..ये एनएच 33 है मेरी जां

Published at :27 Sep 2013 3:04 AM (IST)
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..ये एनएच 33 है मेरी जां

।।अखिलेश्वर पांडेय।। (प्रभात खबर, जमशेदपुर) जिंदगी की पेचीदा पगडंडी हो या राजनीति की रपटीली राहें, चलना तो पड़ता है. जरा हटके, जरा बचके. अरे..अरे! मार ही डालोगे क्या? भइया! संभल के. सामनेवाला नहीं देख रहा तो क्या हुआ, खुद की परवाह तो करो. जान जोखिम में क्यों डाल रहे? वह भी सड़क पर. मरने का […]

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।।अखिलेश्वर पांडेय।।

(प्रभात खबर, जमशेदपुर)

जिंदगी की पेचीदा पगडंडी हो या राजनीति की रपटीली राहें, चलना तो पड़ता है. जरा हटके, जरा बचके. अरे..अरे! मार ही डालोगे क्या? भइया! संभल के. सामनेवाला नहीं देख रहा तो क्या हुआ, खुद की परवाह तो करो. जान जोखिम में क्यों डाल रहे? वह भी सड़क पर. मरने का इतना ही शौक है तो सीमा पर जाओ, दुश्मनों को मारो और शहीद कहलाओ. यहां मरोगे तो कुत्ते की मौत भी नसीब नहीं होगी. ख्याल रहे, यह झारखंड का एनएच 33 है.

हड्डी का एक टुकड़ा भी घरवालों को नसीब नहीं होगा. पहचान भी नहीं हो पायेगी. लावारिस में डाल दिये जाओगे. इस एनएच में इतने गड्ढे हैं कि जितने आसमान में तारे भी नहीं होंगे. कितनी सरकारें आयीं और चली गयीं, पर यह सड़क अपनी जगह यथावत है. उसी रूप में सदैव. क्या मजाल कि कोई इसका कायाकल्प कर सके. जानकार कहते हैं कि एनएच 33 पर चलना जिंदगी की पेचीदा पगडंडी और राजनीति की रपटीली राहों से भी ज्यादा मुश्किल है. जिंदगी की पगडंडी पर चलते-चलते कई बार आपको कोई हमसफर मिल जाता है. कई खूबसूरत पड़ाव या मोड़ नसीब हो जाते हैं. और तो और राजनीति की राहें रपटीली कही जाने के बावजूद इस पर कई बार गुलदस्ता या माला आपको मिल जाती है.

कई बार आपकी जय-जय भी होती है. पर एनएच 33 पर चलते हुए मिलेंगे बेशुमार गड्ढे, टूटी गाड़ियां, पंचर चक्के, दर्द से कराह रहे यात्री और इस रास्ते न आने का संकल्प दोहरा रहे लोग. इस रास्ते से गुजरनेवाले यात्रियों को और कुछ याद रहे न रहे सफर के दौरान मिला ‘जख्म’ और ‘दर्द’ अवश्य याद रह जाता है. मुङो लगता है, वाकई वे लोग बहुत बहादुर किस्म के इंसान हैं जो एनएच 33 पर प्रतिदिन मौत से लड़ते हुए अपना सफर तय करते हैं. मंजिल तक पहुंचने के इस जज्बे को मेरा सलाम. इस रास्ते से गुजरते हुए ट्रकों के पीछे लिखी कुछ पंक्तियां पढ़ी थीं. उस वक्त भी मौजूं लगी थी, आज भी है. आपसे साझा करना चाहता हूं.

पहला – लटकल त गइल बेटा.

दूसरा – जिन्हें जल्दी थे वे चले गये.

तीसरा – यह राह बड़ी मुश्किल है, साथ दे सको तो चलो/ मैं तो दिन-रात सहता हूं, तुम भी सह सको तो चलो.

इन पंक्तियों को भले ही गुलजार या दिनकर जैसे साहित्यकार ने न लिखा हो, पर जिसने भी लिखा है वह जिंदगी के फलसफे का बड़ा जानकार अवश्य है. मैंने महसूस किया कि इस राह पर चलते हुए भले आपका असली हमसफर साथ न हो, पर उस वक्त साथ चल रहे लोग कितने अपने लगते हैं. सभी का दर्द एक-सा. सभी की कराह एक जैसी. सभी की अभिव्यक्ति एक जैसी. सभी के चेहरे का हावभाव एक जैसा. वाकई! कमाल का है एचएच 33. कभी जमशेदपुर आकर तो देखिए!

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