सदाबहार दोस्त रूस से अपेक्षाएं

Published at :21 Oct 2013 4:26 AM (IST)
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सदाबहार दोस्त रूस से अपेक्षाएं

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी पांच दिवसीय रूस-चीन यात्रा के पहले चरण में रूस पहुंच गये हैं. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में संबंधों का मुख्य आधार आपसी हितों का संतुलन होता है. शीत युद्ध के दिनों में गुटनिरपेक्षता की नीति के बावजूद भारत की सोवियत ब्लॉक से स्पष्ट नजदीकी रही. इसका कारण समाजवाद की ओर भारत का झुकाव […]

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी पांच दिवसीय रूस-चीन यात्रा के पहले चरण में रूस पहुंच गये हैं. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में संबंधों का मुख्य आधार आपसी हितों का संतुलन होता है. शीत युद्ध के दिनों में गुटनिरपेक्षता की नीति के बावजूद भारत की सोवियत ब्लॉक से स्पष्ट नजदीकी रही. इसका कारण समाजवाद की ओर भारत का झुकाव था.

इस दौर में भारत और रूस का रिश्ता एक नवजात विकासशील देश और एक महाशक्ति के बीच के रिश्ते जैसा था. यहां संतुलन नहीं था. लेकिन, सोवियत रूस के विघटन के साथ शीत युद्ध की समाप्ति और उसके बाद के वर्षो में वैश्विक आर्थिक ताकत के तौर पर भारत के उभार के कारण इस रिश्ते की प्रकृति बदल गयी है. भारत और रूस अब बराबर के भागीदार के तौर पर उभरे हैं. ब्रह्मोस, पांचवी पीढ़ी के फाइटर एयरक्राफ्ट और परिवहन एयरक्राफ्ट के निर्माण में दोनों देशों की भागीदारी इसकी मिसाल है. भारत और रूस आपसी मित्रता को कितना तवज्जो देते हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रूस एकमात्र ऐसा देश है, जिसके साथ भारत की वार्षिक शिखर स्तरीय बैठक होती है.

वर्ष 2000 से शुरू हुआ यह सिलसिला आज तक जारी है और मनमोहन सिंह दसवीं बार शिखर बैठक में भाग लेने के लिए रूस में हैं. इस बैठक में व्यापार-वाणिज्य और आर्थिक सहयोग के कई मसलों पर प्रगति होने की उम्मीद जतायी जा रही है. हालांकि, दोनों देशों का आपसी व्यापार अभी भी 10 अरब डॉलर के आसपास ही है, जो संभावनाओं से काफी कम है. भारत की इच्छा रूस, कजाखस्तान और बेलारूस कस्टम यूनियन के साथ व्यापार समझौता करने की है. इसके साथ ही रूस के तेल और गैस पर भी भारत की नजर है.

दोनों देश रूस से अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते भारत तक जैविक ईंधन लाने के लिए पाइपलाइन बिछाने की संभावना का पता लगा रहे हैं. लेकिन, बदले में भारत को भी रूस की चिंताओं का ध्यान रखना होगा. इनमें परमाणु नागरिक जवाबदेही कानून सबसे ऊपर है. मनमोहन सिंह को कूटनीतिक स्तर पर लेन-देन के तराजू का संतुलन साधना होगा, क्योंकि दोनों देशों के रिश्ते में हाल के वर्षो में हल्की तल्खी के दौर भी आये हैं. दो सदाबहार दोस्तों को हमेशा इससे बचना चाहिए.

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