स्मारकों की सार्थकता पर सवाल

Published at :26 Sep 2015 2:28 AM (IST)
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स्मारकों की सार्थकता पर सवाल

विवेक शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली में नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय के कामकाज पर विवाद के बाद इसके निदेशक डॉ महेश रंगाराजन ने पिछले दिनों इस्तीफा दे दिया. लेकिन, इस संदर्भ में एक बड़ा सवाल यह भी है कि नेताओं के नाम पर बने ऐसे स्मारकों, जहां रोज गिनती के लोग पहुंचते हैं, से देश […]

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विवेक शुक्ला
वरिष्ठ पत्रकार
दिल्ली में नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय के कामकाज पर विवाद के बाद इसके निदेशक डॉ महेश रंगाराजन ने पिछले दिनों इस्तीफा दे दिया. लेकिन, इस संदर्भ में एक बड़ा सवाल यह भी है कि नेताओं के नाम पर बने ऐसे स्मारकों, जहां रोज गिनती के लोग पहुंचते हैं, से देश को कितना लाभ हो रहा है? स्मारक बनाने के तय नियम न होने के चलते ज्यादातर मामलों में नेताजी ने राजधानी के जिन महंगे बंगलों में अपने जीवन के अंतिम दिन गुजारे, उन्हें ही उनके स्मारक में तब्दील कर गया है.
नेहरूजी देश के महान नेता थे, पर उनके स्मारक और वहां बनी समृद्ध लाइब्रेरी का इस्तेमाल एक खास तबके तक सीमित रहा. नेहरू प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस तीन मूर्ति भवन में रहते थे, वह अंगरेजों के राज में भारत के कमांडर इन चीफ का आवास था.
नेहरूजी के निधन के बाद उसे उनके स्मारक में तब्दील कर दिया गया. हालांकि नेहरूजी के बाद यह भवन लाल बहादुर शास्त्री को आवंटित हुआ था, पर उन्होंने वहां जाने से मना कर दिया था. बहुत से बुद्धिजीवी बताते हैं कि यह भवन पीएम हाउस के लिए सबसे उपयुक्त रहता, क्योंकि राजधानी के बीचों-बीच होने के अलावा संसद भवन और केंद्रीय सचिवालय के भी करीब है.
विशाल क्षेत्र में फैला होने के कारण यहां पीएम हाउस में काम करनेवाले अधिकतर मुलाजिमों के रहने की भी व्यवस्था की जा सकती थी.
शास्त्री जी प्रधानमंत्री के रूप में 10-जनपथ बंगले में रहे. तब वे दो बंगले, जिनमें आजकल सोनिया गांधी और रामविलास पासवान रहते हैं, भी 10-जनपथ का ही हिस्सा थे. शास्त्रीजी के निधन के बाद बंगला उनकी पत्नी को दे दिया गया. वह 1993 यानी अपनी मृत्यु तक उसमें रहीं. उसके बाद उसे शास्त्रीजी का स्मारक बना दिया गया. अभी इसमें रोज कुछेक लोग ही आते हैं.
स्मारक चलानेवाले ट्रस्ट की हालत भी पतली बतायी जाती है. यूपीए-2 सरकार ने ऐसे स्मारकों के लिए धन देना बंद करने का फैसला किया था. उसके बाद मोदी सरकार ने फैसला किया है कि सरकार सिर्फ महात्मा गांधी की जयंती एवं पुण्य तिथि से खुद को जोड़ेगी, अन्य दिवंगत नेताओं की जयंती एवं पुण्य-तिथि संबंधित ट्रस्ट, पार्टी, सोसाइटी या समर्थक अपने स्तर पर फंड जुटा कर मनाएंगे.
इंदिरा गांधी के 1-सफदरजंग रोड में बने स्मारक में भी रोज कुछ ही लोग पहुंचते हैं. भीमराव आंबेडकर ने पंडित नेहरू की कैबिनेट से 31 अक्तूबर,1951 को इस्तीफा दे दिया था और उसके अगले ही दिन वे 26-अलीपुर रोड बंगले इस बंगले में आ गये थे. अपनी जिंदगी के अंतिम पांच बरस बाबा साहब ने यहीं अपनी पत्नी सविताजी के साथ गुजारे थे. उन्हें सांकेतिक रेंट पर इस बंगले में रहने का आग्रह किया था राजस्थान के सिरोही के राजा ने.
बाबा साहब ने यहीं रहते हुए ‘बुद्धा एंड हिज धम्मा’ नाम से कालजयी पुस्तक लिखी. बाबा साहब की मृत्यु के बाद सविताजी करीब तीन सालों तक इसी बंगले में रहीं. उसके बाद सिरोही के राजा ने बंगले को मदनलाल जैन नाम के व्यापारी को बेच दिया. जैन ने इसे स्टील व्यवसायी जिंदल परिवार को बेच दिया. फिर जिंदल परिवार इसमें रहने लगा. उसने बंगले में कुछ बदलाव भी किये.
सन् 2000 के आसपास अंबेडकरवादी मांग करने लगे कि 26-अलीपुर रोड बंगले को बाबा साहब के स्थायी स्मारक के रूप में विकसित किया जाये. मांग जोर पकड़ने पर वाजपेयी सरकार ने जिंदल परिवार से बंगला ले लिया और उसे उसके बराबर जमीन उसी क्षेत्र में दी. तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने 2 दिसंबर, 2003 को इस बंगले को बाबा साहब के स्मारक के रूप में देश को समर्पित किया. यहां बाबा साहब की एक प्रतिमा लगी है. उनके बहुत से चित्र और एक पुस्तकालय भी है. लेकिन, इन्हें देखने आनेवालों का टोटा ही रहता है.
अच्छी बात यह है कि मोदी सरकार ने नये स्मारकों के निर्माण पर विराम लगा दिया है. इसमें दो राय नहीं कि देश की महान विभूतियों से जुड़ी यादों को इस तरह से सहेज कर रखा जाये कि देश-समाज के लिये किये गये उनके कार्यों की जानकारी आनेवाली पीढ़ियों को मिलती रहे.
लेकिन जरूरी यह भी है कि स्मारक का निर्माण मनमाने तरीके से न हो, इसके लिए सर्वसम्मति से कुछ नियम तय किये जाएं. साथ ही स्मारकों में नियमित रूप से कुछ ऐसे कार्यक्रम भी आयोजित किये जाएं, जो लोगों को वहां आने के लिए प्रेरित करे. स्मारकों की सार्थकता तभी बनी रहेगी.
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