समय से आगे सोचते थे जग्गू दा

Published at :23 Sep 2015 5:56 AM (IST)
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समय से आगे सोचते थे जग्गू दा

अभिषेक दूबे खेल पत्रकार जग्गू दादा नहीं रहे, भारतीय क्रिकेट में एक युग का अंत हो गया. ‘कैसे याद करें इस शख्स को, क्या-क्या बताएं, बस इतना ही बता सकता हूं कि भारतीय क्रिकेट और भारतीय उपमहाद्वीप के सिफर से शिखर तक के सफर के वो सबसे अनमोल राहगीर रहे.’ जगमोहन डालमिया के निधन पर […]

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अभिषेक दूबे
खेल पत्रकार
जग्गू दादा नहीं रहे, भारतीय क्रिकेट में एक युग का अंत हो गया. ‘कैसे याद करें इस शख्स को, क्या-क्या बताएं, बस इतना ही बता सकता हूं कि भारतीय क्रिकेट और भारतीय उपमहाद्वीप के सिफर से शिखर तक के सफर के वो सबसे अनमोल राहगीर रहे.’ जगमोहन डालमिया के निधन पर जब मैंने पाकिस्तान में कूटनीति और क्रिकेट से जुड़े शहरयार खान से बात की, तो जैसे ये वाक्य बरबस निकल पड़े.
कोलकाता के इस क्रिकेट के शौकीन कारोबारी की उपलब्धियों की फेहरिस्त तो लंबी है, लेकिन तीन ऐसी बातें हैं, जिनसे क्रिकेट और खेल जगत उन्हें भूल नहीं सकता. पहला, वह उस दौर के करीबी हिस्सेदार रहे, जब 1983 में वर्ल्ड कप जीत के बाद आहिस्ते-आहिस्ते विश्व क्रिकेट की चाबी लंडन में लॉर्ड्स से कोलकाता में ईडन गार्डेन आयी.
दूसरा, पाकिस्तान और श्रीलंका के साथ मिल कर, उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट को अपरिहार्य बना दिया. तीसरा, प्रसारण विवाद को लेकर उन्होंने प्रसार भारती के खिलाफ एक निर्णायक मुकदमे को जीतने में महती भूमिका निभायी, जो भारत में क्रिकेट और दूसरे खेलों में आर्थिक नजरिये से मील का पत्थर साबित हुई. हॉकी, कुश्ती से लेकर शूटिंग तक के भारतीय दिग्गजों ने कई बार हमसे कहा कि हमें अपने खेल संघ में एक जगमोहन डालमिया दे दो, हम अपने खेलों की सीरत और सूरत दोनों ही बदल देंगे.
डालमिया क्रिकेट में एक दौर की पहचान रहे, जिन्होंने सिफर से शिखर, शिखर से सिफर और फिर सिफर से शिखर के रास्ते को जीया. भारतीय क्रिकेट में डालमिया दौर के बाद आइपीएल का तूफान आया. शरद पवार गुट ने डालमिया के रुतबे को तोड़ दिया और वे हाशिये पर चले गये.
इसके बावजूद उनमें भारतीय क्रिकेट को लेकर तल्खी कभी नहीं दिखी. मुझे आज भी बीसीसीआइ का वह एजीएम याद है, जब वो अलग-थलग हो गये थे. डालमिया से जब इस बारे में मुंबई के क्रिकेट सेंटर में हम बात करने गये तो उन्होंने दो टूक कहा- ‘मैंने क्रिकेट में अपना जीवन जी लिया है और दिल से चाहता हूं कि जो भी आज बीसीसीआइ को चला रहे हैं, वे अच्छा काम करें.’
आइपीएल के साथ भारतीय क्रिकेट में लैपटॉप और प्रेजेंटेशन का दौर आया. जब इस बारे में हमने एक बार उनसे सीधा सवाल किया था, तो वे मुस्कुरा कर बोले- ‘जितने प्रेजेंटेशन और आंकड़े आज इनके लैपटॉप में रहते हैं, वे किसी जमाने में हमारे ब्रीफकेस और दिमाग में रहते थे. भारतीय क्रिकेट को चाहे लैपटॉप से चलाओ या फिर ब्रीफकेस से, लक्ष्य हमेशा क्रिकेट की भलाई की होनी चाहिए.’
उनकी सख्सियत का एक और अहम पहलू था- उन्हें भारत, भारतीय तरीके और यहां के लोगों पर जबरदस्त भरोसा था.
एक दौर ऐसा आया जब विदेशी कोच को सभी समस्याओं का हल माना जाता था, जॉन राइट से लेकर डंकन फ्लेचर तक ने भारतीय क्रिकेट को पेशेवर भी बनाया, लेकिन जग्गू दा हमेशा कहते रहे कि हम ऐसा क्यों नहीं सोचते कि हमारे दिग्गज खिलाड़ी और कोच दुनियाभर में जाकर कोचिंग दें.
उन्होंने कपिलदेव से लेकर गावस्कर तक को इस दिशा में समर्थन दिया. जब दूसरी पारी में उन्हें भारतीय क्रिकेट का मुखिया बनने का मौका मिला, तो उन्होंने सचिन-सौरव-लक्ष्मण को सलाहकार समिति का हिस्सा बनाया, द्रविड़ को इंडिया ए टीम का कोच बनाया और नेशनल टीम के साथ भारतीय खिलाड़ियों को कोच के तौर पर बरकरार रखा.
संभव है कि जगमोहन डालमिया के सभी फैसले सही नहीं होंगे और उनकी सोच पर भी सवाल उठ सकते हैं, आलोचक ये भी कहते रहे कि उनके फैसले उनके दौर के लिए तो सही थे, लेकिन अब आगे देखने की जरूरत है, लेकिन अपनी जिंदगी के आखिरी सफर में भी जब भारतीय क्रिकेट कभी भी मुसीबत में होता, तो सभी उम्मीद जाकर डालमिया के दरवाजे पर रुक जाती. कोई आश्चर्य नहीं कि उनके विरोधी रहे शरद पवार को भी इसका बखूबी अंदाजा हो गया था.
यह डालमिया का सम्मान ही था कि जब मैच फिक्सिंग विवाद के बाद कोई खेमा किसी को मानने के लिए तैयार नहीं था, वह स्वाभाविक दावेदार बन कर सामने आये. कोलकाता में उनकी आखिरी विदाई के वक्त भारतीय क्रिकेट का हर खेमा साथ दिखा.लेकिन हर किसी को इस बात का अंदाजा है कि आगे ऐसी मुसीबत के वक्त भारतीय क्रिकेट का वटवृक्ष उनके साथ नहीं रहेगा.
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