सब्जी वाली के माथे की बिंदी

Published at :25 Sep 2015 5:21 AM (IST)
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सब्जी वाली के माथे की बिंदी

क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार अभी काफी अंधेरा था. मैं टहल रही थी. गेट के पास सब्जी वाली अपने ठेले को लगा रही थी. सब्जियों को ताजा करने के लिए उन पर पानी छिड़क रही थी. मैंने कहा-इतनी जल्दी आ जाती हो. उसने जवाब दिया- क्या करूं दीदी मंडी जाना पड़ता है. मैंने पूछा- तुम्हारे आदमी […]

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क्षमा शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

अभी काफी अंधेरा था. मैं टहल रही थी. गेट के पास सब्जी वाली अपने ठेले को लगा रही थी. सब्जियों को ताजा करने के लिए उन पर पानी छिड़क रही थी. मैंने कहा-इतनी जल्दी आ जाती हो. उसने जवाब दिया- क्या करूं दीदी मंडी जाना पड़ता है. मैंने पूछा- तुम्हारे आदमी को क्या हुआ था. मुझे पता चला कि वह नहीं रहे. उसने कहा- बीमार थे. फिर अपने माथे पर हाथ मार कर बोली- जब यहां लिखा हो न दीदी, तो कोई क्या कर सकता है.

कुछ दिन पहले इसके पति की मौत हो गयी थी. मेरी काम वाली लक्ष्मी ने बताया था कि उसने आत्महत्या की थी. तब से हर रोज आते-जाते उसके उदास चेहरे से वास्ता पड़ता था. एक दोपहर जब मैं सब्जी लेने के लिए रुकी, तो मैंने देखा कि उसके माथे पर लाल बिंदी चमक रही है. बहुत अच्छा किया जो तुमने बिंदी लगायी. ठीक है कि आदमी के जाने का दुख है, मगर इससे तुम्हारी जिंदगी तो खत्म नहीं हो जाती. मैंने कहा तो वह हलके से मुसकुरायी.

कहने लगी कि आप जैसी ही एक दीदी ने बिंदी का पत्ता लाकर दिया था. जो आप कह रही हैं, वही कहा था. मैंने कहा, मैं भी तुम्हें बिंदी लाकर दूंगी.

एक विधवा औरत के लिए आज भी बिंदी लगाना जैसे चांद को छूना है. एक विधवा बिंदी को कितनी हसरत भरी नजर से देखती है, इसका वर्णन महान कथाकार जयशंकर प्रसाद ने अपने उपन्यास तितली में बहुत मार्मिक ढंग से किया है- कई औरतें शादी में जा रही हैं.

वे खूब सज-संवर रही हैं. एक विधवा औरत उन्हें देखती है, तो दरवाजा बंद करके कत्थे से बिंदी बना कर माथे पर लगाती है. शीशे में अपनी सूरत देखती है. फिर कोई देख न ले, इस डर से जल्दी से बिंदी पोंछ कर, फूट-फूट कर रोती है. इसी तरह महादेवी वर्मा ने भाभी संस्मरण में एक उन्नीस साल की विधवा का चित्रण किया है, जो एक बच्ची की रंग-बिरंगी चुन्नी ओढ़ कर खिलखिलाती है.

और इस अपराध में, अंदर से ननद निकल कर उसे तब तक पीटती है, जब तक कि वह बेहोश होकर गिर नहीं जाती. हमारे समाज में विधवाओं के प्रति क्रूरता के ऐसे न जाने कितने प्रसंग हैं. लेकिन समय और विचार बदल भी रहे हैं. विधवा होने का मतलब जिंदगी का परित्याग नहीं है, यह समझ कम-से-कम शहरों में बढ़ रही है.

दिल्ली में अधिकांश काम-काजी मध्यवर्ग की लड़कियों, औरतों ने विवाह के प्रतीक चिह्न के रूप में पहले सिंदूर की विदाई की और अब बिंदी भी कहीं दिखाई नहीं देती. लेकिन सब्जी बेचनेवाली जैसी गरीब औरतों के लिए बिंदी का वही अर्थ नहीं है, जो लाखों कमानेवाली स्त्रियों के लिए है. माथे पर बिंदी न रहने का मतलब किसी गरीब औरत के लिए इस संसार में अकेली और असहाय होना है.

किसी पुरुष के साथ के बिना आज भी यह औरत बेचारी और असुरक्षित है. तरह-तरह के अपराध झेलने को मजबूर है. आज भी गरीब औरत का असमय विधवा होना, बिना किसी सहारे के अकेले अपने दम पर बच्चों को पालना एक भारी मुसीबत की तरह है.

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