स्वस्थ-जीवन बने वैश्विक प्राथमिकता

Published at :10 Jun 2015 5:33 AM (IST)
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स्वस्थ-जीवन बने वैश्विक प्राथमिकता

विश्व में जीवन प्रत्याशा बढ़ रही है, लेकिन बीमारों की संख्या में भारी वृद्धि इस उपलब्धि को लगातार कमतर भी कर रही है. एक महत्वपूर्ण अध्ययन ‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज स्टडी, 2013’ में पाया गया है कि दुनिया की आबादी का 95 फीसदी से ज्यादा हिस्सा किसी-न-किसी स्वास्थ्य संबंधी समस्या का सामना कर रहा है. […]

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विश्व में जीवन प्रत्याशा बढ़ रही है, लेकिन बीमारों की संख्या में भारी वृद्धि इस उपलब्धि को लगातार कमतर भी कर रही है. एक महत्वपूर्ण अध्ययन ‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज स्टडी, 2013’ में पाया गया है कि दुनिया की आबादी का 95 फीसदी से ज्यादा हिस्सा किसी-न-किसी स्वास्थ्य संबंधी समस्या का सामना कर रहा है.
करीब 2.3 अरब लोग यानी एक-तिहाई जनसंख्या को पांच से अधिक बीमारियां हैं. इस शोध के अनुसार, 2013 में प्रति 20 लोगों में मात्र एक व्यक्ति ही ऐसा था, जिसे कोई स्वास्थ्य समस्या नहीं थी. इस अध्ययन में 188 देशों से 1990 और 2013 के बीच के 310 बीमारियों और घावों के 35,620 सूचनाओं व आंकड़ों के साथ अक्षमता के साथ व्यतीत अवधि का भी संज्ञान लिया गया है.
अध्ययन में रेखांकित किया है कि जनसंख्या बढ़ने के साथ बूढ़े लोगों तथा खराब सुविधाओं वाले क्षेत्रों में रहनेवालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. शोध के प्रमुख वाशिंगटन विश्वविद्यालय के वैश्विक स्वास्थ्य विभाग के प्रोफेसर थियो वोस के अनुसार, खराब स्वास्थ्य के सुधारे जा सकनेवाले कारणों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है, जबकि स्वास्थ्य व्यवस्था और जीवन की गुणवत्ता पर इनका बहुत नकारात्मक असर पड़ता है. यह शोध उन समस्याओं के बारे में है, जिनका बचाव और उपचार बहुत मुश्किल नहीं है, जैसे- दांतों की सड़न, डायबिटीज, जोड़ों और गर्दन का दर्द, मानसिक परेशानी, नशाखोरी से उत्पन्न रोग आदि.
सरकारों और चिकित्सा संस्थाओं का ध्यान जानलेवा बीमारियों पर तो कुछ हद होता भी है, पर कई समस्याओं को साधारण मान कर नजरअंदाज कर दिया जाता है. डॉ वोस की इस सलाह पर नीति-निर्धारकों को अवश्य ध्यान देना चाहिए कि दुनियाभर में स्वास्थ्य-संबंधी प्राथमिकताओं में बदलाव की जरूरत है तथा हमें लोगों को लंबे समय तक जीवित रखने के साथ उन्हें स्वस्थ रखने की भी चिंता की जानी चाहिए.
हमारे देश में, जहां कुल घरेलू उत्पादन का करीब चार फीसदी खर्च स्वास्थ्य (सरकारी व निजी मिलाकर) पर होता है तथा 2015-16 के बजट में पिछले वर्ष की तुलना में खर्च में 15 फीसदी की कमी भी हुई है, बीमारियां बड़ी समस्या हैं. इस शोध को एक गंभीर चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए.
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