संसद की गरिमा

संसदीय परंपराओं में हंगामा और कार्यवाही में व्यवधान कोई नयी बात नहीं है. जरूरी मसलों पर सत्ता पक्ष का ध्यान आकृष्ट करने या किसी महत्वपूर्ण मामले पर चर्चा के लिए कभी-कभार शोर-गुल करना विपक्ष की मजबूरी भी होती है. अगर सरकार किसी सवाल या मुद्दे पर जवाब देने से बचने की कोशिश कर रही हो, […]
संसदीय परंपराओं में हंगामा और कार्यवाही में व्यवधान कोई नयी बात नहीं है. जरूरी मसलों पर सत्ता पक्ष का ध्यान आकृष्ट करने या किसी महत्वपूर्ण मामले पर चर्चा के लिए कभी-कभार शोर-गुल करना विपक्ष की मजबूरी भी होती है. अगर सरकार किसी सवाल या मुद्दे पर जवाब देने से बचने की कोशिश कर रही हो, तो सदन में जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे अन्य दलों की यह जिम्मेवारी भी है कि वे जोर-शोर से अपनी आवाज उठायें. परंतु, जब व्यवधान ही संसदीय कार्यकलापों में रोजमर्रा की गतिविधि बन जायें, तब यह अतिशय चिंता की बात है. दुर्भाग्य से पिछले कुछ सालों से हमारी संसद के दोनों सदनों में यही होता दिखाई पड़ रहा है.
मंगलवार को राज्यसभा की कार्यवाही पूरी नहीं हो सकी, क्योंकि कांग्रेस ललित मोदी मुद्दे पर सरकार से जवाब-तलब करना चाहती है. आइपीएल में घपले में कथित रूप से शामिल ललित मोदी से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के संबंध पिछले कुछ समय से सुर्खियों में हैं और भाजपा तथा कांग्रेस इस मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति कर रही हैं. इसी तरह मध्य प्रदेश के बहुचर्चित व्यापमं घोटाले पर भी विपक्ष भाजपा को कटघरे में खड़ा करने के प्रयास में है. कांग्रेस ने स्पष्ट कह दिया है कि जब तक स्वराज, राजे और शिवराज सिंह चौहान को नहीं हटाया जाता है, वह संसद की कार्यवाही में अवरोध पैदा करेगी. उधर, सरकार ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए बयान दिया है कि वह दोनों सदनों में बहस के लिए तैयार है.
फिलहाल, इस गतिरोध के समाधान की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है. संसद हमारे सार्वजनिक जीवन की सर्वोच्च संस्था है. अमूमन हर वर्ष उसके तीन सत्र होते हैं. इन सत्रों में देश की समस्याओं को हल करने के लिए नीतियां बनायी जाती हैं. ऐसे में व्यवधानों से महत्वपूर्ण विधेयकों पर फैसले में देरी होती है.
जब सदन का सत्र चल रहा होता है, तो उस पर हर मिनट ढाई लाख रुपये खर्च होता है. संसद संचालन का वार्षिक बजट 600 करोड़ रुपये से अधिक है. सौ दिन के सत्रों के हिसाब से प्रतिदिन का खर्च छह करोड़ रुपये बैठता है. सांसदों के वेतन-भत्ताें को भी जोड़ लें, तो सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि व्यवधानों से जनता की गाढ़ी कमाई भी बरबाद होती है. अफसोस की बात है कि विपक्ष में चाहे जो भी पार्टी हो, ऐसे रवैये में बदलाव नहीं आता है. सत्ता पक्ष की पार्टियां भी अकसर अड़ियल रुख ही अपनाती हैं. पक्ष-विपक्ष की इस प्रवृत्ति में तुरंत सुधार की जरूरत है.
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