हमारी संवेदना का अकाल

Published at :25 Sep 2015 5:25 AM (IST)
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हमारी संवेदना का अकाल

प्रो योगेंद्र यादव जय किसान आंदोलन से जुड़े हैं अकेले नहीं आता अकाल. पानी, प्रकृति और समाज के देशज चिंतक अनुपम मिश्र के लेख का यह शीर्षक अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है. कुदरत सूखा देती है, अकाल नहीं. हर चौथे-पांचवें साल हमारे देश में बारिश की कमी होती है. लेकिन जरूरी नहीं […]

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प्रो योगेंद्र यादव
जय किसान आंदोलन से जुड़े हैं
अकेले नहीं आता अकाल. पानी, प्रकृति और समाज के देशज चिंतक अनुपम मिश्र के लेख का यह शीर्षक अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है. कुदरत सूखा देती है, अकाल नहीं. हर चौथे-पांचवें साल हमारे देश में बारिश की कमी होती है.
लेकिन जरूरी नहीं कि इससे अन्न की कमी हो, पीने के पानी का संकट हो, इंसानों और मवेशियों की जान पर बन आये, खेती-किसानी से जुड़े हर वर्ग में हाहाकार मच जाये. यह तभी होता है, अगर समाज और सरकार सूखे के लिए तैयार न हो. अकाल से पहले आता है विचारों का अकाल, स्मृति का अकाल, भावनाओं का अकाल. इसलिए अनुपम मिश्र कहते हैं- अकेले नहीं आता अकाल. आज इस बात को दोबारा याद करने के जरूरत है.
आज हमारा देश एक भयानक सूखे के दौर से गुजर रहा है. सरकारी हिसाब से सूखा तब कहलाता है, जब मानसून की बारिश औसत से 10 फीसदी या और भी कम रहे और इसका असर देश के 20 फीसदी या ज्यादा इलाके पर पड़े. पिछले हफ्ते हुई बारिश के बावजूद, अब तक इस मानसून में औसत से 14 फीसदी कम पानी पड़ा है. देश की 38 फीसदी जमीन बारिश की भारी या भयंकर कमी का शिकार है. अब माॅनसून जानेवाला है और इस आंकड़े में ज्यादा बदलाव की गुंजाइश नहीं बची है. यानी सूखा आ चुका है, बस सरकार द्वारा घोषणा किये जाने का इंतजार है.
यह साधारण सूखा नहीं है. लगातार दूसरे साल सूखा पड़ रहा है. पिछले सौ साल में सिर्फ तीसरी बार ऐसा हो रहा है कि लगातार दो साल देशभर में सूखा पड़ा हो. कुल 641 में से 287 जिलों पर सूखे की मार है.
कोई सौ जिले ऐसे हैं, जो पिछले छह साल से लगातार बारिश की कमी का शिकार हैं. ज्यादातर इलाकों में फसल बुवाई के समय तो बारिश हो गयी, और उससे उत्साहित किसान ने फसल में खर्च भी कर दिया. लेकिन, पौधा निकलते-निकलते बारिश बंद हो गयी, फसल सूख गयी. किसान को दोगुना नुकसान हो गया.
सूखे की सबसे बुरी मार उन इलाकों पर पड़ रही है, जहां औसत बारिश कम होती है और जो सिंचाई के लिए बारिश पर निर्भर हैं. यूं तो केरल, कोंकण, नागालैंड और मिजोरम में भी औसत से कम बारिश हुई है, लेकिन इन इलाकों पर कुदरत की मेहरबानी है, औसत से कम बारिश भी बहुत है. कमी पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी है. लेकिन, वहां सिंचाई के दूसरे साधन उपलब्ध हैं. इसलिए सूखे का एकदम संकट नहीं आयेगा.
असली संकट उस सूखी पट्टी में है, जो उत्तर कर्नाटक से शुरू होकर तेलंगाना, मराठवाड़ा, मध्य महाराष्ट्र, पूर्वी मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश होते हुए एक तरफ उत्तरी बिहार और दूसरी तरफ पूर्वी राजस्थान और दक्षिणी हरियाणा की ओर जाती है. संकट का एक केंद्र मराठवाड़ा है. पिछले दस दिनों में हालत कुछ सुधरे हैं, नहीं तो पीने के पानी और मवेशियों के चारे के संकट से हाहाकार मच रहा था. अभी भी संकट टला नहीं है, भूजल का स्तर गिर गया है, एक फसल मर चुकी है.
संकट का दूसरा केंद्र उत्तर प्रदेश है, जिसके बारे में कोई चर्चा ही नहीं है. इस वक्त देश के 29 जिले भयंकर सूखे का शिकार हैं, यानी जहां औसत से 60 फीसदी या और भी कम बारिश हुई है. इनमें से 16 जिले उत्तर प्रदेश में हैं.
ये जिले बुंदेलखंड, उससे जुड़ी दोआब क्षेत्र में कौशांबी से आगरा तक की पट्टी और प्रदेश में पूर्वोत्तर में स्थित है. पिछले कुछ सप्ताह में स्थिति बद से बदतर होती गयी है. किसान बारिश की कमी को बोरवेल से पूरी करना चाहता है, लेकिन इसके लिए बिजली ही नहीं मिलती.
देश सूखे की आपदा से गुजर रहा है, लेकिन सरकार और शहरी समाज बेखबर है. खरीफ की फसल को बहुत नुकसान हुआ है, लेकिन सरकार निश्चिंत है कि उसके पास खाद्यान्न के भंडार पड़े हैं. सरकार को उत्पादन से मतलब है, उत्पादक से नहीं. अब तक केंद्र सरकार ने एक औपचारिक घोषणा की है कि सूखाग्रस्त जिलों में मनरेगा के तहत रोजगार के दिन 100 से बढ़ा कर 150 कर दिये जायेंगे.
न पीने के पानी की विशेष व्यवस्था हो रही है, न पशुओं के दाना-पानी की और न ही फसल के नुकसान के मुआवजे की तैयारी दिख रही है. सरकार मानसून की औपचारिक समाप्ति का इंतजार करेगी, फिर मंत्रालय से पटवारी तक सूखे की जानकारी मांगी जायेगी, फिर पटवारी से मंत्रालय तक फाइल वही सूचना भेजेगी, जो सबको पता है, फिर राज्य सरकारें केंद्र के पास गुहार लगायेंगी, फिर फाइलें रेंगती रहेंगी, अकाल फैलता रहेगा.
मीडिया भी बेपरवाह लगता है. मराठवाड़ा के बारे में कुछ खबरें तो आयी हैं, बाकी ज्यादा कुछ नहीं. वह तो भला हो नाना पाटेकर का, नहीं तो उतनी खबर भी नहीं आती. शीना की हत्या राष्ट्रीय त्रासदी है, दिल्ली का डेंगू राष्ट्रीय आपदा है, लेकिन 50 करोड़ लोगों के जीवन में संकट पैदा करनेवाला सूखा राष्ट्रीय खबर नहीं है.
शहरों में रहनेवाले, टीवी देखनेवाले ‘जागरूक नागरिक’ को पता भी नहीं है कि देश इतने बड़े संकट से गुजर रहा है. गांवों में अपने इलाके के सूखे की खबर तो है, लेकिन राष्ट्रव्यापी संकट का एहसास नहीं है. जब तक सूखा टीवी पर नहीं दिखेगा, तब तक सरकार और प्रशासन को कोई चिंता नहीं होगी. सड़क पर पड़ा कोई व्यक्ति मर रहा है, और हम सब उसे अनदेखा कर अपनी-अपनी कार के शीशे चढ़ाये चले जा रहे हैं.
यही वह अकाल है, जिसकी ओर अनुपम मिश्र इशारा कर रहे हैं. सूखा कुदरत ने दिया है, लेकिन संवेदना का अकाल हमारा अपना पैदा किया हुआ है. अनुपम जी पिछले तीन दशक से पानी के सवाल पर विचारों के अकाल पर भी हमारा ध्यान खींचते रहे हैं. उन्होंने बताया है कि आधुनिक विकास और सिंचाई के नाम पर हमने जल संचय के उन तमाम साधनों और विधियों का नाश कर दिया है, जिससे हमारा देश सदियों से सूखे का सामना करता था.
इस बार का भयानक सूखा हमारे लिए एक अवसर भी हो सकता है. अवसर है यह साबित करने का कि खेत भले ही सूखे हों, हमारे दिल और दिमाग अभी नहीं सूखे, हमारी आंखों में अब भी पानी है. इस सूखे को अकाल नहीं बनने देंगे हम. इस आपदा में किसान अकेला नहीं पड़ेगा. इस सूखे को अकाल नहीं सुकाल में बदल सकते हैं हम.
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