सपनों के उत्पादन का धंधा

Published at :20 Oct 2013 3:28 AM (IST)
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सपनों के उत्पादन का धंधा

।।एमजे अकबर।।(वरिष्ठ पत्रकार) भारतीय लोकप्रिय साहित्य में भूत-कथाओं को तवज्जो क्यों नहीं दी जाती? इसका सीधा-सा कारण है कि भारत में अखबारों के बीच काफी मारा-मारी है. ‘बेबुनियाद और असंभव’ की कल्पना के मामले में कौन सा लेखक दिन की खबरों से मुकाबला कर सकता है? भारत में, जहां खुद को भगवान घोषित करनेवाले बदमाशों […]

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।।एमजे अकबर।।
(वरिष्ठ पत्रकार)

भारतीय लोकप्रिय साहित्य में भूत-कथाओं को तवज्जो क्यों नहीं दी जाती? इसका सीधा-सा कारण है कि भारत में अखबारों के बीच काफी मारा-मारी है. ‘बेबुनियाद और असंभव’ की कल्पना के मामले में कौन सा लेखक दिन की खबरों से मुकाबला कर सकता है? भारत में, जहां खुद को भगवान घोषित करनेवाले बदमाशों की कमी नहीं है, क्या हमें भूत-कथाएं लिखनेवाले बाम स्टोकर या ड्रैक्यूला के किस्सों की कोई जरूरत है! ऐसे ठगों के अनुयाइयों की संख्या लाखों में है. भारतीय कितने मूर्ख हो सकते हैं!

सामने जो नजारा है, वह सचमुच मूर्खतापूर्ण है. आपने भीड़ के पागलपन की अनेक कहानियां सुनी होंगी, लेकिन उत्तर प्रदेश के डौडियाखेड़ा में हजारों टन सोने की खोज से किसी का कोई मुकाबला नहीं. एक स्वामी शोभन सरकार नामक साधु ने यह सपना देखा कि राजा रामबख्श ने करीब 150 साल पहले यह खजाना जमीन में गाड़ दिया था. इस राजा के बारे में पहले नहीं सुना गया था. फिलहाल, किस्सा यह सुनाया जा रहा है कि इस राजा ने 1857 से पहले एक विशाल खजाना जमीन के भीतर दबा दिया, ताकि अंगरेज भारतीय सोने पर अधिकार न जमा सकें. इस तमाशे के लिए जनता को दोष देना सही नहीं है. संस्कृति मंत्रलय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में बैठे बुद्धिमान व्यक्तियों के मुंह में भी पानी आ रहा है. सुनने में आ रहा है कि हमारे आधुनिक, कंप्यूटर-मित्र मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पूज्य साधु के पास अपना दूत यह पूछने के लिए भेजा है कि क्या ईश्वर का आदमी, जनता के आदमी को इस सोने का इस्तेमाल राज्य की भलाई के लिए करने की इजाजत देगा? यह तय है कि अगर खजाना कभी मिलेगा भी, तो इसका इस्तेमाल नेताओं की भलाई के लिए ही होगा, न कि जरूरतमंद जनता के लिए. खैर, यह अलग कहानी है. व्यक्तिगत तौर पर मुङो आशा है कि सोना मिलेगा. यह अलग बात है कि शायद मुङो इस सोने को सूंघने तक की इजाजत न मिले! वैसे इससे अखिलेश यादव को उपहार के तौर पर लैपटॉप बांटने के लिए पैसा मिल जायेगा. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए यह अच्छी खबर है. लेकिन, मेरे दिमाग में मूर्खतापूर्ण सवाल चक्कर काट रहे हैं. वे किसी फलने-फूलने वाली जगह पर जाने के लिए तैयार नहीं हैं.

भारत सरकार में बैठे लोगों की दलील है कि वे खुदाई इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास खजाना होने के वैज्ञानिक सबूत हैं. यह दिलचस्प है. यह धरती माता के गर्भ में मिलनेवाला सोना नहीं है. यह मिट्टी या लोहे के मर्तबानों में रखा सोना है. मर्तबानों के बारे में वैज्ञानिक प्रमाण कैसे मिलता है? क्या किसी लेजर बीम ने जमीन के भीतर की चमक देख ली है और निष्कर्ष निकाला है कि जो चमकता है, वह सोना ही होता है? मेरी सीमित जानकारी बताती है कि सोने पर फफूंद नहीं लगती. वह सड़ता नहीं है. इसलिए सूंघ कर सोने के अस्तित्व के बारे में पता नहीं लगाया जा सका होगा. या यह माना जाये कि दिल्ली में बैठे कुछ बाबू त्योहारों की छुट्टी के दौरान ‘ट्रेजर आइलैंड’ पढ़ रहे थे? पागलपन सबसे पहले कॉमन सेंस को अपना शिकार बनाता है. राजा रामबख्श कितने धनवान रहे होंगे? वे अवध के नवाब नहीं थे. वे मराठा पेशवा भी नहीं थे.

बनारस के राजा या झांसी की रानी भी नहीं थे. ऐसा होता, तो स्कूल की किताबों में हमने उनके बारे में पढ़ा होता. हां, उनका अस्तित्व था. लेकिन वे बड़े राजाओं-नवाबों की कतार में नहीं थे. उनके पास हजारों टन सोना कहां से आया? ईस्ट इंडिया कंपनी भी इतना सोना होने का दावा नहीं कर सकती थी. मुगलों के पास इतना सोना हो सकता था, लेकिन 1739 में नादिरशाह ने उनके खजाने को लूट लिया. जब खुदाई, कुदाल से की जाती थी, तब कोई इतना सोना जमीन में कैसे गाड़ सकता था? शायद बड़ी संख्या में मजदूरों को काम पर लगा कर. इस खुदाई में लगे मजदूरों को ईमानदारी का सर्टिफिकेट मिलना चाहिए, जिन्होंने दो सौ वर्षो से यह राज छिपा कर रखा है. भारत राज छिपा कर रखने के लिए नहीं, राज उजागर करने के लिए जाना जाता है. यह किसी चमत्कार से कम नहीं है कि कोई भी 1867 या 1877 या 1887 में भी खजाने की जगह पर नहीं गया. किसी ने इसके बारे में अंगरेजों को भी नहीं बताया! भारत में अंधविश्वास और तर्क के बीच की लड़ाई में हमेशा अंधविश्वास की जीत होती है. एक बाबा को सपना आता है और कोई ‘स्वप्नदोष’ के रहस्य के बारे में पूछने की हिम्मत नहीं करता. अगर सिगमंड फ्रायड ने कभी भारत का का दौरा किया होता, तो न तो मनोविश्लेषण का कोई अस्तित्व बचता, न ही स्वप्नों की व्याख्या के शास्त्र का ही कोई नामोनिशान होता.

क्या भारत ऐसी धरती है, जहां सपने सच साबित होते हैं? गरीबी से लेकर सड़क के गड्ढों तक को देखा जाये, तो जवाब साफ ‘नहीं’ होगा. अगर सपनों के उत्पादन को सकल घरेलू उत्पाद में जोड़ा जाता, तो हम सम्मिलित एशिया से भी ज्यादा धनवान होते. आप किसी भ्रम में नहीं रहिए. जो इस सपने के उत्पादन की कड़ी में जुड़े हुए हैं, वे अच्छा मुनाफा कमाते हैं. सिर्फ मूर्ख ही ऐसे सपनों में निवेश करते हैं, जिसके बदले में कुछ नहीं मिलता.

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