छात्रों का हित ही सर्वोपरि हो

Published at :11 Oct 2013 3:02 AM (IST)
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छात्रों का हित ही सर्वोपरि हो

झारखंड सरकार ने निर्णय लिया है कि अब वह सरकारी स्कूलों में मुफ्त बंटनेवाली किताबों को खुद नहीं छपवायेगी, बल्कि एनसीइआरटी से खरीदेगी. कक्षा एक से कक्षा आठ तक के बच्चों को मुफ्त में किताब देने का प्रावधान है. किताबों की छपाई का 65 प्रतिशत भार केंद्र सरकार उठाती है. झारखंड सरकार ने किताबों को […]

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झारखंड सरकार ने निर्णय लिया है कि अब वह सरकारी स्कूलों में मुफ्त बंटनेवाली किताबों को खुद नहीं छपवायेगी, बल्कि एनसीइआरटी से खरीदेगी. कक्षा एक से कक्षा आठ तक के बच्चों को मुफ्त में किताब देने का प्रावधान है. किताबों की छपाई का 65 प्रतिशत भार केंद्र सरकार उठाती है. झारखंड सरकार ने किताबों को खरीदने का फैसला ऐसे ही नहीं कर लिया.

दरअसल छपाई में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हो रही थी. केंद्र तक इसकी शिकायत की गयी थी. यही कारण था कि प्रकाशकों के पैसे के भुगतान पर रोक लगा दी गयी थी. मामले की अभी भी जांच हो रही है. 2011-12 में 45 लाख बच्चों के लिए 45.58 करोड़ रुपये की किताब का टेंडर हुआ था. लेकिन अगले साल इस राशि में भारी बढ़ोतरी हो गयी और यह राशि 75.99 करोड़ हो गयी. इससे शक पैदा हुआ और भुगतान पर रोक लगा दी गयी. मामला सिर्फ भुगतान का नहीं था. बच्चों को किताब भी नहीं मिल पा रही थी. परीक्षा के कुछ दिनों पहले तक किताबें बंटती रहीं. कुछ को मिलीं, कुछ को नहीं. ऐसे में बच्चे कैसे पढ़ते?

हद तो तब हो गयी, जब किसी कक्षा में आधे बच्चों को किताबें मिलती थीं, आधे को नहीं. उन्हें कहा जाता था कि मांग कर, बांट कर पढ़ो. पूरी किताब छपती नहीं थी और कागज पर उन्हें छपा हुआ दिखा दिया जाता था. झारखंड शिक्षा परियोजना की यह जिम्मेवारी है कि वह देखे कि बच्चों को किताब मिल रही है या नहीं. अब सरकार के नये निर्णय से दोहरा लाभ होगा. पहला तो बच्चों को किताब समय पर मिलेगी और दूसरा सरकारी राशि की गड़बड़ी कम होगी. यहां एक नया संकट पैदा होने का डर है. जितनी संख्या में झारखंड सरकार को किताबें चाहिए, क्या एनसीइआरटी उसे छाप कर समय पर देने में सक्षम है?

अगर बच्चों को किताब समय पर नहीं मिले तो सरकार के निर्णय का लाभ बच्चों को नहीं ़मिल पायेगा. सरकार जो भी निर्णय करे, किताब छापे या खरीद कर बांटे, बच्चों को समय पर किताब चाहिए. फंड का उपयोग या दुरुपयोग देखना सरकार का काम है. सिर्फ पुस्तक की खरीद से मामला खत्म नहीं हो जाता. हाल के वर्षो में किताबों की खरीद में जो भी गड़बड़ियां हुई हैं, उनकी गहराई से जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ मामला दर्ज होना चाहिए. किसी भी अधिकारी को यह अधिकार नहीं है कि वह प्रकाशकों से सांठ-गांठ कर सरकार का पैसा खाये और बच्चों का जीवन बरबाद करे.

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