से साहित्यकारों की मांग के पक्ष में एक वक्तव्य जारी किया. एफटीआइआइ के छात्रों का आंदोलन सौ दिन से ज्यादा चला, पर सरकार ने खास सुध नहीं ली.

वैज्ञानिक रोजमर्रा के जीवन में विज्ञान-चेतना की कमी की बात करते रहे हैं. ऐसी सुर्खियों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की प्रतिष्ठा और छवि को निश्चित ही नुकसान पहुंचेगा. अच्छा होगा कि सरकार पुरस्कार वापसी के भीतर से झांकते संकेतों को समझ कर, बुद्धिजीवियों के बीच सतत और सघन संवाद के कार्यक्रम चलाये, ताकि कलावंतों-गुणवंतों का शासन पर भरोसा बहाल हो सके.

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