हस्तिनापुर के लिए अहम है युवराज

।।दीपक कुमार मिश्र।।(प्रभात खबर, भागलपुर) देश में राजशाही तो नहीं है, फिर भी राहुल गांधी कांग्रेसजनों के लिए युवराज हैं. युवराज इसलिए कि कांग्रेसजनों ही नहीं, देशवासी भी जानते हैं कि आज न तो कल राहुल गांधी देश का नेतृत्व करेंगे ही. अब तक उन्होंने बागडोर शायद इसलिए नहीं संभाली है क्योंकि युवराज के नाते […]
।।दीपक कुमार मिश्र।।
(प्रभात खबर, भागलपुर)
देश में राजशाही तो नहीं है, फिर भी राहुल गांधी कांग्रेसजनों के लिए युवराज हैं. युवराज इसलिए कि कांग्रेसजनों ही नहीं, देशवासी भी जानते हैं कि आज न तो कल राहुल गांधी देश का नेतृत्व करेंगे ही. अब तक उन्होंने बागडोर शायद इसलिए नहीं संभाली है क्योंकि युवराज के नाते उनकी सियासी ट्रेनिंग चल रही है. अभी विपक्षी नेताओं समेत देश के वैसे बुद्धिजीवी जिनकी इच्छा रहती है कि हर निर्णय में उनके विचारों को तवज्जो दी जाये, एक सुर में राहुल गांधी की इस बात के लिए आलोचना कर रहे हैं कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद को ही चुनौती दे डाली. मामला है दागियों को माननीय बनाने वाले बिल का. कैबिनेट जिसके मुखिया प्रधानमंत्री होते हैं, उन्होंने अध्यादेश को वापस ले भी लिया.
संसद में अब बिल पेश भी नहीं होगा. इस पर हाय-तौबा इतनी क्यों मचा है! सेमिनार, लेख से लेकर पीसी और टीवी चैनलों पर इस पर लंबी बहसें हुईं. पता नहीं क्यों इस पर समय जाया किया गया. मेरी मोटी बुद्धि के अनुसार इसमें कोई हाय-तौबा मचाने जैसी जरूरत नहीं थी. न तो राहुल ने कुछ गलत किया और न ही प्रधानमंत्री ने. यह तो हस्तिनापुर की फितरत में है. द्वापर में युवराज (दुर्योधन) के आगे हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र झुके थे. आज कलियुग है, तब भी राहुल गांधी की इच्छा का सम्मान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया.
अपना देश परंपरावादी है. परंपराओं को हम सम्मान देना बखूबी जानते हैं और उसी परंपरा का यहां निर्वाह किया गया. आखिर राहुल गांधी को जब युवराज माने हैं तो उनकी इच्छा का सम्मान तो करना ही होगा. यही धर्म है और कर्यव्य भी. भीष्म पितामह ने उस समय युवराज का विरोध किया, लेकिन हस्तिनापुर के खूंटे से बंधे होने के कारण उन्हें अंतत: चुप हो जाना पड़ा था, लेकिन फिर भी वह अपनी बात कहने से नहीं चूके थे. आज इतना नैतिक साहस कहां है पार्टी के भीष्म पितामहों के पास! एक पुरानी बात है कि डॉक्टर, वकील और मंत्री को सही बात बतानी चाहिए, सही सलाह देनी चाहिए, लेकिन आज के वजीरों की फितरत ही है राजसत्ता की हां में हां मिलना. कहते हैं कि बिल पर पहले तो सारे दल एकमत थे क्योंकि उसमें सबका हित सध रहा था.
राहुल गांधी ने जब विरोध किया तो विपक्षी भाजपा को भी कुछ नहीं सूझा और वह भी प्रधानमंत्री पर सीधे हमला करने लगी और उनका इस्तीफा तक मांग डाला. अध्यादेश के पक्ष और विरोध में जो भी बातें हुईं, देख-सुन कर लगा कि यह तो राजनीतिक ड्रामा था. वैसे भी, हस्तिनापुर की मिट्टी में तो द्वापर काल से राजनीति सनी हुई है. उस राजनीति में विदुर की छीछालेदर होनी ही थी. उस युवराज की जिद से हस्तिनापुर तबाह हुआ था, लेकिन इस युवराज के नैतिक साहस से हस्तिनापुर और मजबूत हो सकता है. इस युवराज ने कम से कम दागी माननीय न बनें, इतना कहने का नैतिक साहस तो दिखाया ही. कुछ तो शुद्धीकरण होगा ही.
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