‘लुक इस्ट’ नीति का दूसरा चरण

पश्चिमी देशों के आर्थिक-राजनीतिक प्रभुत्व से खुद को एक हद तक मुक्त रखना है तो एशिया के दक्षिण-पूर्वी देशों का अपना सहयोग संगठन होना चाहिए. इसी विचार के साथ 1961 में फिलीपींस, मलयेशिया और थाईलैंड ने एसोसिएशन ऑफ साऊथ इस्ट एशिया नाम से एक मंच बनाया था. 1967 में इसका विस्तार आसियान नाम से हुआ. […]
पश्चिमी देशों के आर्थिक-राजनीतिक प्रभुत्व से खुद को एक हद तक मुक्त रखना है तो एशिया के दक्षिण-पूर्वी देशों का अपना सहयोग संगठन होना चाहिए. इसी विचार के साथ 1961 में फिलीपींस, मलयेशिया और थाईलैंड ने एसोसिएशन ऑफ साऊथ इस्ट एशिया नाम से एक मंच बनाया था.
1967 में इसका विस्तार आसियान नाम से हुआ. उस वक्त इसमें इंडोनेशिया और सिंगापुर बतौर सदस्य जुड़े. उद्देश्य था, आपसी सहयोग के आधार पर आर्थिक उन्नति, सामाजिक प्रगति और क्षेत्रीय स्तर पर शांति और स्थिरता को बढ़ावा देना. बाद में इस मंच से ब्रुनेई, म्यांमार, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम का जुड़ाव हुआ. भारत को आसियान का महत्व तनिक देर से यानी उदारीकरण के सालों में समझ में आया. तब तक आसियान के ज्यादातर देश अपनी तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था के बूते ‘एशियन टाइगर्स’ के रूप में मशहूर हो चुके थे.
बतौर मेहमान इस मंच से चीन, जापान और दक्षिण कोरिया के जुड़ने के बाद आलम यह है कि विश्व के उत्पादन-नेटवर्क का 45 फीसदी हिस्सा आसियान के देशों में केंद्रित हो गया है. दक्षिण एशियाई देशों की आर्थिक बढ़ोत्तरी बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि वह आसियान के देशों के उत्पादन-नेटवर्क से अपने को कितनी तेजी से जोड़ता है. फिर, सच्चाई यह भी है कि दक्षिण एशियाई बाजार पर कब्जे के अपने मिशन में अमेरिका आसियान को एक बाधा के रूप में देखता है. ऐसे में भारत का आसियान से जुड़ाव उसे एक हद तक अमेरिकी दबदबे से दूर रखेगा.
भारत आसियान के देशों के उत्पादन-नेटवर्क से जुड़े इसके लिए आसियान देशों और भारत के बीच संचारगत ढांचा तो जरूरी है ही, मुक्त-व्यापार संधि के साथ-साथ दक्षिण चीन सागर में अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप व्यापारिक परिवहन की गारंटी भी जरूरी है. भारत-आसियान शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री द्वारा कही गयी बातों को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए. आसियान क्षेत्र के लिए पूर्णकालिक राजदूत नियुक्त कर राजनयिक मिशन चलाने की बात हो, या साल के अंत तक मुक्त व्यापार संधि पर हस्ताक्षर कर व्यापार बढ़ाने और निवेश न्यौतने की बात- संकेत यही हैं कि भारत ‘पूर्व की और देखो’ की अपनी 1990 के दशक की नीति के दूसरे चरण में प्रवेश कर रहा है.
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