सांचे से तो जग नहीं झूठे मिलें न राम

।।राजेंद्र तिवारी।।(कारपोरेट संपादक प्रभात खबर) दागियों को बचानेवाले अध्यादेश पर राहुल गांधी के बयान को लेकर हल्ला मचा हुआ है. क्या कांग्रेसी और क्या भाजपाई, सभी लोग यह साबित करने में लगे हैं कि वे तो इस अध्यादेश के साथ कभी नहीं थे. सबकी बातें सुन कर मैं थोड़ा भ्रमित हो गया हूं कि जब […]
।।राजेंद्र तिवारी।।
(कारपोरेट संपादक प्रभात खबर)
दागियों को बचानेवाले अध्यादेश पर राहुल गांधी के बयान को लेकर हल्ला मचा हुआ है. क्या कांग्रेसी और क्या भाजपाई, सभी लोग यह साबित करने में लगे हैं कि वे तो इस अध्यादेश के साथ कभी नहीं थे. सबकी बातें सुन कर मैं थोड़ा भ्रमित हो गया हूं कि जब न कांग्रेसी यह अध्यादेश चाहते थे और न ही भाजपाई, तो फिर 13 अगस्त की सर्वदलीय बैठक में सहमति कैसे बन गयी? खैर इस पर चर्चाएं चल रही हैं, टीवी से लेकर सोशल मीडिया तक. लेकिन एक बात साफ है कि हमारा पॉलिटिकल क्लास यानी शासक वर्ग आम आदमी को ढोर-डंगर मानने में दलगत सीमाओं से ऊपर उठ कर एकमत है. यह बात मेरी समझ से बाहर है कि यदि अध्यादेश आ जायेगा तो क्या दागी लोगों को टिकट न देना कानूनन अपराध हो जायेगा, जो सारे लोग चिंतित हैं कि अध्यादेश ठीक नहीं है. अरे भाई, अध्यादेश आये या न आये, सुप्रीम कोर्ट कहता या न कहता, आप अपनी-अपनी पार्टी में दागियों को टिकट न दिये जाने का नियम क्यों नहीं बना देते? यहीं पर हरेक का दोहरापन (यानी दिखाने के दांत और, खाने के और) सामने आ रहा है.
कांग्रेस के युवराज आस्तीन चढ़ा कर एंग्री यंगमैन बन कर जो बातें कह रहे हैं, वो बातें खुद अपनी पार्टी में लागू क्यों नहीं कर देते? वह घोषणा कर देते कि पांच राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस में किसी ऐसे व्यक्ति को टिकट नहीं दिया जायेगा जिसे सजा सुनायी जा चुकी है, भले ही वह ऊपर के कोर्ट में इस सजा के खिलाफ मुकदमा लड़ रहा हो. किसने रोका उनको? जिस तरह शुक्रवार को प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि कांग्रेस हो या बीजेपी, सभी दल राजनीतिक मजबूरियों के चलते समझौता करते हैं, उसी तरह उनको यह भी बता देना चाहिए कि उनकी पार्टी में वे कौन लोग हैं जो उनको ऐसी घोषणा करने से रोकते हैं. आप चुनावी फायदे के लिए, सरकार बनाने के लिए किसी भी दागी से समझौता करते रहते हैं और बाहर निकल कर आस्तीन चढ़ायेंगे, और आपको लगता है कि पब्लिक कुछ जानती ही नहीं. इसी तरह राजनीति में खुद को नैतिक मूल्यों की सबसे बड़ी झंडाबरदार माननेवाली भाजपा यह अध्यादेश आने के बाद भी क्यों बेदाग प्रत्याशी नहीं खड़े कर सकती? जब भी दागियों की बात आती है, तो सभी पार्टियां अपने दागियों को साजिश का शिकार और दूसरी पार्टियों के दागियों को अपराधी बताने लगती हैं. सबका एक ही तर्क होता है. लेकिन मैं एक छोटी-सी बात पूछना चाहता हूं- क्या ये दागी देश के लिए इतने महत्वपूर्ण होते हैं कि ये चुनाव नहीं लड़ेंगे तो संसद या विधानसभा की गरिमा को ठेस लगेगी? या ये दागी मंत्री नहीं बनेंगे तो संबंधित विभागों को बहुत बड़ी योग्यता से वंचित रहना पड़ेगा? और भाई, अगर आपकी पार्टी के लिए वे महत्वपूर्ण हैं, तो उनको पार्टी में ही ओहदे दे दीजिए? इस पर न कोई कानून रोक लगाता और न कोई कोर्ट या अध्यादेश. क्या है कोई पार्टी ऐसी, जो सार्वजनिक रूप से यह घोषणा कर सके कि वह किसी चुनाव में किसी दागी को टिकट नहीं देगी?
एक किस्सा भी
मुझे बचपन में सुनी हुई एक कहानी याद आ रही है- एक पंडित जी और उनका किशोरवय बेटा एक खच्चर लेकर अपने गांव जा रहे थे. पंडित जी आगे-आगे, बेटा पीछे और बीच में खच्चर. लोगों ने देखा, कहा- दोनों कितने मूर्ख हैं, खच्चर होते हुए पैदल जा रहे हैं. पंडित जी ने सोचा कि बात ठीक ही है और दोनों खच्चर पर सवार हो गये. आगे फिर एक गांव पड़ा. लोगों ने उन दोनों को देखा और कहने लगे कितने निर्दयी बाप-बेटे हैं, बेचारे खच्चर पर दोनों लदे हैं. पंडित जी ने सोचा कि बात तो ठीक है. लिहाजा वह खच्चर से उतर गये. अब पंडित जी आगे-आगे और पीछे खच्चर पर सवार बेटा. अब लोगों ने देखा और कहा कि कैसा बेटा है, खुद खच्चर पर लदा है और बाप पैदल चल रहा है. बेटे ने सोचा बात तो ठीक है. उसने पंडित जी को खच्चर पर बैठा दिया और खुद पैदल चलने लगा. अब लोगों ने कहा कि कैसा बाप है, खुद खच्चर पर बैठा है और लड़के को पैदल चला रहा है. मौजूदा माहौल में इस कहानी में पंडित जी, लड़के और खच्चर की जगह कैरेक्टर आप खुद फिट कर सकते हैं.
और अंत में
इस बार कवि-पत्रकार गीत चतुर्वेदी की दो कविताएं. गीत एक बड़े अखबार में कार्यरत हैं और उनका पत्रकारीय कर्म उनकी रचनाओं में उपस्थित दिखायी देता है. प्रेम उनकी कविताओं में आक्सीजन की तरह घुली है. दिखायी नहीं देती, लेकिन यदि इसे निकाल दिया जाये तो प्राण ही न रह जाएं. पढ़िए उनकी कविताएं. ये कविताएं कविता कोश की वेबसाइट से ली गयी हैं-
फीलगुड
कोशिश करता हूं किसी भी अभिव्यक्ति से
किसी को भी ठेस न पहुंचे
जिस पेशे में हूं मैं
वहां किसी गुनाह की तरह
कठिन शब्दों को छांट देता हूं
कठिन वाक्यों को बना देता हूं सरल
जबकि हालात दिन-ब-दिन और कठिन होते जाते
मैं समय का संपादन नहीं कर पाता
कितना खुशकिस्मत हूं
एक जीवन में कितनी स्त्रियों का प्रेम मिला
कितने मित्रों कितने बच्चों का
प्रेम के हर पल में जन्म लेता हूं
पल-बढ़ कर प्रेम की ही किसी आदिम गुफा में
छिप जाता हूं धीरे-धीरे मृत होता
कंधे झिड़क कहता हूं ख़ुद से
एक जीवन और चाहिए पाया हुआ प्रेम लौटने को
घृणा की वर्तनी में कोई गलती नहीं होती मुझसे
नफ़रत में नुक्ता लगाना कभी नहीं भूलता
बोलने से पहले
बुद्धिमान लोगों की तरह बोलो
नहीं तो ऐसा बोलो
जिससे आभास हो कि तुम बुद्धिमान हो
बोलने से पहले
उन तलवारों के बारे में सोचो
जो जीभों को लहर-लहर चिढ़ाती हैं
यह भी सोचो
कि कर्णप्रिय सन्नाटे में तुम्हारी ख़राश
किसी को बेचैन कर सकती है
कई संसारों में सिर्फ एक बात से आ जाता है भूडोल
खुलो मत
लेकिन खुलकर बोलो
अपने बोलों को इस तरह खोलो
कि वह उसमें समा जाए
वह तुममें समाएगा तो तुम बच जाओगे
बोलने से पहले ख़ूब सोचो
फिर भी बोल दिया तो भिड़ जाओ बिंदास
तलवारें टूट जाएंगी
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