सेनावाले शरीफ को ‘कुग्गो’ समझते हैं

Published at :16 Jul 2015 12:42 AM (IST)
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सेनावाले शरीफ को ‘कुग्गो’ समझते हैं

पुष्परंजन दिल्ली संपादक, ईयू-एशिया न्यूज तब नवाज शरीफ दोहा में निर्वासित थे, जब पहली बार मैंने डॉयचे वेले (वायस ऑफ जर्मनी) के लिए फोन पर उनका इंटरव्यू लिया था. विश्वास थोड़ा बढ़ा, तो 2006 में लंदन के हाइडे पार्क से लगे मेफेयर स्थित अपने आलीशान बंगले में मिलने को राजी हो गये. वहां मियां नवाज […]

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पुष्परंजन
दिल्ली संपादक, ईयू-एशिया न्यूज
तब नवाज शरीफ दोहा में निर्वासित थे, जब पहली बार मैंने डॉयचे वेले (वायस ऑफ जर्मनी) के लिए फोन पर उनका इंटरव्यू लिया था. विश्वास थोड़ा बढ़ा, तो 2006 में लंदन के हाइडे पार्क से लगे मेफेयर स्थित अपने आलीशान बंगले में मिलने को राजी हो गये. वहां मियां नवाज शरीफ ने अपने बचपन की बातें बतायीं.
स्कूल में उनके साथी उन्हें ‘कुग्गो’ बुलाते थे. वह इसलिए कि मियां नवाज न तो किसी खेल में हिस्सा लेते, न साथियों से घुलते-मिलते. शिक्षक के सवालों का जवाब तक देने से डरते. खामोश रहनेवाले बच्चे को साथियों ने ‘कुग्गो’ कहना शुरू किया. ‘कुग्गो’, यानी गोद से चिपके रहनेवाला बच्चा!
उन्होंने लाहौर गवर्नमेंट कॉलेज से बीए थर्ड डिवीजन से पास किया. ‘कुग्गो’ न तो क्रिकेटर बन पाया, न फिल्म एक्टर. फिर उद्योगपति पिता मुहम्मद शरीफ ने तय किया कि नवाज को राजनीति में लाया जाये. जनरल गुलाम जिलानी खान ने नवाज को जनरल जियाउल हक से मिलवाया. एक झटके में नवाज पंजाब के वित्त मंत्री बन गये.
जनरल जिलानी को पैसे के बदले लाहौर में शरीफ परिवार का ‘व्हाइट पैलेस’ मिल गया. प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अतीत ने नवाज का पीछा नहीं छोड़ा. विरोधी उन्हें ‘कुग्गो’ संबोधित करते रहे. वे अब 65 साल के हैं, प्रधानमंत्री हैं, पर पाकिस्तान के सेना वाले उन्हें ‘कुग्गो’ ही समझते हैं.
पाक सेना के जनरल की वजह से नवाज शरीफ राजनीति में आये, पर सेना का डर उनके दिलो-दिमाग से उतरा नहीं है. वजह 12 अक्तूबर, 1999 है, जब सेना ने उन्हें प्रधानमंत्री पद से उतार कर सऊदी अरब भेज दिया था. उसी समय नवाज शरीफ ने गांठ बांध ली थी कि सत्ता में दोबारा आये तो सेना से पंगा नहीं लेंगे. ‘उफा घोषणा’ की जो इबारत लिखी गयी थी, उसे प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज ने साइन किया था, पर इस्लामाबाद लौटते ही नवाज ने गलती सुधार ली, इसलिए ‘सऊदी अरब निर्वासित’ होते-होते रह गये. पाकिस्तान के 15वें सेनाध्यक्ष राहील शरीफ ने बहुत हद तक इसे संभाल लिया.
बल्कि, लोगों का ध्यान दिल्ली की ओर चला जाये, इस वास्ते पाक उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने लगे हाथ कश्मीरी अलगाववादियों को ईद मिलन का दावत भी दे दिया है. हालांकि पाक उच्चायोग की यह दावत उल्टी पड़ रही है. हुर्रियत नेता अली शाह गिलानी की ओर से कहा गया है कि पाकिस्तान अब भारत से आदेश लेने लगा है.
इस कारण ‘उफा घोषणापत्र’ में कश्मीर को नहीं शामिल किया गया. ऐसे कमजोर पाकिस्तान की ईद की दावत हमें कुबूल नहीं है! यह दिलचस्प है कि इसी हुर्रियत नेता अली शाह गिलानी ने उच्चायुक्त बासित द्वारा भेजा चार जुलाई की इफ्तार पार्टी का दावतनामा कुबूल कर लिया था. लेकिन, चार जुलाई के दावते इफ्तार को उफा में मोदी-नवाज मुलाकात में क्या होता है, इसके मद्देनजर स्थगित कर दिया गया था. हुर्रियत नेता गिलानी ने कहा कि जब से भाजपा केंद्र की सत्ता में आयी है, पाकिस्तान पर ‘माइनस कश्मीर अजेंडा’ पर बात करने के लिए दबाव बनाती रही है.
यों, भारत-पाक के बीच सात साझा बयानों में से पांच ड्राफ्ट ऐसे दिखते हैं, जिनमें कश्मीर की चर्चा है. इनमें शिमला समझौता 1972, न्यूयार्क ज्वाइंट स्टेटमेंट 1998, लाहौर घोषणापत्र 1999, आगरा ड्राफ्ट 2001 और 2004 में इस्लामाबाद में भारत-पाक प्रधानमंत्रियों का दिया साझा बयान शामिल है. सिर्फ 2003 में जनरल मुशर्रफ ने कश्मीर पर यूएन प्रस्ताव की चर्चा नहीं की.
उफा में दूसरा अवसर है जब साझा बयान में कश्मीर का जिक्र नहीं है. लेकिन इन घोषणाओं का नतीजा क्या निकला? कश्मीर में सीमा पार से न तो गोलियों की बरसात बंद हुई, न घुसपैठ रुकी. अब तो घाटी में ‘आइएस’ के झंडे भी लहराने लगे हैं.
पाकिस्तान के विरुद्ध छप्पन इंच का सीना चौड़ा किये बिना अटल बिहारी वाजपेयी ने 6 जनवरी, 2004 को मुशर्रफ से उस घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करवा लिया था, जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान की जमीन से आतंकी साजिश नहीं होगी. अच्छा होता कि 2006 के साझा घोषणापत्र के आधार पर लखवी और ‘हिज मास्टर्स वॉयस’ के सूत्रधार पाकिस्तान को हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय अदालत (आइसीजे) में घसीटा जाता.
यों, पाकिस्तानी खुफिया ‘फेडरल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी’ ने 26/11 के दोषी और लश्करे तैयबा का ‘हैंडलर’ जकीउर्रहमान लखवी समेत 29 आतंकियों के विरुद्ध ‘वॉयस सैंपल’ के आधार पर 8 जनवरी, 2013 को अदालत में चार्जशीट दाखिल की थी. लेकिन, केवल भारत को रोकने के लिए पाकिस्तान ने 2013 में आवाज के नमूने अभियुक्त की मर्जी के बगैर न देने का कानून बनाया था.
दुनिया यह देख रही थी कि 10 अप्रैल, 2015 को लखवी जब दस लाख की जमानत पर छूटा, तो उसका स्वागत एक हीरो की तरह हुआ. उसे उसका रत्ती भर अफसोस नहीं कि 26 नवंबर, 2008 को मुंबई हमले में 166 लोगों की मौत हुई थी. इस मामले में छह और षड्यंत्रकारी अब्दुल वाजिद, मजहर इकबाल, हमद आमिन सादिक, शाहिद जमील रियाज, जमिल अहमद और युनूस अंजुमन रावलपिंडी के सेंट्रल जेल में 2009 से बंद हैं.
‘पोस्ट उफा डिप्लोमेसी’ की समीक्षा करें, तो लगेगा कि प्रधानमंत्री मोदी की पाकिस्तान रणनीति विफल रही है. नयी दिल्ली में अब्दुल बासित जैसे कश्मीर रणनीतिकार को भेज कर पाकिस्तान जिस तरह के खुराफात रोज-ब-रोज करवा रहा है, उसके मुकाबले इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायुक्त टीसीए राधवन एक ‘सॉफ्ट डिप्लोमेट’ साबित हुए हैं.
राधवन को पाकिस्तान की इफ्तार पार्टी में शायद ही किसी ने बुलाया हो. दूसरी ओर, पाक उच्चायुक्त अब्दुल बासित हैं, जो सोनिया गांधी से लेकर अरविंद केजरीवाल तक की इफ्तार पार्टी के सबसे बड़े ‘सेलेब्रिटी’ हैं.
ये वही बासित हैं, जो बर्लिन में राजदूत थे, तब हर साल आइएसआइ के फंड से ‘कश्मीर डे’ मनाते थे. देश के अलगाववादियों से मिल कर दिन-रात साजिश रचनेवाले एक पाक कूटनीतिक के लिए रोजा-इफ्तार में रेड कार्पेट बिछा कर हमारे नेता जो दिखाना चाहते हैं, उससे क्या देश का मुसलमान मतदाता खुश हो जायेगा?
कई बार अपनी शर्मनाक हालत के लिए हम खुद जिम्मेवार होते हैं. पाकिस्तान को लेकर रणनीति में बड़े बदलाव का समय आ गया है. पाक कब्जेवाले कश्मीर में जुल्मो-सितम एवं राजनीतिक बेईमानी के सवाल को भारत पुरजोर तरीके से उठाये.
वहां के अलगाववादी नेताओं से इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायुक्त मिलें. बलूच और पाक कश्मीरी नेताओं को इफ्तार की दावत दें, ईद मिलन करें. ईरान अमेरिकी खेमे में है, उससे मिलकर बलूचिस्तान के सवाल पर नयी दिल्ली-तेहरान के बीच संवाद हो. ऐसे ही उपायों से पाकिस्तान को जवाब मिल सकेगा!
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